बुधवार, 23 नवंबर 2011

मैं खुद कविता हूँ अंतहीन- नीलम प्रभा




नीलम प्रभा , नाम से क्या परिचय दूँ ..... इस नाम से मेरा भी संबंध है . जी , नीलम प्रभा मेरी बड़ी बहन हैं , ... पर इस रिश्ते से अलग वह एक अलाव है - जिसमें भावनाओं की तपिश है . कलम में उसकी सरस्वती भी हैं , दुर्गा भी हैं ... नहीं ज़रूरत उसे आकृति लिए पन्नों की , मुड़े तुड़े, बेतरतीबी से फटे हुए पन्नों को भी वह जीवंत बना देती है , जब उसमें से कृष्ण का बाल स्वरुप दिखता है इन शब्दों में -

" हैं कृष्ण किवाड़ों के पीछे
और छड़ी यशोदा के कर में
क्या करूँ हरि ये सोच रहे
फिर पड़ा हूँ माँ के चक्कर में ...."

सच तो ये है कि उसके पास ख्यालों के कई कमरे हैं ... तिल रखने की भी जगह नहीं , पर महीनों गुजर जाते हैं ... कमरे की सांकल खुलती ही नहीं ! उसे कहना पड़ता है - " खोलो तो द्वार , ख्याल सिड़ न जाएँ ..." बेतकल्लुफी से वह कहती है , " ख्याल नहीं सिड़ते... और फिर मैं तो अलाव हूँ , जहाँ सूरज ठहरता है खोयी गर्मी वापस पाने के लिए ..." ( ऐसा कुछ वह कहती तो नहीं , पर उसके तेवर यही कहते हैं !)
उसे आप कुछ भी लिखने को कहिये , वह यूँ लिखकर देती है - जैसे पहले से लिखा पड़ा था .
आप उसे खूबसूरत से खूबसूरत कॉपी दीजिये , पर फटे पन्नों पर ही वह आड़े तिरछे लिखती है ....... ऐसा करके शायद वह इन एहसासों को पुख्ता करती है कि " ज़िन्दगी कभी सीधे समतल रास्ते से मंजिल से नहीं मिलती ..."

यह परिचय जो आपके सामने है , वह भी बस पुरवा का एक झोंका है .... ' लो लिख दिया - खुश ?' मैं तो खुश हूँ ही , क्योंकि मैं उसे जानती हूँ , उसकी हर विधा से वाकिफ हूँ ....

अब उसकी कलम में आप देखिये - वह क्या है !


क्या कहकर परिचय दूँ अपना!
कि मैं पैदा हुई कहाँ और कहाँ पढ़ी ?
खड़ी थी कब ऊँचे शिखरों पर कब उतरी ?
कितनी किताबें हुईं प्रकाशित , मिले हैं कितने पुरस्कार ?
किन लम्हात ने मेरी कलम में शब्दों में पाया आकार ?

इस परिचय की मुझको है दरकार नहीं
ऐसा कुछ मेरे मैं को स्वीकार नहीं।

माँ से केवल नाम नहीं पाया मैंने
कलम भी मेरे हिस्से विरासत में आई
पिता से यह सुनकर मैं बड़ी हुई
’मेरी बेटी ने असाधारण प्रतिभा है पाई'

अपने सभी निज़ामों को खुसरो की तरह मैं प्रिय रही
इसीलिए गर्दिश में भी, जीवन की सुंदर कथा कही

जायदाद ’ग़र कलम की हाथ नहीं आती
तो मैं निश्चित बरसों पहले मर जाती

घर और घर के रिश्तों का हावी होना
तय था जो भी कुछ था सब भावी होना

बेशक! सब अपनों ने देखा भाला था
पर बिना शर्त जिन्होंने मुझे सँभाला था
वह मेरी कलम, कविता थी मेरी - ये क्या न बनीं मेरी खातिर!
आब बनीं, आहार बनीं, आधार बनीं, अधिकार बनीं,
हर मौके का इज़हार बनीं, मेरा पूरा परिवार बनीं
अब क्या कहना कि क्या है कलम और कविता क्या है मेरे लिए!

है कलम मेरी मेरा वजूद, मैं खुद कविता हूँ अंतहीन
ये दीन मेरा, मेरा यक़ीन
मेरे ख्वाबों की सरज़मीन
ये आफ़रीन, मैं आफ़रीन
हो इनसे अलग मैं कुछ भी नहीं, हो इनसे अलग मैं कुछ भी नहीं।

नीलम प्रभा
डी पी एस , patna

गुरुवार, 17 नवंबर 2011

निष्पक्ष साथ - संजीव तिवारी



२००७ में मैंने ब्लोगिंग शुरू की - हिंदी में लिखने का सुझाव दिया संजीव तिवारी जी ने , और इस तरह एक परिचय हुआ उनसे . मेरी
रचना जो हिंदी में ब्लॉग जगत के सामने आई ' अद्भुत शिक्षा ', उसे लोगों के सम्मुख लाने का भी प्रयास संजीव जी ने ही किया .... यूँ कहें ,
इस जगत में मेरी पहचान के सूत्रधार या गुरु संजीव तिवारी जी हुए .
उनकी कलम से जब मैंने उनका परिचय माँगा तो लेखन में सधे संजीव जी ने इस तरह अपना परिचय भेजा जैसे पसीने से तरबतर हो कोई कह रहा
हो - अब ये बहुत हुआ ' ! तो चलिए रूबरू हो लें -

रश्मि जी, प्रणाम!

