गुरुवार, 7 जुलाई 2011

बोलने में शालीनता ,बैठने में शालीनता , चलने में शालीनता (मुकेश कुमार सिन्हा)



जब मैंने इन्टरनेट का प्रयोग करना शुरू किया और ऑरकुट प्रोफाइल बन गया तो मेरे बच्चों के बाद मेरा पहला ऑरकुट दोस्त बना ' मुकेश ' . इन्टरनेट तो मुझे यूँ भी जादूनगरी लगी और नगरी में मुकेश ने बड़े प्यार से मुझे दीदी कहा . इतना मज़ा आया कि पूछिए मत .... उसकी कम्युनिटी थी ' JOKES, SHAYERIES & SONGS![JSS]' और मेरी 'मन का रथ' .... शुरुआत में वह मेरे हर लिखे पर कहता - ' कुछ नहीं समझे , कितनी बड़ी बड़ी बातें करती हो ...' पर एक बार उसने कहा -'दीदी मेरा मन कहता है तुम बहुत आगे जाओगी...' ..... जब भी मुझे कोई पड़ाव मिला मुकेश की यह बात मुझे याद आई . एक बार हमारी लड़ाई भी हुई , न उसने मनाया न मैंने - लेकिन रिश्ते की अहमियत थी , हम फिर बिना किसी मुद्दे को उठाये उतनी ही सरलता से बातें करने लगे !
फिर वह दिन आया जब मुकेश ने कुछ लिखा .... हर पहला कदम अपने आप में डगमगाता है , उसे भी खुद पर भरोसा नहीं था . पर मैंने कहा , लिखते तो जाओ ... और आज मुकेश की सोच ने शब्दों से मित्रता कर ली है और शब्दों ने उसे एक सफल ब्लॉगर बना दिया . अब ब्लॉग की दुनिया में उसकी अपनी एक पहचान है .
चुलबुला तो वह आज भी है , पर उस चुलबुलेपन के अन्दर एक शांत, गंभीर व्यक्ति है , जो हँसते हुए भी ज़िन्दगी को गंभीरता से समझता है .
कई बार हम ज़िन्दगी की ठोकरों से आहत कुछ लोगों से कतराते हैं, खुद पे झुंझलाते हैं - फिर अचानक हम बड़े हो जाते हैं और खुद से बातें करते हुए सुकून पाने लगते हैं कि यदि ज़िन्दगी यूँ तुड़ीमुड़ी न होती, अभाव के बादल घुमड़कर न बरसे होते तो जो खिली धूप आज है, वह ना होती !
मुकेश से मेरी मुलाकात 'अनमोल संचयन' के विमोचन में प्रगति मैदान में हुई , बोलने में शालीनता ,बैठने में शालीनता , चलने में शालीनता ...पूरे व्यक्तित्व में कुछ ख़ास था , जिसे शब्दों में नहीं बता सकती , ..... हाँ मुकेश का परिचय - संभव है , आपसे बहुत कुछ कह जाए -



४ सितम्बर १९७१, आनंद चतुर्दशी के दिन मेरा जन्म एक गरीब कायस्थ परिवार में बिहार के बेगुसराय जिला में हुआ था...! वैसे तो राष्ट्रकवि "दिनकर" का जन्म स्थान भी इसी जिले में है....:)...गरीब परिवार और छः भाई बहन में सबसे बड़ा होना...शायद मेरे जीवन में मेरे लिए एक अवरोधक की तरह था..उस पर ये भी पता नहीं था की पढाई क्यूं कर रहे हैं...! विज्ञान(गणित) में स्नातक(प्रतिष्ठा) प्रथम स्थान से उतीर्ण हुआ...क्योंकि घर वालो का मानना था की विज्ञान की पढाई ही सर्वश्रेष्ट है..!काश कुछ और विषय लिया होता..! बाद में ग्रामीण विकास में स्नातकोतर डिप्लोमा भी किया...! चूँकि नौकरी जरुरी थी...तो एक आम छात्र की तरह सामान्य ज्ञान को hobby की तरह अपना लिया..! इस कारण quiz में बहुत सारे पुरूस्कार मिले, all bihar quiz championship में एक बार runner - up भी रहा..! भाग्य का जायदा साथ न दे पाना और शुरू से आर्थिक रूप से आत्म निर्भर होने के कोशिश के कारण भी जायदा कुछ अर्जित नहीं कर पाया...वो तो भगवन का शुक्र है की उम्र बीतने से पहले ही सरकारी नौकरी मिल गयी! सम्प्रति अभी कृषि राज्य मंत्री के साथ जुड़ा हुआ हूँ! मेरी जिंदगी मेरी पत्नी अंजू और दो बेटे यश और ऋषभ हैं...! रश्मि दी के द्वारा संकलित "अनमोल संचयन" में मेरी एक कविता प्रकाशित हो चुकी है....! बहुत बेहतर तो नहीं लिख पता हूँ..पर रश्मि दी के motivation से आज से तीन साल पहले ब्लॉग बनाया था.."जिंदगी की राहें" के नाम से...

मैं हूँ मुकेश कुमार सिन्हा ..
सरकारी नौकर ही नहीं ..कवि भी हूँ सरकार
विवाहित हूँ..और हूँ दो बच्चों का बाप..
खुशियाँ उनकी
बस इतनी सी है दरकार
सीधा सरल सहज..
साधारण सा हूँ इंसान..
सादगी है मेरी पहचान ....
नैतिक कर्त्तव्य ..
सामाजिक दायित्व..
इन सबका मुझे है भान
भावों की रंगोली सजाना
खुशियों के बीज बोना
.आनंद के वृक्ष उगाना
जीवन का है ये अरमान
बस इतना सा ही है मेरा काम.


मुकेश का ब्लॉग - http://jindagikeerahen.blogspot.com/

बुधवार, 6 जुलाई 2011

अजय कुमार झा ... यानि कुछ भी कभी भी



अंतरजाल की दुनिया में अजय कुमार झा ... यानि कुछ भी कभी भी ... इसका ज्वलंत उदाहरण है उनका ये परिचय , मैंने कहा - ' मेरी कलम के लिए आपकी कलम से मुख्य जानकारी चाहिए - बचपन से अब तक ' और उनका जवाब आया - 'बचपन से अब तक का ..हा हा हा ये तो बडा ही मजेदार परिचय मांग लिया आपने , लिख कर भेज सकता हूं , वो भी शायद देर रात तक क्योंकि शाम का वक्त कुछ ब्लॉगर मित्रों के नाम है , यदि इतना समय दे सकें तो मेहरबानी होगी ।' और मैंने कर दी मेहरबानी .... जो ख़ास शख्स होते हैं , उनकी मेहरबानी के लिए मेहरबानी ज़रूरी भी तो है !
इनको मैंने पढ़ा , पर पढ़ने में पहली खासियत थी 'पटना' लिखा होना . अपने क्षेत्र से कोई हो तो बड़ा अच्छा लगता है , मुझे भी लगा -
'झा जी कहिन ' में अजय जी ज्यादा लोगों के करीब रहे . और झा जी कहिन भी में यह पृष्ठ http://ajaykumarjha.com/blog/%E0%A4%A4%E0%A5%82-%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0/ उनकी नींव की सशक्त दर्शाता है, देखकर आगत के स्वर सुनाई देते हैं . अजय जी की ख़ुशी वहाँ टिप्पणी में देखी जा सकती है . मैंने सोचा , आयुष ने उनके सिखाये को यूँ अंजाम न दिया होता तो झा जी ऐसा नहीं कर पाते , बस कहते ही रहते !