संपूर्णता के फेर में जीवन परिचय पूर्ण ही नहीं कर पाया, एक संक्षिप्‍त परिचय भेज रहा हूं, आजकल ब्‍लॉग पढ़ना नहीं हो पा रहा है.
विलंब के लिए क्षमा सहित.

संजीव तिवारी

माता - स्‍व.श्रीमति शैल तिवारी

पिता - स्‍व.श्री आर.एस.तिवारी

शिक्षा - एम.काम., एलएल.बी.
संप्रति - वर्तमान में हिमालया ग्रुप, भिलाई में विधिक सलाहकार.

पता - ग्राम- खम्‍हरिया(सिमगा के पास), पोस्‍ट- रांका, तहसील- बेरला, जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ़.

लेखन प्रकाशन - विभिन्‍न पत्र पत्रिकाओं में 1993 से कविता, लेख, कहानी व कला-संस्‍कृति पर आधारित आलेख प्रकाशित.

संपादन : छत्‍तीसगढ़ी भाषा की आनलाईन पत्रिका गुरतुर गोठ डाट काम (http://gurturgoth.com) का विगत 2008 से प्रकाशन व संचालन.

ब्‍लाग लेखन - छत्‍तीसगढ पर केन्द्रित हिन्‍दी ब्‍लाग 'आरंभ' (www.aarambha.blogspot.com) का संचालन. हिन्‍दी इंटरनेटी व ब्‍लॉग तकनीक पर निरंतर लेखन. छत्‍तीसगढ़ के कला-साहित्‍य व संस्‍कृति को नेट प्‍लेटफार्म देकर सर्वसुलभ बनाने हेतु निरंतर प्रयासरत.

सम्‍मान/पुरस्‍कार - राष्‍ट्रभाषा अलंकरण, छत्‍तीसगढ़ राष्‍ट्र भाषा प्रचार समिति. वर्ष के सर्वश्रेष्‍ठ क्षेत्रीय लेखक, परिकल्‍पना सम्‍मान - 2010. रवि रतलामी जी के छत्‍तीसगढ़ी आपरेटिंग सिस्‍टम में सहयोग (इस आपरेटिंग सिस्‍टम को दक्षिण एशिया का प्रसिद्ध मंथन पुरस्‍कार प्राप्‍त हुआ)

वर्तमान पता - ए40, खण्‍डेलवाल कालोनी, दुर्ग, छत्‍तीसगढ़.

प्रोफाईल - गूगल # फेसबुक # ट्विटर

--
संजीव तिवारी
देश भाषा-लोक भाषा www.gurturgoth.com
मेरी अभिव्‍यक्ति http://sanjeevatiwari.wordpress.com
जगमग छत्‍तीसगढ़ http://aarambha.blogspot.com
मेरा पेशा http://jrcounsel4u.blogspot.com
....... आप मुझे राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी में प्रतिउत्‍तर देंगे तो मुझे खुशी होगी.
उनकी आखिरी पंक्तियाँ हिंदी के प्रति उनकी निष्ठा को दर्शाती है . इसी हिंदी ने ही तो हम सबको जोड़ा है .

शनिवार, 17 सितंबर 2011

बौद्धिक सूर्य रथ की विनम्र सारथी - डॉ सुधा ओम ढींगरा



उपाधियाँ , सम्मान तो समय के साथ व्यक्ति को हासिल होते हैं , पर विनम्रता , शालीनता व्यक्ति को अजेय बनाती है ...बौद्धिक सूर्य रथ की विनम्र सारथी सुधा धींगरा जी का नाम तो सुना था , पर मीलों की दूरी को मिटाकर कोई बात नहीं हुई थी . मीलों की कौन कहे - यहाँ तो देश- विदेश की दूरी थी , पर अचानक एक दिन बिना टिकट , बिना किसी आकस्मिक खर्चे के , बिना किसी औपचारिकता के हम एक साहित्यिक मोड़ पर मिले ...
एक मेल मिला ,
नए कलेवर, नए रंग- रूप और नई साज- सज्जा के साथ
उत्तरी अमेरिका की लोकप्रिय त्रैमासिक पत्रिका 'हिन्दी चेतना' का
जुलाई -सितम्बर 2011अंक प्रकाशित हो गया है |

देखकर इस सज्जा को मैंने पूछा -
'मैं अपनी रचना भेज सकती हूँ इसके लिए ? '
और विनम्रता ने सुधा जी के लिबास में कहा -
'आदृत्या रश्मि जी,
यह पत्रिका आपकी है |'

और मैंने पत्रिका को अपना मान लिया .... सुधा जी को अपना मान लिया .... और अपनी कलम को सुधा जी के नाम की स्याही से भरा , जिन बातों से मैं अनभिज्ञ थी , उन बातों का आधार , उनकी कलम से उनका परिचय माँगा ... परिचय की माँग ने मोबाइल से हमारी आवाज़ की मुलाकात करवाई - फिर क्षणों में अपरिचय की रही सही दीवार भी गिर गई और अपनी कलम के माध्यम से सुधा जी सिर्फ मुझ तक नहीं आईं , बल्कि हम सब के पास आईं ..... तो मैं झीने परदे का आवरण हटती हूँ और मिलवाती हूँ हिंदी चेतना हिंदी प्रचारिणी सभा, कैनेडा की त्रैमासिक पत्रिका की संपादक: डॉ सुधा ओम ढींगरा जी से -