अब हम उस दिशा में कदम बढ़ाएं, जहाँ वह सब है जिसे उनको पढनेवाले जानना चाहेंगे औए खुद अजय जी बताना चाहेंगे , क्योंकि' कुछ भी कभी भी' के पीछे यही तो पृष्ठभूमि है -


सोच रहा हूं कि बचपन में मेरी क्या पहचान थी , एक बच्चा था , बस और क्या , पिता फ़ौजी और मां गृहणी , एक बडी बहन और एक छोटे भाई के बीच , यानि माता पिता की मंझली संतान । जाने अब मां और पिताजी को ये पहले ही आभास हो गया था कि शायद उन्होंने मेरी आदतों को देखकर मेरा घर का नाम रखा था "भोला "
,और मैं उन दिनों इतना ही भोला हुआ करता था कि दोस्त , पेड के नीचे ले जाकर , दूर शाख पर लटके मधुमक्खी के छत्ते में ढेला मार कर फ़ुर्र और मैं जब तक भागने की सोचता या मुझे खतरे का एहसास होता तब तक तो एक आध डंक खा चुका होता था फ़िर रोते धोते घर वापस । बचपन तो बचपन ही होता है , उस वक्त तो शायद शहरों का भी वो बचपन ही था , आज जब उन्हें जवां और मशरूफ़ होता देखता हूं तो अहसास होता है कि सडकों पर अपनी मस्ती में भागते तांगे , और पूरे रास्ते लगे हरे भरे पेड उनके बचपन की ही निशानी तो थे । हम भी उन दरख्तों के साथ ही बढते चले गए ।

आम बच्चों की तरह ,पतंग उडाने , कंचे खेलने , कॉमिक्स पढने , स्टार ट्रैक देखने , लट्टू नचाने और सायकल के टायर को डंडो से चलाने दौडाने तक के सारे खेल में खूब भागीदारी करते थे । ये तो याद नहीं कि किसी भी खेल के चैंपियन सरीखे पहचाने गए हों , लेकिन ये जरूर था कि हर खेल में इतनी महारत तो हो ही जाती थी कि दोस्तों की टीम चुनते समय अपना भी खास ख्याल रखा जाता था और इतना ही बहुत हुआ करता था उन दिनों । फ़ौजी कैंट की कॉलोनियों में बिजली जाने के बाद घंटे दो घंटे के अंधरे में छुपन छुपाई का वो दौर शायद ही उसके बाद चलन में रहा हो । पढाई लिखाई में यही हैसियत थी कि घर वाले निश्चिंत रहते थे , कभी अव्वल आना नहीं है और कभी फ़ेल होना नहीं है , सच कहें तो उस समय तो तैंतीस प्रतिशत पा लेने वाली ललक भी कभी नहीं जगी थी और मैट्रिक परीक्षा तक यही हाल रहा था ।


एक खास बाद बचपन से लेकर युवापन तक और उसके बाद से लेकर शायद अब तक ये महसूस की अपने साथ कि जाने अनजाने दोस्तों के केंद्र में जरूर आता रहा । यानि कुल मिलाकर मैं वो बिंदु था जहां आकर सारी मित्र रेखाएं मिल जाती थीं । मध्यमवर्गीय परिवार से होने के कारण पढाई लिखाई खत्म होते होते ही कैरियर बनाने संवारने की एक स्वाभाविक सी जिम्मेदारी ओढ ही ली जाती है सो हमने भी ओढ ली । अपनी स्थितियां कुछ ज्यादा दुश्वार इसलिए हुईं क्योंकि बडी बहन , वो भी जिसे पिताजी अपना बडा बेटा समझते थे और मां की पक्की सहेली थी वो , के अचानक चले जाने के बाद पिता मानसिक संतुलन खो बैठे और मां शरीर को घुन लगा बैठीं और अंतत: उन्होंने भी साथ छोड दिया । लेकिन वे दिन जिंदगी के सबसे कठिन दिनों में से एक थे । मुझे याद है कि कैसे एक हादसे ने मुझसे मेरा बचपन छीन कर मुझे रातों रात अपने मां पिता का अभिभावक बना दिया था ।

संघर्ष के दिन वो रहे जब , इस महानगर में हम कुछ दोस्त अपनी अपनी जगह तलाश रहे थे । कई क्षेत्रों में रुचि और प्रयास करने के बावजूद सरकारी सेवा को सबसे सुरक्षित मानते हुए किस्मत ने उसीसे जोड दिया । खुशकिस्मती ये रही कि सरकारी सेवा में आने के बावजूद भी क्षेत्र रहा विधि और न्याय , जिसका एक लाभ ये रहा कि खुद के अलावा मित्रों दोस्तों के बहुत ही काम आने का मौका मिल गया जो अब भी जारी है । पढने लिखने का शौक यूं तो मुझे शायद पहली बार तब हुआ था जब मैं ग्यारहवी कक्षा में था , रही सही कसर पूरी कर दी संपादकों के नाम पत्रों और विभिन्न रेडियो स्टेशनों की हिंदी सेवा जैसे बीबीसी , वॉयस ऑफ़ अमेरिका , रेडियो डोईचेवैले , और रेडियो जापान आदि जैसी सेवाओं में एक श्रोता के रूप में लिखे सैकडों पत्रों ने । इनके सहारे मिली पहचान (एक पाठक और एक श्रोता के रूप में ) ने मुझे न सिर्फ़ प्रेरणा दी बल्कि बहुत सी बारीकियां और एक पत्रकारीय गुण भी । यहां ये बताना दिलचस्प होगा कि समाचार पत्रों में संपादक के नाम पत्र और रेडियो श्रोता के रूप में उन दिनों एक अनिवार्य नाम सा बन चुका था मैं । और जो थोडी बहुत कमी रही वो पूरी कर दी अंग्रेजी साहित्य की प्रतिष्ठा की पढाई और रूममेट्स के हिंदी साहित्य के प्रेम ने ।