सुधा जी की कलम से
एक मुस्कराती आवाज़ कानों को तरंगित कर गई | आप सोच रहे होंगे कि फ़ोन पर मुस्कराती आवाज़ का कैसे पता चला | जी...फ़ोन पर आवाज़, आप के चेहरे के हाव -भाव, मूड सब बता देती है | बस संवेदनाओं के मंथन की आवश्कता है, अभ्यास सब सिखा देता है | आवाज़ रश्मि जी की थी और उन्होंने कहा कि अपना परिचय लिखूँ....सोच में पढ़ गई कि अभी तक तो मैं ही अपने बारे में कुछ नहीं जानती तो लिखूँ क्या ...पर रश्मि जी का मीठा, प्यारा अनुरोध है इसलिए स्वयं को ढूँढ़ना तो पड़ेगा | चलिए अतीत की तरफ लौटती हूँ जिसके पलों को यादों की अंगूठियों में हीरे, पन्ने, नीलम, मूंगे और पुखराज सा जड़ कर मैंने अपने हृदय की संदूकची में सुरक्षित रखा हुआ है | जब भी अतीत के गलियारे में झाँकने को मन करता है तो उन अंगूठियों को पहन लेती हूँ और सुखद अनुभूतियों से सराबोर हो जाती हूँ | लिखने के लिए उन अंगूठियों को पहन लिया है और ऐसा महसूस हो रहा है कि जिस धन को मैं वर्षों से अपना, सिर्फ अपना समझती थी, उसे आज आपके साथ ख़ुशी से साझा कर रही हूँ..
जालन्धर के एक साहित्यिक परिवार में जन्म हुआ | मम्मी -पापा और भाई तीनों डाक्टर थे | पोलिओ सर्वाइवल हूँ | अपंग होने से तो बच गई पर दाईं टाँग कमज़ोर रह गई इसलिए मेरा बचपन आम बच्चों की तरह नहीं बीता | तरह -तरह के तेलों की मसाज शरीर पर होती और काफ़ी व्ययाम करवाया जाता | बहुत दर्द होता और पलायन में परिकल्पना की दुनिया सजा लेती और कब कागज़ों पर कलम से शब्दों के चित्र उकेरने लगी याद नहीं | हाँ, काग़ज़, कलम और पुस्तकों से दोस्ती हो गई | यही दोस्त मुझे पीड़ादायक वर्षों से निकाल लाए | १२ वर्ष की माँ -पापा की मेहनत रंग लाई और मैं स्वस्थ्य किशोरी बनी | कत्थक, आकाशवाणी, रंगमंच और बाद में दूरदर्शन की कलाकार बनी | इस सब का श्रेय मैं अपने माँ -पा और अपने से दस साल बड़े भाई को देती हूँ जिन्होंने घर का वातावरण बहुत सकरात्मक रखा और मुझ में किसी तरह की कुण्ठा नहीं आने दी | माँ ने हमेशा एक बात सिखाई कि अपनी प्रतिभा को पहचान कर उसे अपनी ताकत और ढाल बनाओ | पापा ने हमेशा कुछ अलग हट कर करने के लिए प्रोत्साहित किया | कविता, कहानी, उपन्यास, इंटरव्यू, लेख एवं रिपोतार्ज सब लिखती रही और जीवन में जो कमी थी उसका एहसास नहीं हुआ | चाल से कभी कोई ढूँढ नहीं पाया कि मेरी टांगों में कोई अन्तर है | क़दमों को साधने का वर्षों से अभ्यास है और स्वयं कभी किसी को बताया नहीं | मुझे सहानुभूति नहीं चाहिए थी और 'बेचारी' शब्द नहीं सुनना था | पिछले कुछ वर्षों से पत्र -पत्रिकाओं के लिए इंटरव्यू देते समय तरह -तरह के प्रश्नों के उत्तर में बचपन का ज़िक्र स्वाभाविक रूप से आ जाता है अन्यथा उम्र भर किसी को पता न चलता | स्वाभिमानी हूँ, हर काम अपने दम पर करती हूँ | किस साहित्यिक परिवार से हूँ, उसका ज़िक्र भी कभी नहीं किया | कई पुस्तकें लिखने, 'हिन्दी चेतना' पत्रिका का संपादन करने और भारत की स्तरीय पत्र -पत्रिकाओं में छपने के उपरांत आज भी लगता है कि अभी तो कलम को माँज रही हूँ | साहित्य का समुद्र बहुत गहरा है, अभी तक घोघे- सिप्पियाँ ही हाथ लगे हैं, न जाने कितनी डुबकियाँ और लगानी पड़ेंगी हीरे जवाहरात ढूँढने के लिए और इस जन्म में ढूँढ भी पाऊँगी या नहीं, समय बताएगा |
लेखन के साथ -साथ एक सामाजिक एक्टिविस्ट भी हूँ | इसके बीज परिवार से मिले और मेरी मूल भूत प्रवृति ने इसे खाद -पानी दिया | माँ-बाप आज़ादी की लड़ाई में वर्षों जेलों में रहे | पापा वामपंथी विचारधारा के थे और माँ कट्टर कांग्रेसी | राजनीतिक विचारों में भिन्नता होते हुए भी समाज सेवा में वे दोनों एक थे | समाज की विद्रूपताओं और कुरीतियों के लिए जीवन की अंतिम साँस तक लड़ते रहे | विवाहोपरांत अमेरिका मेरी कर्म भूमि बना और भाषा, संस्कृति तथा महिलाओं के लिए अपने वैज्ञानिक पति डॉ. ओम ढींगरा के सहयोग से मैंने बहुत काम किया |
चिठ्ठा -लेखन को कम समय दे पाती हूँ | 'हिन्दी चेतना' के संपादन, नियमित स्तम्भ लेखन, कविता, कहानियाँ और लेख लिखने के उपरांत जो समय मिलता है, उसमें पढ़ती बहुत हूँ |
अब कुछ अंगूठियाँ अपनी संदूकची में वापिस रख रही हूँ | न जाने कब, कहाँ, किस मोड़ पर आपसे मुलाकात हो जाए तो ख़ाली हाथ न हूँ......

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बुधवार, 3 अगस्त 2011

जिजीविषा की झलक - महेश्वरी कनेरी




ब्लॉग http://kaneriabhivainjana.blogspot.com/ पर जिजीविषा की झलक यूँ मिली - ,"पैतीस साल अध्यापन कार्य करने के बाद ,२००९ में जब मैं सेवानिवृत हुई। मुझे लगा ,मेरा जीवन कहीं रुक सा गया है ,मैं जैसे गति हीन होगई हूँ। मेरे पास करने को कुछ नया नहीं था । मुझे लगता था मैं अपनी पहचान खोने लगी हूँ । यही सब सोच- सोच मुझे डिप्रेशन सा होने लगा था।
तभी अचानक एक दिन गुगुल सर्च करते- करते एक हिन्दी ब्लॉग में जा पहुँची । मुझे मालूम था कि कुछ लोग ब्लॉग लिखा करते हैं, पर इस के बारे में कोई अधिक जानकारी नहीं थी । मुझे लगा… बस मुझे रास्ता मिल गया मुझे मेरी मंजिल मिल गई ।
फिर डरते-डरते मैंने दिनांक ४.अप्रेल २०११ को अपना एक ब्लॉग खोल ही दिया।सब् से पहले माँ सरस्वती का एक सुन्दर सा चित्र लगा कर मैंने प्रथम पोस्ट का श्रीगणेश किया ।उसी दिन फिर एक लघु कविता “ ऋतुराजबसन्त” की दूसरी पोस्ट भी पब्लिश कर दी। ब्लॉग का ये अनुभव मेरे लिए जितना रोमांचकारी था उतना ही अनजाना और अनभिज्ञ भी ।"
खुद को वही दिशा दे पाते हैं , जिनमें हार मानने की प्रवृति नहीं होती .... कोशिशें उनकी ही रंग लाती हैं . प्रतिभाओं की कमी नहीं , पर खुद पे भरोसा नहीं .... महेश्वरी जी में प्रतिभाएं भी मैंने पायीं और जीवन को फिर से एक पहचान देने की उत्कंठा भी देखी , प्रकृति से खुद को जोड़ते हुए उन्होंने मन को पंख दिए - ' रे मन, मुझे ले चल उस पार
जहाँ स्वच्छंद प्रकृति राग सुनाए '
अपनी कलम में उन्होंने अपनी पहचान को गहन मायने दिए इन शब्दों में - ' मैं नारी हूं। नारी ह्रदय की वेदना और पीडा़ मुझ में भी है। लेकिन नारी होने पर मुझे गर्व है। मैं नारी मन की वेदना को अपने कलम में ढाल कर उस एहसास को एक नई सोच व नई दिशा देना चह्ती हूं । यही मेरा सपना है। शुरुवात नई है, शौक पुराना है मंजिल दूर है. रास्ता अंजाना है.”

मुझे हमेशा ऐसे लोगों ने प्रभावित किया और मैंने बेझिझक उन्हें अपने ख़ास कैनवस पर चित्रित किया ...... महेश्वरी जी ने मेरे आगे आप तक पहुँचने के लिए कुछ इस तरह अपने को परिचय का परिधान दिया -

रश्मि प्रभा जी को बहुत-बहुत धन्यवाद उनके अनुकंपा से मै आप सब के सामने अपना ह्रदय खोल रही हूँ………………

मै महेश्वरी कनेरी …एक साधारण परिवार में जन्मी चार बहनों और एक भाई में सबसे बडी़ हूँ । घर में बडी़ होने के कारण भाई बहनों के प्रति मेरी हमेशा से जिम्मेदारियाँ रही है। मेरे पिता शिक्षा और अच्छे संस्कार पर बहुत ज़ोर दिया करते थे ।अपनी हैसियत के अनुसार हम सभी को उन्होंने अच्छी शिक्षा और अच्छे संस्कार दिए । मेरे पिता को मुझ से बहुत आशाएँ और उम्मीदें थीं मुझे हमेशा कहा करते थे “ बेटा ! तू मेरी बेटी नहीं बेटा है “

बचपन से ही मैं बहुत ही संकोची तथा अन्तर्मुखी रही। अपनी मन की बात किसी से कहते घबराती ।बस मन में उठे हर भाव को काग़ज में उतारना अच्छा लगता था। लिखने का सिलसिला वही से शुरु हुआ ।बाबुल के आँगन में भाई बहनों के बीच कब और कैसे बचपन बीत गया और मैं विवाह के बंधन में भी बँध गई पता ही नहीं चला ।

बचपन की एक घटना याद आरही है- जब मैं आठवी पास कर नौवी कक्षा में पहुँची तो मैं संगीत विषय लेना चाहती थी, क्यों कि मुझे संगीत से बहुत लगाव था । लेकिन पता नही क्यों अध्यापिका ने मुझे संगीत लेने ही नही दिया । औरों के मुकाबले मैं इतना बुरा भी नही गाती थी । ये बात मेरे मन को आहत कर गई ।मैंने उसी वक्त फैसला ले लिया कि मैं अपनी बेटी को संगीत जरुर सिखाऊँगी । विधि का विधान देखो आज मेरी बेटी रेडियो आर्टिस्ट होने के साथ- साथ हैदराबाद की जानी मानी गज़ल गायिकाओ मे से एक है ।कभी-कभी दुखी और अबोध मन से लिया, मासूम सा फैसला ईश्वर पूरा कर ही देते हैं।