इसने एक ऐसे सफ़र की शुरूआत कर दी जिसने मुझे एक नई दुनिया ही दे दी । साहित्य की , भाषा की , शब्दों की दुनिया , और अपनी आदत के अनुरूप मैं उसमें ऐसा रम गया कि अब ये एक जुनून बन गया है । यहां शायद ये बताना ठीक होगा कि अपने कार्यालय के अलावा मैं अब भी पूरे चौबीस घंटों में कम से कम सात आठ घंटे तो लिख पढ ही लेता हूं , क्या , ये मैं खुद भी नहीं जानता , यानि तय नहीं होता है कुछ भी । कभी सत्रह अखबारों में से सारे के सारे , कभी फ़ेसबुक पर सारे मित्रों के स्टेटस तो कभी जाने कौन कौन से एग्रीगेटर्स से तलाश कर और एक पोस्ट से दूसरी पोस्टों तक भटकते हुए , जितना पढता जाता हूं , उतना ही लिखता भी जाता हूं , और अब तक ये सफ़र अनवरत जारी है ।


अजय कुमार झा
मेरा अंतर्जाल पता :-http://blog.ajaykumarjha.com/
11/248 3rd floor,
geeta colony,
delhi-110031
9871205767

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

कहो तो किस्मत बदल दूँ ( संगीता पुरी )



संगीता जी .... उनसे मेरी मुलाकात 'हिंदी भवन' में हुई , मुलाकात हमारी मुस्कुराहट की और जाना कि वे तो भविष्य देखती हैं . आधुनिकता की छुवन से दूर संगीता जी के चेहरे पर आत्मविश्वास का जो तेज था , वह किसी के कुछ मानने न मानने का मोहताज नहीं था . सधे क़दमों से मंच की तरफ बढ़ते उनके कदम उनकी प्रखरता को स्थापित कर रहे थे .
लौटकर मैं भी अपनी परेशानी का चिटठा लेकर मेल के माध्यम से उन तक पहुँच गई अपने बच्चों के बारे में जानने की उत्कंठा लिए और इतने स्नेहिल ढंग से उन्होंने जवाब दिया कि बता नहीं सकती.... बस इतना कह सकती हूँ कि आसमान यूँ हीं हर किसी के आगे नहीं झुकता !

होते हैं रूबरू संगीता जी से , मेरी कलम से आगे बढ़कर उनकी कलम तक ...

19 दिसंबर 1963 को बोकारो जिले के पेटरवार नामक एक गांव(तब गिरीडीह जिले
के अंतर्गत था) में सुशिक्षित और महत्‍वाकांक्षी माता पिता (श्री विद्या
सागर महथा और श्रीमती वीणा देवी) की पहली संतान के रूप में मेरा जन्‍म
हुआ , इस कारण बचपन के पालन पोषण में मेरे शारीरिक और मानसिक विकास में
उनका पूरा ध्‍यान होना स्‍वाभाविक था। खासकर इस कारण भी कि उनका कैरियर
माता पिता की अस्‍वीकृति की भेट चढ चुका था और वे दादाजी के व्‍यवसाय को
संभालने के लिए खुद परिवार सहित गांव में निवास करना आरंभ कर चुके थे।
उन्‍हें भय था कि गांव के बच्‍चों के साथ खेल कूद में ही मैं अपना जीवन
बर्वाद न कर दूं , इसलिए वे मेरे क्रियाकलापों पर खास ध्‍यान देते।
हालांकि बचपन में मैं शैतानी करने में गांव के सारे बच्‍चों से कम न थी ,
पर शुक्र था कि पढाई में भी कभी पीछे न रही। पापाजी की महत्‍वाकांक्षा ने
मात्र छह वर्ष की उम्र में मुझे चौथी कक्षा में प्रवेश करा दिया , पर मैं
हर कक्षा की पुस्‍तकों को सही ढंग से समझती , हर विषय की विषयवस्‍तु को
संभालती आगे बढती चली गयी और बहुत जल्‍द 1978 में प्रथम श्रेणी से
मैट्रिक की परीक्षा पास की।

आगे की पढाई के लिए दादाजी मुझे होस्‍टल भेजने को तैयार न थे , गांव में
कॉलेज की सुविधा न थी , मेरा अध्‍ययन बाधित ही हो गया होता , पर अचानक
गांववालों ने एक प्राइवेट कॉलेज खोलने का निश्‍चय किया। पापाजी के पास
उसके प्रिंसिपल बनने का प्रस्‍ताव आया , मेरे लिए पापाजी ने कॉलेज को
सेवा देने का निश्‍चय किया और इस तरह इंटर की मेरी पढाई पूरी हुई। इंटर
पास करने के बाद ग्रेज्‍युएशन में पुन: समस्‍या आयी। प्राइवेट कॉलेजों से
पढाई करने पर ‘ऑनर्स’ नहीं मिलता , इसलिए कहीं एडमिशन लेना आवश्‍यक था ,
पर दादाजी बिल्‍कुल भी तैयार न थे। मेरी पढाई को लेकर मम्‍मी और पापाजी
तनाव में थे ही कि अचानक मामाजी का पत्र आया। वे सी सी एल में सर्विस
करते थे और हजारीबाग के एक छोटी सी सी सी एल की कॉलोनी में रहते थे ,
जहां बच्‍चों की पढाई की सुविधा नहीं थी। बच्‍चों की पढाई के लिए
उन्‍होने हजारीबाग में इसी महीने किराए पर एक घर लिया था और मामी सहित
बच्‍चों को शिफ्ट करा दिया था। उन्‍होने पत्र में मेरा नामांकण भी के बी
महिला कॉलेज , हजारीबाग में कराने का प्रस्‍ताव रखा था । गणित में रूचि
होने के कारण मैने अर्थशास्‍त्र में ऑनर्स करने का निश्‍चय किया , ताकि
इसके माध्‍यम से सांख्यिकी और इकोनोमैट्रिक्‍स को पढते हुए मुझे कुछ
संतोष हो सके। इस तरह मेरी पढाई की निरंतरता बनती गयी।

पढने पढाने में मेरी शुरू से ही रूचि रही है , छोटे तीन भाइयों और दो
बहनों में से किसी की भी कोई परीक्षा होती , मैं उन्‍हें पढाने में
व्‍यस्‍त हो जाया करती थी। महिलाओं के लिए कैरियर के रूप में शिक्षा का
क्षेत्र मेरे लिए शुरू से ही पसंदीदा भी रहा है। कॉलेज करते वक्‍त महिला
लेक्‍चररों के जीवन से मैं खासी प्रभावित हुई। इसलिए एम ए करने का
निश्‍चय किया। पर एम ए करने से ही क्‍या हो , तब लेक्‍चररों की स्‍थायी
नियुक्ति नहीं हो रही थी। शहरी क्षेत्र के युवा अस्‍थायी तौर पर क्‍लासेज
ले लिया करते थे , धीरे धीरे उनकी स्‍थायी नौकरी भी हो गयी। गांव में
निवास करनेवाली मेरे लिए यह संभव नहीं था , 1988 में विवाह के बाद भी एक
छोटी कॉलोनी में ही मेरा रहना हुआ। यहां भी कैरियर का कोई विकल्‍प न था ,
मन मसोसकर ससुराल में अपने पारिवारिक दायित्‍वों को निभाती चली गयी।