सन१९७४ में अध्यापि्का के रुप में जब मेरी नियुक्ति केन्द्रीय विधालय में हुई मुझे लगा जैसे आज मेरे पंखो को परवाज़ मिल् गया । छोटे-छोटे बच्चों के बीच रह कर उनके मनोंभाव को समझते हुए उनके रुचि के अनुरुप कुछ गीत और काविताएं लिखने लगी “आओ मिलकर गायें गीत अनेक “ सन १९९४ में ये पुस्तक प्रकाशित हुई । सन१९९६ में गीत नाटिका का एक ओडियो कैसेट निकाला जिसमें छह गीतों भरी कहनियां हैं. सन १९९४ मे मुझे प्रोत्साहन पुरस्कार तथा २००० में राष्ट्र्पति पुरस्कार से सम्मानित कियागया । सन २००९ में सेवानिवृति के बाद ईश्वर की कृपा और आप लोगों की अनुकंपा से मैं फिर से लिखने का प्रयास कर रही हूं ।

जुनून और कुछ् कर गुजरने की चाहत मनुष्य को हमेशा आगे बढ़ाता है। सच्चे मन से किया जाने वाले हर कार्य में ईश्वर का निवास होता है,येसा मेरा विश्वास है । मै सफल हूँ या नहीं लेकिन सन्तुष्ट जरूर हूँ ।

घबराते- घबराते गिरते पड़्ते हम चले डरते-डरते

सोचते थे मंजिल मिलेगी भी या नही

तभी हौंसले ने अंगुली थामी ,विश्वास ने सहारा दिया

और हम चल पड़े, चलते रहे और चलते रहेंगे

क्योंकि आप सब का विश्वास हमारे साथ है

.................................

पंख होने से क्या होता है,हौसलो में उड़ान होती है

जीत उसकी होती है,जिसके सपनों में जान होती है


सच है... इस सच्चाई की जीती जागती तस्वीर है ये -


राष्ट्रपति पुरस्कार





मंगलवार, 2 अगस्त 2011

कभी झरना , कभी बादल - सोनल रस्तोगी



सोनल रस्तोगी कहते कुछ सरसराते शब्द मेरा हाथ पकड़ लेते हैं - 'जब भी खुद को शायरा,लेखिका और बुद्धिजीवी समझती हूँ नींद खुल जाती है' और मैं हंसकर कहती हूँ -' और तब तुम कलम उठा लेती हो, है न !'
कभी झरना , कभी बादल , कभी बारिश की बूंदें , कभी प्यार का अलाव .... क्या नहीं लगती सोनल . चेहरे पर एक शरारत जो कहती है - ' ज़िन्दगी तो यूँ हीं बड़ी गंभीर हुआ करती है , अभी ज़रा मुस्कुरा लेते है ... बड़ी फुर्सत से धूप निकली है ! '
इनका ब्लॉग है - http://sonal-rastogi.blogspot.com/ जहाँ इनकी सादगी, शरारत , और गंभीरता को आसानी से समझा जा सकता है . बिना मिले समझने का इससे बेहतर जरिया और क्या होगा , और मेरी कलम से अपनी कलम की आवाज़ मिलाकर तो इस जानकारी को और सुगम बना दिया है .... कहने को तो है यूँ बहुत सी बातें , पर अभी इतना ही सही ....

चिट सामने है सोनल जी की फिर देर क्यूँ -
अपने परिचय की चिट धीरे से आप तक बढ़ा रही हूँ बिलकुल वैसे ही जसे कोई चुपके से ख़त दरवाजे के नीचे से बढ़ा जाता है , फर्रुखाबाद में जन्मी परिवार की पहली बेटी लाड ढेर सारा ,ढेर सारे रिश्तों से घिरी,बेहद बातूनी ,हद दर्जे की शैतान माँ कहती है जब तक पढ़ना नहीं आया था तबतक ,फिर किताबों में ऐसी डूबी की आज तक नशा कायम है ,लिखने की शुरुवात स्कूल में लोकगीत की तुकबन्दिया भिडाने से शुरू हुई ,फिर गांधी जयंती ,रक्तदान ,नेत्रदान ,प्रदूषण हर सामाजिक विषय पर लिखा नाटक ,एकांकी सब लिखवाया मेरी अध्यापिकाओ ने और माँ सरस्वती के आशीष नें ही आम से ख़ास महसूस करवाया , इसी दौर में बालहंस में अपनी कहानी परिचय के साथ भेजी जो बाल प्रतिभा विशेषांक में छपी,फिर क्या था खाली लिफाफे और टिकेट मिल गए खूब लिखो और भेजो मनीआर्डर की रसीदे आज तक सहेजी है अपर किताबें ना सहेज पाई ,अनमोल है ना .....
हर बार प्रोत्साहन मिला,वाद विवाद प्रतियोगिता ,नृत्य हर विधा का आनंद लिया ,खेलों में फिसड्डी थी हूँ और रहूंगी ,समय के साथ डायरी भरती गई 12th तक हर विषय पर लिखा ..लोगों के प्रेम पत्रों के लिए शायरी भी लिखी,समय बदला परिस्थितिया बदली पढ़ाई के बोझ के तले कविता कहानियाँ सब खो गई बहित बड़ा शून्य आ गया लेखन में,आगे बढना था ढेर सारी पढ़ाई, होने वाले जीवन साथी से जब मिली तो उनका मन भी एक कविता ने चुराया
"आज दिल ने चाहा बहुत अपना भी हमसफ़र होता
जिससे कहते हालात दिल के जिसके काँधे पर अपना सर होता ..... (बाकी फिर कभी )"

भावनाएं उमड़ी और दिल से फिर फूट पड़ी कविता कहानिया, फर्रुखाबाद ..लखनऊ...मेरठ ...गुडगाँव . शहर बड़े होते गए और मैं इनके साथ बदलती गई, नया रिश्ता , नया शहर और ढेर सारा आत्मविश्वास और सहयोग. बस एक देसीपन आज तक वैसा ही है .. . ब्लॉग्गिंग से परिचय मेरे देवर डा. अंकुर ने करवाया http://gubaar-e-dil.blogspot.com/ तब से जो पंख लगे आज तक उड़ रही हूँ, एक दिन रविश जी ने मेरे ब्लॉग को अपने कॉलम में जगह क्या दी तब से मेरी दुनिया बहुत बड़ी हो गई और प्यारी भी , रचनाओ को पाठक मिले और मुझे पढने के लिए ढेर सारी सामग्री, सच में यहाँ मैं सिर्फ मैं हूँ बेहद सुकून मिलता है.
अभी तो घुटुनो के बल हूँ ,धीरे-धीरे चलूंगी पर दौड़ना नहीं है मुझे, ज़िन्दगी स्लो मोशन में ही भाती है सब देखना है मुझे .
क्या पता किसी दिन ब्लॉग से अखबार और अखबार से किताब की शक्ल ले लूँ ...

शनिवार, 30 जुलाई 2011

एक गहरा वजूद - असीमा भट्ट



ब्लॉग की दुनिया बहुत बड़ी है ... हर बार घूमते हुए यह गीत होठों पर काँपता है , 'इतना बड़ा है ये दुनिया का मेला , कोई कहीं पे ज़रूर है तेरा ' शब्दों का रिश्ता बनाने के लिए मानस के रश्मि ज्वलित जल से
मैं शब्द शब्द में तैरती भावनाओं का अभिषेक करती हूँ , तन्मयता से मोती चुनती हूँ - हर किसी का अपना एक गहरा वजूद है , अपना अकेलापन और अकेलेपन में निखरी ज़िन्दगी है . उड़ान में कभी मैं दस्तक देती हूँ , कभी सामनेवाला - फिर कहते सुनते पढ़ते जीवन के पार छुपे वे तार दिखने लगते हैं , जिन पर उंगलिया रखो तो वे कभी एथेंस का सत्यार्थी के गीत गाती है, कभी बुद्ध, कभी यशोधरा , कभी कोलंबस, कभी आम्रपाली , कभी नीर भरी दुःख की बदली .... अनंत परिभाषाएं , अनंत अनुकरणीय कदम !
पौ फटते अपनी दिनचर्या के बीच मैं एक अनंत यात्रा करती हूँ , और किसी दहलीज पर रुक जाती हूँ . फिर उस दहलीज से सोंधे एहसास , सोंधे आंसू, सोंधे सोंधे सपनों की खुशबू और हौसले ले आती हूँ ताकि जब कभी साँसें लड़खड़ाने लगें तो किसी पन्ने को आप अपना आदर्श बना लें !
कुछ ऐसा ही एक आधार हैं असीमा भट्ट , जिनकी दहलीज से मैंने उनकी पहचान को उनके शब्दों में ढूंढा - " मैं कौन हूं ? इस सवाल की तलाश में तो बड़े-बड़े भटकते फिरे हैं, फिर चाहे वो बुल्लेशाह हों-“बुल्ला कि जाना मैं कौन..” या गालिब हों- “डुबोया मुझको होने ने, ना होता मैं तो क्या होता..”, सो इसी तलाश-ओ-ताज्जुस में खो गई हूं मैं- “जो मैं हूं तो क्या हूं, जो नहीं हूं तो क्या हूं मैं...” मुझे सचमुच नहीं पता कि मैं क्या हूं ! बड़ी शिद्दत से यह जानने की कोशिश कर रही हूं. कौन जाने, कभी जान भी पाउं या नहीं ! वैसे कभी-कभी लगता है मैं मीर, ग़ालिब और फैज की माशूका हूं तो कभी लगता है कि निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो की सुहागन हूं....हो सकता कि आपको ये लगे कि पागल हूं मैं. अपने होश में नहीं हूं. लेकिन सच कहूं ? मुझे ये पगली शब्द बहुत पसंद है…कुछ कुछ दीवानी सी. वो कहते हैं न- “तुने दीवाना बनाया तो मैं दीवाना बना, अब मुझे होश की दुनिया में तमाशा न बना…”

और स्वतः मेरी हथेलियाँ उनके मन के दरवाज़े पर दस्तकें देने को आतुर हो गईं और बड़ी मीठी सी मुस्कान लिए द्वार खुले , ----- जिनकी मासूमियत से हवाएं अपना रूख बदलती हैं , वे अनजाने उन्हें जिद्दी बना जाती हैं और यही जिद्द खुद के साथ होड़ लेती हवाओं को अपना हमसफ़र बना लेती हैं . नहीं इंतज़ार होता उन्हें किसी से सुनने का ' यू आर द बेस्ट ' , क्योंकि विपरीत परिस्थितियाँ उनका स्वर बन जाती हैं - ' आय एम द बेस्ट !'

अब आगे असीमा जी के साथ बढ़ते हैं . समय की अफरातफरी और खुली ज़िन्दगी के संजोये पलों में असीमा जी समझ नहीं पा रही थीं कि क्या लिखा जाए , फिर मैंने उनके पास अपने प्रश्न रख दिए जिनके जवाब उनका परिचय बन गए


सबसे पहले धन्यवाद मुझ नाचीज को इतनी इज्ज़त देने के लिए .तो सुनिए ........