विद्यार्थी जीवन से ही मेरी रूचि ज्‍योतिष की ओर गयी , जिसमें पापाजी को
दिन रात उलझे हुए देखा था। पापाजी बहुत सी ऐसी बातें पहले बताते , जो बाद
में घटित होती थी। विभिन्‍न ज्‍योतिषीय पत्र पत्रिकाओं में पापाजी के लेख
प्रकाशित होते और उन्‍हें तरह तरह की उपाधियां मिलती , जिसे देखकर मैं
प्रभावित हुआ करती थी। ज्‍योतिष के अध्‍ययन के क्रम में उन्‍होने इसकी कई
कमजोरियां महसूस की थी और उसे दूर करते हुए ज्‍योतिष की एक शाखा के रूप
में ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ का विकास 1975 से 1987 के दौरान कर लिया था।
विवाह के बाद अपनी पहचान को खोते देख मैने भी ज्‍योतिष का अध्‍ययन आरंभ
किया। पति के भरपूर सहयोग के कारण दोनो बेटों के पालन पोषण की
जिम्‍मेदारियों के बावजूद भी 1991 से ही विभिन्‍न ज्‍योतिषीय पत्र
पत्रिकाओं में मेरे आलेख प्रकाशित होने शुरू हो गए और दिसंबर 1996 मे ही
मेरी पुस्‍तक ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष: ग्रहों का प्रभाव’ प्रकाशित होकर आ
गयी। इसे पाठकों का इतना समर्थन प्राप्‍त हुआ कि प्रकाशक को शीघ्र ही
1999 में इसका दूसरा संस्‍करण प्रकाशित करना पडा।

वर्ष 2002 में पापाजी के सिद्धांतों को कंप्‍यूटराइज्‍ड करने की इच्‍छा
ने मुझे कंप्‍यूटर क्‍लासेज जाने को प्रेरित किया। एम एस ऑफिस सीखकर ही
मैने ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सिद्धांत की कुछ प्रोग्रामिंग कर ली थी।
एक्‍सेल की शीट पर सारी गणनाएं और एम एस वर्ड के मेल मर्ज का सहारा लेकर
हर ग्रह स्थिति की भविष्‍यवाणी के लिए प्रोग्रामिंग कर लिया था , पर उससे
मुझे संतोष नहीं हो सका और पुन: वी बी सीखने का मन बनाया। वी बी सीखने के
बाद ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सिद्धांतों पर आधारित एक सॉफ्टवेयर
‘प्रीडेस्‍टीनेशन’ तैयार कर चुकी हूं , जो अभी मेरे पीसी में ही इंस्‍टॉल
है। इस सॉफ्टवेयर में जन्‍मतिथि , जन्‍मसमय और जन्‍मस्‍थान भरने पर
जन्‍मकालीन ग्रहों के आधार पर यह व्‍यक्ति के पूरे जीवन के उतार चढाव ,
महत्‍वाकांक्षा और सफलता का जीवनग्राफ निकालने के साथ साथ व्‍यक्ति के
चरित्र तथा छह छह वर्षों की परिस्थितियों के बारे में जानकारी देता है।
इस सॉफ्टवेयर में हिंदी में काम करने में कई बाधाएं आयी थी।

अब ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के प्रचार प्रसार के कार्यक्रम को अंजाम देने
की बारी थी , पर मेरे घर से बाहर कदम रखने से बच्‍चों के पढाई लिखाई में
व्‍यवधान आता , इसलिए मैने घर में रहकर ही 2003 में ‘गत्‍यात्‍मक
ज्‍योतिष’ को इंटरनेट के माध्‍यम से प्रचारित प्रसारित करने का कार्यक्रम
बनाया। बी एस एन एल ने अपने ग्राहकों को कुछ वेब पर कुछ पन्‍ने दिए थे ,
मैने उसमें ही इससे संबंधित जानकारी डाली। उस समय वेब पर हिंदी लिखने के
बारे में मुझे जानकारी नहीं थी , इसलिए अंग्रेजी में ही सारे लेख डालें।
2004 में पहली बार ब्‍लॉग बनाकर उसमें हिंदी के कृतिदेव फॉण्‍ट में अपना
एक प्रकाशित करने की कोशिश की , पर हिंदी प्रकाशित नहीं हो सकी। 2007 में
रजनीश मंगला जी के कृतिदेव से यूनिकोड में परिवर्तित करने के टूल की
जानकारी होते ही मैने सफलतापूर्वक अपने आलेखों को ब्‍लॉग में प्रकाशित
किया। उस समय मैं वर्डप्रेस में लिखा करती थी , एक वर्ष बाद 2008 में
ब्‍लॉगस्‍पॉट पर लिखना आरंभ किया। शीघ्र ही कई ब्‍लॉग बना लिए और उसमें
लगातार लिखती रही। ज्‍योतिष से जुडे लेखों के अलावे मैने कुछ कहानियां भी
लिखी हैं।

इतने वर्षों से ज्‍योतिष के अध्‍ययन मनन के बाद अपने विचारों को
अभिव्‍यक्‍त करने के लिए ब्‍लॉगिंग का एक आधार पाकर बहुत खुशी मिली ,
अपने ब्‍लॉग में जहां एक ओर पाठकों को ज्‍योतिष की इस नई शाखा से परिचय
करवाया गया है , वहीं दूसरी ओर समय समय पर कुछ सटीक भविष्‍यवाणियां क‍र
लोगों को ज्‍योतिष के प्रत विश्‍वास को बढाया गया है। जनसामान्‍य में
ज्‍योतिष और धर्म से जुडी भ्रांतियों को दूर करना ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’
का मुख्‍य लक्ष्‍य है और इसमें मुझे सफलता मिलती दिखाई दे रही है। बहुत
सारे पाठकों से विचारों का आदान प्रदान , तर्क वितर्क करना अच्‍छा लगता
है। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के दोनो ब्‍लोगों ने एक एक लाख की विजिटर्स
संख्‍या को पार कर लिया है , पाठकों के इस प्रकार सहयोग मिलने से मैं
बहुत खुश हूं। इसी दौरान दोनो बेटे अपनी इंजीनियरिंग की पढाई में
व्‍यस्‍त हो चुके हैं , इसलिए आनेवाले दिनों में मैं ब्‍लॉगिंग को अधिक
समय दे सकूंगी , उम्‍मीद करती हूं कि पाठकों का पूर्ण सहयोग मुझे
प्राप्‍त होगा और समाज से ज्‍योतिषीय भ्रांतियों को दूर करने के प्रयास
में मुझे सफलता मिलेगी।


सोमवार, 4 जुलाई 2011

भीड़ में भी अलग- (एस.एम् हबीब)



एस.एम् हबीब से मेरी मुख्य पहचान हुई द्रौपदी के माध्यम से ... जी हाँ द्रौपदी - जिसे संगीता स्वरुप जी ने प्रासंगिक तौर पर उठाया , मैंने द्रौपदी को आधार बनाया एस.एम्.हबीब ने द्रौपदी के प्रश्नों का उत्तर दिया - http://urvija.parikalpnaa.com/2011/05/blog-post_6242.html
और इसके बाद गहराई से मैंने इनको पढ़ना शुरू किया और जाना उनको उनके ही शब्दों में - ज़मीरे खुद में देखा, फ़क़त तारीको खलाश है. खुद को न पा सका, मुझे अपनी ही तलाश है.
मैं और प्रभावित हुई जब मैंने पढ़ा -
एक बुनियादी फर्क होता है
इंसान और पत्थर में,
चेतनता और जड़ता का...
किन्तु दोनों में
एक विचित्र संयोग भी देखा मैंने-
"लहू बहाते वक़्त अक्सर पत्थर हो जता है इंसान!!!" सूक्ष्म विचारों के बीच से जो गुजरता है , वह भीड़ में भी अलग होता है !