मेरा बचपन फ़ुल ऑफ़ लाइफ था . नाना जी ज़मींदार थे , दादा जी बहुत ही प्रतिष्ठित डॉक्टर और सिनेमा हॉल के मालिक थे . और पिता जी BHU (बनारस हिन्दू युनिवेर्सिटी ) के स्टुडेंट थे जो बाद में स्टुडेंट मूवमेंट में शामिल हो गए . मैं तीन बहनों और एक भाई में सबसे बड़ी थी . जब मैं छोटी थी पिता जी ने घर छोड़ दिया . कम्युनिस्ट पार्टी के होल टाईमर हो गए . माँ को बहुत दुःख हुआ था . सदमे में वो मुझे मारती थीं क्योंकि मैं पिता की कट्टर पक्षधर (पिता जी को बहुत प्यार और रेस्पेक्ट देती थी ) . इसलिए माँ को बुरा लगता था और अपना गुस्सा मुझपर उतारती थीं . और शायद इसलिए भी कि शायद मैं बचपन में बहुत चंचल थी . बहुत शैतानियाँ करती थी . जो कि मेरा एक लड़की होने के नाते माँ को गवारा नहीं था . बस खूब पिटाई होती थी और मैं फिर भी शैतानियाँ करती थीं . शायद यही वो वजह है कि मैं जिद्दी हो गई .

अपने पिता के बारे में कहूँ तो हमेशा मुझे उनकी बात अच्छी ही लगी . तब भी अच्छा लगता था , कभी बुरा नहीं लगा . कभी उपेक्षित नहीं महसूस किया . हमेशा प्राउड फील होता था . मुझे बचपन का एक वाकया याद आता है . एक बार मुझे स्कूल में कल्चरल प्रोग्राम में फर्स्ट आने के लिए पुरस्कार मिला था . पुरस्कार वहाँ के D.M. दे रहे थे , उन्होंने पुरस्कार देते हुए मुझसे पूछा -"तुम्हारे पापा का नाम क्या है ? मैंने कहा - श्री सुरेश भट्ट , वो बोले - अच्छा , तो तुम 'भट्ट जी ' की बेटी हो , वाह "
मैंने यह बात घर आकर पिता जी को बताया कि - DM ने यह कहा कि आप 'भट्ट जी ' की बेटी हो - वाह !'
पापा बोले - मुझे उस दिन ख़ुशी होगी जब लोग कहेंगे कि मुझसे - ' क्रांति भट्ट (वो मुझे क्रांति ही बुलाते थे ) के पिता हो .वाह !'

मैंने अपनी जिंदगी को नहीं ढाला, बस खुद ब खुद ढलता चला गया . "अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं , रुख हवाओं का जिधर का है , उधर के हम हैं .

मुझे महात्मा बुद्ध की तरह दिखाई देते हैं अपने पापा (बुद्ध की तरह ही वे हमें बचपन में छोड़ कर समाज सेवा के लिए चले गए थे ) , बातें भी उन्हीं की तरह करते . मुझे याद है , जब मैं बच्ची थी मेरे पापा नक्सलाईट थे , वो कहा करते थे - "हम नक्सलाईट लोग हैं , गोली पहले चलाते हैं सोचते बाद में हैं ." आज वही इन्सान कहते हैं - "हिंसा से कुछ भी हासिल नहीं होगा . हिंसा किसी समस्या का हल नहीं ."

मैं फिल्म में कहाँ आना चाहती थी . बहुत ही ओर्थोडोक्स फैमिली में थी , वहाँ ऐसी बातें सोचना भी गुनाह था . मैं पता नहीं कैसे आ गई . आज भी यह एक पहेली सा लगता है कि मैं कैसे यहाँ तक आ गई ! Its all destiny

जिंदगी मेरे लिए एक इम्तहान है . मैं रोज़ एक प्रश्न -पत्र हल करती हूँ . रोज़ इम्तहान देती हूँ और हाँ रोज़ पास होती हूँ

लेखन से भी कैसे जुड़ी , यह भी ठीक से याद नहीं . शायद पापा की किताबें पढ़ने की आदत मेरे अन्दर आई . शायद इसीलिए थोड़ा बहुत लिख लेती थी . फिर जब मैं पटना आई तो सर्वाइवल के लिए मुझे न्यूज़ पेपर में काम करना पड़ा . और ऐसे लिखना पेशा बन गया ...

जिंदगी से मुझे कोई शिकायत - नहीं . कुछ भी नहीं . I love it. My life is beautifull.

बहुत कुछ खोया है .... बहुत कुछ पाया है . अब तो बात जिद्द पे आ गई है - अब तो जिंदगी से सूद समेत वापस लेना है और उसे भी देना पड़ेगा .
आखिर में इतना ही कहूँगी - मुश्किलें पड़ीं मुझ पे इतनी कि ज़िन्दगी आसान हो गई ....