भीड़ में होकर भी भीड़ से अलग एस.एम्.हबीब को जानें उनके द्वारा -

नाम - एस. एम्. हबीब (संजय मिश्रा 'हबीब')
जन्म - १४ जुलाई १९६५
जन्मस्थान - रायपुर छत्तीसगढ़
पिताजी - स्व. गोपाल चन्द्र मिश्रा
शिक्षा - स्नातक
कार्यक्षेत्र - (शासकीय) नेत्र सहायक अधिकारी रायपुर छत्तीसगढ़
प्रकाशन - कलरव (संयुक्त काव्य संग्रह)
- स्थानीय पत्र पत्रिकाओं में कवितायें, कहानी, व्यंग्य प्रकाशित.
- (कुछ किताबों में आवरण निर्माण और रेखाचित्र)
सम्पादन - 'ब्रह्मास्त्र - १०' (सामाजिक पत्रिका)
पुरस्कार - "साहित्य प्रहरी पुरस्कार - 2010" (चेतना साहित्य एवं कला परिषद् छ. ग.)
रूचि - पठन, लेखन, चित्रकारी.
पता - ३०/५१८, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी प्रतिमा के पीछे, आजाद चौक रायपुर छत्तीसगढ़.
४९२००१. फोन - ०७७१-४०१०८०८ | ९३२९५८०८०३ | ९४०६३८०८०३

घर में सभी को पुस्तकों से बड़ा लगाव रहा. बचपन से ही दादा जी को पढ़ते देखा. उनके पास संस्कृत, हिंदी, उर्दू, बांग्ला, गुजराती, उडिया आदि भिन्न भिन्न भाषाओं की जाने कितनी किताबें थीं. उनका इन सभी भाषाओं पर कमाल की पकड़ थी. उनसे ही मुझे उर्दू का कायदा, और बांग्ला भाषा का प्रारंभिक ज्ञान मिला और एनी भाषाओं के प्रति जिज्ञासा भी जागी. मैनें एक बार उनसे उत्सुकतावश पूछता "बाबा, आपने कोई किबाब नहीं लिखी?" वे हंस कर एकदम सादगी से बोले "नहीं रे... दुनिया में इतनी सारी किताबें हैं पढने के लिए, इतनी चीज़ें हैं सीखने के लिए कि वक़्त ही नहीं बचता कुछ लिखूं..." और उन्होंने मुझे एक किताब दी. अनिल बर्वे की "थेंक यु मि. ग्लाड" देशभक्ति और मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण इस प्रहसन ने जैसे विशाल साहित्य जगत का द्वार मेरे लिए खोल दिया... दादा जी की प्रेरणा से जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, फनीश्वरनाथ रेनू, आचार्य चतुरसेन शाष्त्री, कालिदास, महादेवी वर्मा, निराला, पन्त, बच्चन, धर्मवीर भारती, अमृता प्रीतम, सहित टालस्टाय, गोर्की, मोपांसा, एंटन चेखव इत्यादि कालजयी रचनाकारों की किताबों से गहरी मित्रता हो गयी... आज भी ये मेरे अभिन्न मित्र हैं और मेरा संबल भी.... इनकी उंगली थामे चलते हुए ग्रेजुएसन के बाद कुछ वक़्त हाई स्कूल में अध्यापन कार्य किया साथ ही कुछ समाचार पत्रों में कार्य करते हुए नेत्र विज्ञान में डिप्लोमा की और वर्तमान में शासकीय चिकित्सालय में कार्यरत हूँ. बहुत ज्यादा लेखन नहीं किया है. कभी अंतर में भावों का दरिया फूट पड़ता है तो रचनाओं के रूप में संकलित कर लेता हूँ. चेतना साहित्य एवं कला परिषद् द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह 'कलरव' में छत्तीसगढ़ प्रदेश के छः प्रतिष्टित कवियों की रचनाओं के साथ मेरी १० कवितायें संकलित हैं का विमोचन अभी हाल में संपन्न हुआ है. आतंकवाद पर लिखी अपनी एक कहानी "अतीत" का नन्हा पात्र 'हबीब' अनायास मेरे नाम के साथ चलने लगा.... इस कथा के एक संवाद " कि हबीब, तू अपने नाम की तरह सारी खिलकत का दोस्त बनना" के सादे व सहज अर्थ को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करता हूँ....

मुझसे मिलें - http://smhabib1408.blogspot.com/

रविवार, 3 जुलाई 2011

वाकई हम कायल हैं - (रेखा श्रीवास्तव )

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कोई हंसेगा नहीं .... आपस की बात है, जब मेरे पास पहली बार रेखा श्रीवास्तव जी के ब्लॉग का लिंक आया और मैं वहाँ गई तो सच कहती हूँ - मेरे तो हाथ पाँव फूल गए ... हर आर्टिकल किसी शोध से कम नहीं लगता था और अज्ञानी की तरह टुकुर टुकुर देखती, पढ़ती ... समस्या तो तब आती जब अंत में टिप्पणी देने की बारी आती ! ' संसद के कारनामे', 'मी लॉर्ड हम भूखे मर जायेंगे' ... ऐसे आलेख इनके समक्ष मुझे नतमस्तक कर देता और नतमस्तक मैं बाँए-दांये देखती अपने घर लौट आती - कई बार बिना टिप्पणी दिए और बाई गौड मुझे लगता रेखा जी ने मुझे पकड़ लिया है . ये समस्या थी , मेरा सरोकार , मेरी सोच ... में , hindigen में मुझे अपनी खुराक मिली , मन ही मन धन्यवाद दिया - चलो कुछ तो मेरे लिए परोसा .
परिकल्पना ब्लोगोत्सव के आयोजन में अचानक रेखा जी मुझे मिलीं ... फिर अन्दर में नन्हा मन डरा पर ऊपर से बोला - नमस्ते नमस्ते ... बोलिए , यदि मैं अपनी इस स्थिति का खुलासा ना करती तो क्या आप समझ पाते !
अभी हाल में बचपन के संस्मरण की मांग ने , और उस संस्मरण पर उनकी टिप्पणी ने कहा - 'घबराने जैसी कोई बात नहीं , ये तो बहुत अच्छी हैं ' . पर विद्वता ... वाकई हम कायल हैं .
अब आगे की यात्रा उनके शब्दों में -


अपने बारे में कुछ विशेष कहने को नहीं है फिर भी बहुत कुछ है कि शब्दों की सीमा में बांधना मुश्किल हो रहा है. मैंने एक छोटे से कस्बे बुंदेलखंड के उरई नामक जगह पर जन्म लिया. मध्यम वर्गीय कृषि और गाँव से जुड़ा मेरा परिवार. लेकिन पापा मेरे शहर में ही पढ़े रहे सो हम भी वही के हो लिए. मेरे पापा वाकई विद्वान् थे उस समय उन्हें पांच भाषाओं पर पूरा अधिकार था. वे हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत और फारसी भाषा जानते थे. पढ़ने के बेहद शौक़ीन और यही रोग हम भाई बहनों में भी लग गया. मूल्यों औ सिद्धांतों का पालन भी हमें विरासत में मिला और उसे समय के साथ भी मैं छोड़ नहीं पाई वैसे बहुत कष्ट पाया और वो हासिल न कर सकी जिसकी मैं हक़दार थी लेकिन समझौता मुझे कभी मंजूर नहीं था. मेरे आदर्श और मूल्य ही मेरी सबसे बड़ी दौलत हैं.
मेरे पापा भी कविता लिखते थे, (लेकिन ये बात मुझे पता नहीं थी) मैंने बचपन से लिखना शुरू कर दिया था पहली कहानी १० वर्ष कि आयु में "दैनिक जागरण " के बाल जगत में प्रकाशित हुई थी. चार बहनों में सबसे बड़ी थी और भाई साहब मुझसे बड़े. मैं सबसे अलग थी सिर्फ घर में नहीं बाहर भी लोगों कि प्रिय थी. शादी से पहले डबल एम ए कर चुकी . सामाजिक समस्याओं से मेरा सरोकार हमेशा से ही रहा और लेखनी उस पर ही चलती रही. अधिकतर यथार्थ पर चली और वही आज भी मेरा ब्लॉग यथार्थ उसका साक्षी है. १९७२ में लेखन ने अपने पर व्योम में फैलाने शुरू किये और राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशन शुरू हो गया. १९७५ में मेरी पहली कविता कादम्बिनी में पहली बार प्रकाशित हुई. फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा. लेख अधिक लिखे साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, मनोरमा, सारिका, सरिता और नवनीत सभी में प्रकाशन हुआ. अपने कस्बे में ही नहीं बल्कि बाहर भी पहचान बन चुकी थी.
१९८० में शादी के बाद कानपुर आह गयी लेकिन मेरे लेखन के कद्रदान सिर्फ मेरे पतिदेव ही थे. छोटी बहू के दायित्वों तले मेरा लेखन दम तोड़ने लगा . ३१ साल पहले आम घरों की तरह मेरा भी घर था. काम और काम के ही सब चाहने वाले थे. हर घर की तरह भी मुझे भी अपने को सिद्ध करना पड़ा. बी एड और एम एड शादी के बाद किया. जो एक अग्नि परीक्षा थी. लेकिन हारी नहीं क्योंकि साथ देने वाले का पूर्ण सहयोग रहा. मेरे नोट्स तक बनवाये. आम घरों की तरह से कटाक्ष, असहयोग और छोटे होने की पीड़ा मैंने भी झेली और उसको डायरियो में कैद करती गयी तभी इतना सब झेल सकी. लिखने पर विराम सा लग गया . मेरी दो बेटियाँ हैं और दोनों ही मेडिकल क्षेत्र से जुड़ी हैं.
१९८६ में आई आई टी में नौकरी लगी एक साल बाद मशीन अनुवाद से जुड़ी. कंप्यूटर तब इतने कॉमन नहीं थे. धीरे धीरे मिले और उसकी ए बी सी डी वहीँ गुरुजनों से सीखी. और फिर 'करत करत अभ्यास ते....' पारंगत हो गयी. शौकिया तौर पर कानपुर विश्वविद्यालय से डिप्लोमा कोर्स किया जिसका सर्टिफिकेट आज भी वहीँ पड़ा है.
जब नेट का प्रयोग करने को मिला तो ब्लॉग के बारे में जाना और बना ही डाला फिर खो गया और मैं भी भूल गयी. फिर कभी यूँ ही चलते चलते फिर मुलाकात हो गयी तो फिर मैं ऑफिस में एक डायरी रखती थी जिसमें कविता, कहानी, लेख लिखती रहती थी. बीच के वर्षों में लेखनी सोयी नहीं - संयुक्त परिवार और नौकरी के बीच जूझती रही लेकिन संवेदनशील मन तूफान रहित तो नहीं था - आक्रोश, विवशता और अन्याय के खिलाफ जुबां नहीं खुल पाई तो क्या कलम पर पहरे कोई नहीं लगा पाया और जो लिखा जाता रहा संगृहीत होता रहा.
ब्लॉग बना कर सब कुछ उस पर डाल दिया. अब तो निर्बाध कलम चलती है क्योंकि बेबाक बोलने, लिखने और कहने से डरती नहीं हूँ. मेरी पहचान बचपन से लेकर आज तक जहाँ भी रहीं अलग बनी रही. आज भी है. मेरे लेखन ने मुझे एक नई पहचान स्कूल के समय में जब देश में खाद्य समस्या में चुनौती बनी थी तब इंटर कॉलेज में आठवें कक्षा की लड़की ने कलम चला कर अपना नाम सब स्कूलों के बीच दर्ज करवा कर पहला पुरस्कार जीता था. आई आई टी में भी सिर्फ दो बार हिंदी पखवारे में कविता पथ करके प्रथम पुरस्कार प्राप्त किये. ब्लॉग बनाने अपने ब्लोगर मित्रों से बहुत दिशा निर्देश मिला तो कुछ कर पा रही हूँ. मेरे ब्लॉग लेखन को जनसत्ता, हिंदुस्तान, उदंती पत्रिका, और भी कई पत्रों में स्थान दिया गया लेकिन सच कहूं - मुझे खुद पता नहीं चल पता है कि क्या कहाँ ले लिया गया है ? . ये सब मुझे मेरे ब्लोगर बंधुओं से ही खबर मिल पाती है क्योंकि मैं ब्लॉग जगत में घूमने का समय काम निकाल पाती हूँ . ब्लॉग जगत में परिकल्पना, वटवृक्ष पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती रहती हूँ. अभी हाल में ही प्रकाशित " हिंदी ब्लोगिंग - अभिव्यक्ति की नई क्रांति" जो अविनाश वाचस्पत और रवींद्र प्रभात द्वारा सम्पादित पुस्तक में भी एक पृष्ठ मेरे नाम भी है. बस इतनी सी कहानी है.
जीवन के प्रति मेरा यही दृष्टिकोण रहा है, अपने लिए तो सब जीते हैं अगर अपने जीवन में कुछ पल की खुशियाँ उनको भी दे सकूं जो उदास मन लिए दो पल ख़ुशी को तरसते हैं. कुछ कर पाई औरों के लिए यही मेरी सबसे बड़ी ख़ुशी है और उससे भी बड़ी ख़ुशी कि मेरे स्वभाव के अनुरुप मेरे पति और मेरी दोनों बेटियाँ हैं. यही ईश्वर का प्रतिफल मुझे आत्मिक ख़ुशी देता है. इसके साथ ही काउंसिलिंग मेरा शौक है. कोशिश करती हूँ कि इससे कुछ भटके हुए लोगों को सही दिशा दिखा सकूं. कई दरकते हुए दाम्पत्य जीवन जोड़ने में सफल रही, कुछ भटकते युवाओं को उस रास्ते से हटा कर सही ही दिशा दी. ये मेरे लिए सबसे बड़े इनाम हैं
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रेखा श्रीवास्तव
09307043451

शनिवार, 2 जुलाई 2011

सपनों वाली वो लड़की यानि मैं रश्मि प्रभा



मेरी कलम ने परिचय का आदान -प्रदान किया तो भीड़ से एक आवाज़ आई जानी पहचानी - 'मुझे आपके बारे में भी जानना है ....' मेरे बारे में ? फिर कैनवस पर औरों को उकेरते हुए मैंने बार बार पलट कर खुद को देखा , कोई खासियत मिले तो कोई रंग दूँ .... जब भी देखा , उसकी आँखों में मुझे उड़ते बादल नज़र आए . कल रात मैंने कुछ बादल चुरा लिए , शायद उसके भीतर से परिचय का कोई सूत्र मिल जाए !
प्रसाद कुटी की सबसे छोटी बेटी ! हाँ अब तो वही है सबसे छोटी जबसे वह नहीं रहा - उसका छोटा भाई संजू . ६ भाई बहनों की दुनिया थी , संस्कारों की , उचित व्यवहार की सुबह होती थी . सुबह होते पापा के कमरे में सब इकट्ठे होते , कभी भजन , कभी कोई खेल , तथाकथित अच्छी सीख - 'कुछ भी करो तो सोचो , ऐसा सामनेवाला करेगा तो कैसा लगेगा !' सामनेवाले का ख्याल करते करते बीच से संजू चला गया , अच्छाई की बलिवेदी पर वह गुम हो गया . ओह ,मैं नाम तो बता दूँ खुद का - आपके बीच रश्मि प्रभा के नाम से जानी जानेवाली इस लड़की की शुद्ध पहचान इसके घर के नाम से है - 'मिन्नी' , वो भी 'काबुलीवाले की मिन्नी ' .रश्मि नाम कवि पन्त ने दिया और इस रश्मि नाम से इसने पढ़ाई की और अब लिखने लगी है . सच तो ये है कि जब रश्मि नाम से पुकारा जाता है तो वह भी इधर उधर देखती है , फिर याद करती है कि ये तो मैं हूँ ! है न अजीब सी बात ? जी हाँ अजीब बातों वाली यह लड़की अजीब सी ही है बचपन से .
छोटा सा घर पर्ण कुटी सा फूलों से भरा रहा . छोटा सा दायरा - बस पापा , अम्मा, तीन बड़ी बहनें , खुद से बड़े भईया और वह , संजू तो बचपन में ही चला गया . पढ़ाई , साहित्य और स्नेह का वातावरण रहा घर में , पराये की कोई परिभाषा ही नहीं दी गई . पडोसी सगा , दोस्त सगा .... मामा, चाचा,मौसी, भईया, दीदी संबोधन के साथ सब अपने थे . सीख तो निःसंदेह बड़ी अच्छी थी, सुनने , सुनाने में बहुत अच्छा लगता है - पर यह ख्याल तिल तिलकर मरने के लिए काफी था . पापा ने हमें 'अपनों' की विस्तृत परिभाषा दी , और उन सारे अपनों का अपना अपने संबंधों से रहा . पापा से प्रश्न उठाऊं , तर्क करूँ - उस वक़्त न इतनी हिम्मत थी , न सुलझे ढंग से बात रखना आता था . बहुत छोटी उम्र से यह मंथन चलता रहा और इसी मंथन ने मुझे खुद से बाहर निकलकर खुद को देखना सिखाया . ना सीखती तो सर सहलाकर खुद को राहत कैसे देती !
जन्म सीतामढ़ी (डुमरा ) . प्रारंभिक शिक्षा सीतामढ़ी(डुमरा) में हुई . पापा प्राचार्य थे , अम्मा के साथ कहानी, कविताओं से पहचान हुई .... 1970 में हम तेनुघाट आ गए , स्कूल की शिक्षा वहीँ पूरी हुई , फिर रांची महिला महाविद्यालय से स्नातक , हिस्ट्री ऑनर्स के साथ .
जीवन के उतार-चढ़ाव की बात करूँ तो बेतरतीब लकीरें खींचती चली जाएँगी .... बस इतना बताऊँ कि हर आड़ी तिरछी लकीरों के मध्य से निकल मैंने सोचा -
'मरण देख तुझको स्वयं आज भागे
उड़ा पाल माझी बढा नाव आगे ...'
और मेरी पतवार को सार्थक बनाया मेरे तीन बच्चों ने - (मृगांक, खुशबू, अपराजिता ). इतनी मजबूती से पतवार को थामा कि बिना पाल खोले भी हम आगे बढ़ गए . 2007 में खुशबू ने मेरे लिए ब्लॉग बनाया , जिसमें मदद मिली हिंदी ब्लौगिंग के जानेमाने चिट्ठाकार संजीव तिवारी से (http://aarambha.blogspot.com/) . हिंदी में कैसे शुरुआत हो, कैसे औरों से संपर्क हो यह उन्होंने ही बताया .
मैं तो कंप्यूटर देखते डर जाती थी, पर खुशबू ने मुझे सब सिखाया और धीरे धीरे मैंने पंख फैलाये . आकाश में कई सशक्त पंछी पहले से थे , अपनी उड़ान के साथ उन सारे पंछियों ने आनेवाले हर पंछियों का स्वागत किया . मैं सबकी शुक्रगुजार हूँ .
'कादम्बिनी' में तो बहुत पहले प्रकाशित हुई थी मेरी रचना - 'अकेलापन' ,(वर्ष तक याद नहीं ) उस समय उसके संपादक थे - श्री राजेंद्र अवस्थी जी .
'सिंह कभी समूह में नहीं चला
हँस पातों में उड़े
इन पंक्तियों का स्मृति बाहुल्य था
बहुत से ह्रदय मेरे संग नहीं जुड़े ...
जग को अपने से परे माना
मेरे जीवन की सम्पूर्णता आकाश में समा गई
जब इसे अपनी उपलब्धि मान
मैंने अपनाना चाहा
मेरे अकेलेपन को नींद आ गई '...........................
कलम मेरी शक्ति रही, भावनाएं मेरा आधार ... पर इससे परे भी मैंने बहुत कुछ किया . छोटे से स्कूल में पढ़ाया , टयूशन पढ़ाने गई, प्राइवेट बैंक में काम किया , हर्बल उबटन बनाया ..... लेकिन मेरा सुकून मेरा ब्लॉग बना .अपने होने का एहसास होता है , कोई मुझे पढ़ता है - इसकी ख़ुशी होती है . फिर मैं हिन्दयुग्म से जुडी ... 'ऑनलाइन कवि सम्मलेन ' 'गीतों भरी कहानी ' ने मुझे एक अलग पहचान दी . हिन्दयुग्म से ही मेरा काव्य-संग्रह 'शब्दों का रिश्ता' प्रकाशित हुआ और जनवरी 2010 के बुक फेयर में इमरोज़ के द्वारा उसका विमोचन हुआ और लोगों के बीच मेरी पहचान बढ़ने लगी. फिर रवीन्द्र प्रभात जी की परिकल्पना से मैं जुडी (2010 में ), वर्ष की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री के सम्मान के साथ मैंने ऑनलाइन वटवृक्ष का संपादन शुरू किया रवीन्द्र प्रभात जी के साथ .फिर 30 अप्रैल 2011 को त्रैमासिक पत्रिका के रूप में इसे हमने लोगों के मध्य रखा . मेरे संपादन में 'अनमोल संचयन ' , ' परिक्रमा ' का प्रकाशन हुआ , ' अनुगूँज ' प्रकाशनाधीन है.
ये सारे कार्यकलाप खुद में रहने का उपक्रम है, अन्यथा -' दुनिया चिड़िया का बसेरा है , ना तेरा है ना मेरा है ....'

गुरुवार, 30 जून 2011

बरगद सी विशालता (अशोक आंद्रे )



अशोक आंद्रे ... कथासृजन ब्लॉग http://wwwkathasrijan.blogspot.com/ पर जिस दिन मैं गई , मैंने पढ़ा -
आँख बन्द होते ही
एहसासों की पगडण्डी पर
शब्दों का हुजूम
थाह लेता हुआ बन्द कोठरी के
सीलन भरे वातावरण में
अर्थ को छूने के प्रयास में
विश्वास की परतों को
तह - दर -तह लगाता है
जहाँ उन परतों को छूने में , हर बार
पोर - पोर दुखने लगता है ।
और लगा किसी ने अपने पोर पोर में उठे दर्द में जाने कितनी पगडंडियाँ समेट लीं . एक आशीर्वचन सा लगा उनका व्यक्तित्व और मैंने उनको फ़ोन किया , उम्र के अनुभव सबकी आवाज़ में नहीं होते . मुझे उनकी आवाज़ में बरगद सी विशालता मिली . कम शब्दों में कोई बहुत कुछ कह जाए , समझिये - उसने ज़िन्दगी को बहुत करीब से जाना है , और वो भी दूसरों की शर्तों पर !
मुझे उनकी हर रचनाएँ बोलती मिलीं .... तो मेरा फ़र्ज़ बनता है न कि मैं आपको भी वहाँ ले चलूँ और अशोक जी से उनका परिचय पाऊं .

बचपन में माँ का चले जाना उस जगह जहां से कभी कोई लौट के नहीं आ सका. उम्मीदों
के सारे रास्ते बंद हो चुके थे . घर में सबसे बड़ा था इसलिए सबकुछ महसूस कर रहा था और
अन्दर तक दहल गया था.किसको अपनी व्यथा बताता ,कुछ समझ नहीं आता था .
उसी दौरान हमारे घर के पास लायब्रेरी का उद्घाटन हुआ था . उस तरफ आकर्षित होकर किताबों की दुनिया में खो गया था. लगा शब्दों में बहुत ताकत है जो हमें व्यवस्थित करने में तथा अपने उदगारों को लोगों तक पहुँचाने का सबसे सशक्त माध्यम है.
उसी दौरान वार एंड पीस , टेल आफ टू सीटीज तथा GreatExpectation जैसे उपन्यासों से गुजरना
हुआ.जिसने मेरी जिन्दगी के मूल्यों को बदल डाला.
पहली बार एक कविता "द फ्लावर " लिखी थी जिसे मेरे इंग्लिश के टीचर ने बिना बताए उसे एक
मैगजीन में छपने के लिए भेज दी और वह छप भीगयी. मैं उसकी महत्ता से अनजान संभाल
कर रख न पाया .
धीरे-धीरे मैं लेखन से जुड़ता चला गया. शुरुआत आकाशवाणी से हुई थी .स्वर्गीय श्री राम नरेश
पाण्डेय जी, स्वर्गीय श्री सत्येश पाठक जी तथा श्री सोम ठाकुर जी जैसे विद्वानों के आशीर्वाद
सेहो अपनी साहित्यिक यात्रा को नये आयाम देता चला गया.
लेकिन पहली बार स्वर्गीय श्री दुर्गा प्रसाद नौटियाल जी ने साप्ताहिक हिन्दुस्तान में मेरी बाल
कविता छापकर मेरा हौसला बढ़ायाऔर श्री विजय किशोर मानव जी ने भी दैनिक हिन्दुस्तान में मेरी कई रचनाओं को विशेष स्थान देकर प्रोत्साहित किया.
उसी दौरान कई कहानियाँ भी लिखीं जिनसे अपने समय को तथा जीवन की तरल सच्चाइयों
को करीब से जानने का मौका मिला .
आज लगता है कि मैं अगर साहित्य की दुनियां में नहीं आता तो शायद मौत से असली
साक्षात्कार हो गया होता तथा किसी गुमनाम बस्ती में रहकर जीवन की माला के अंतिम मानकों
पर चलता हुआ आखिरी यात्रा की तरफ चला गया होता.
(अशोक आंद्रे )
जीवन परिचय -
जन्म -०३मार्च १९५१,कानपुर (उ प)
प्रकाशित कृतियाँ -फुनगियों पर लटका एहसास
खिलाफ अँधेरे के
नटखट दीपू
चूहे का संकट
कथा दर्पण (संपादित )
सतरंगे गीत ( ")
सम्मान - राष्ट्रीय हिंदी सहस्त्राब्दी सेवी सम्मान 2001
हिंदी सेवी सम्मान 2005 ( जैमिनी अकादमी (हरियाणा )
आचार्य प्रफुल चन्द्र राय स्मारक सम्मान २०१० (कोलकता)
ट्वंटी टेन राष्ट्रिय अकेडमी एवार्ड (हिंदी साहित्य ) २०१० (कोलकत्ता )