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

अनकहा कहा - मीनाक्षी धन्वन्तरी

(नोट - अस्वस्थता की वजह से मेरी कलम रुक गई थी , अभी भी मध्यांतर का आलम होगा .... पर कलम चलेगी )


कितना कुछ अनकहा कहा होता है , जो कभी पत्तियों से ओस बन सरकता है , कभी चिड़ियों की उड़ान में गगन का विस्तार नापता है , कभी किसी की सिसकी में अपनी ज़िन्दगी के इक लम्हें को पाता है , कभी सन्नाटे में एक मुस्कान रख देता है , फिर अचानक बिल्कुल अचानक अपनी डायरी के पन्नों में उसे समेट बन्द कर देता है उस कमरे में - जहाँ हर ताखे पर यादों की एक सिहरती पोटली होती है ....... ऐसा ही लगा जब अपनी यात्रा के दौरान मैं मीनाक्षी जी के ब्लॉग http://meenakshi-meenu.blogspot.com/ पर रुकी ..... उनकी रचना ' मेरे पास एक लम्हा है ' एक लम्हें की मानिंद मेरी दोस्त बन गई ... हर एक कदम पर महसूस हुआ , यह पहचान आज की नहीं ... कुछ है जो दोनों के मध्य सरस्वती की तरह प्रवाहित है .

कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते हैं , दो आँखें होती हैं - जिनसे आंसू अनजाने छलक उठते हैं , दो पाँव होते हैं - जिनके छालों से रास्तों की पहचान मिलती है , और होती है एक सहज मुस्कान जिसकी व्याख्या नहीं होती ...

चलिए अनकहे कहे से कुछ सुनें -

कितने दिनों से टलता आ रहा सीधा सादा सा परिचय आज कुछ हिम्मत करके एक कदम आगे बढ़ा ....यह सोच कर कि रश्मिजी की क़लम राह चलते चलते अपने हुनर से उसे सँवार ही देगी....
“जब से होश सँभाला प्रेम को ही सत्य माना...इसलिए ब्लॉग का नाम भी रखा ‘प्रेम ही सत्य है’” बचपन से ही प्रकृति और मानव में एक दूसरे की छाया मन को आकर्षित करती...वही जाने अंजाने लेखन में झलक जाता..इसी से जुड़ी एक घटना का ज़िक्र ज़रूरी लगता है...सातवीं कक्षा में हिन्दी टीचर ने प्रात:काल पर एक लेख लिखने को कहा...चहचहाती चिड़ियाँ लगी थीं देश के भूखे बच्चे जो रोते हैं एक निवाले के लिए...या शायद बिन माँ के बच्चे माँ के आँचल के लिए... बस फिर क्या था फौरन मम्मी डैडी की पेशी हुई कि शायद घर में कुछ अनहोनी न हुई हो...उसके बाद से लेखन जारी रहा लेकिन डायरी के पन्नों में कैद रहा...मुक्त हुआ तो 2007 में..डायरी के पन्नों से उतरा ब्लॉग़ पर....
अपने जीवन के बारे में क्या कहूँ...आम जीवन है लेकिन खास भी है....जिससे हर पल कुछ न कुछ नया सीखा... जन्म लेते ही दादी के रोने का सबब बनी लेकिन डैडी ने गोद में लेते ही कहा कि यह तो मेरी मीठी मधु है...बहेगी हमारे घर में महकती हुई मधु की धार और फिर छोटी बहन बेला भी आ गई.....दोनो बहनें जहाँ मम्मी डैडी और ननिहाल की लाडली थीं वहीं ददिहाल में एक आँख न देखी जातीं...फिर भी हमें दादी बहुत प्यारी लगतीं... शायद मम्मी के संस्कार थे जिन्होंने दादी की झिड़की को भी प्यार समझने की नसीहत दी.
ग्यारह साल की हुई तो घर में नन्हा सा चाँद उतरा....सबकी आँखों का तारा खासकर मम्मी डैडी के लिए तो वह तोता था जिसमें उनकी जान बसती फिर भी हम दोनों को कभी न लगता कि तीनों में कोई भेदभाव किया जाता है... सब को बराबर का प्यार और दुलार मिलता....शायद उसी कारण तीनों भाई बहन आज तक एक दूसरे के लिए कुछ भी करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं...
लड़की लड़के कोई भेदभाव ही नहीं था...कोई रोक टोक नही थी... इसलिए शायद आज़ादी मिलने पर भी उसका कभी फायदा नहीं उठाया हाँ मस्ती ज़रूर की...गर्मी की जिन छुट्टियों में ननिहाल या कुल्लू मौसी के पास न जा पाते तब मुझे अकेले ही जहाँ मैं जाना चाहती भेज दिया जाता...आठवीं में पहली बार अम्बाला अकेली गई थी...आज भी याद है जब बस से उतर कर घर जाने के लिए रिक्शे वाले का चेहरा पढ़कर रिक्शे पर बैठी थी...फिर भी सतर्क थी कि अगर वह किसी गलत गली में मुड़ा तो उसके सिर पर ब्रीफकेस दे मारूँगी...दसवीं के बाद अकेले कश्मीर जाने का अनुभव तो और भी दिलचस्प था...
दिल्ली में जन्मी पली-बढ़ी...स्कूल और कॉलेज खत्म हुआ तो.....बस यहीं ज़िन्दगी कुछ अटक गई या बहक गई...चार साल तक आवारा मस्त हवा की तरह बिना किसी लक्ष्य के बहती रही..... अपने मौसेरे भाई के ऑफिस में एक साल रिसेप्शनिस्ट की नौकरी की जहाँ मौसी से बहुत कुछ सीखा...उनकी एक बात को आज तक गाँठ बाँध कर रखा है.....”अपेक्षाओं की अति हमेशा दुख देती हैं... चाहे वे अपने से हों या अपनों से” उसके बाद पत्राचार से हिन्दी में एम.ए. किया.... उस दौरान जाना कि भाषाएँ जीवन में कितना महत्व रखती हैं...भाषाएँ भावनाओं को पुष्ट करती हैं... एक अच्छा डॉक्टर या इंजिनियर बनने के लिए अगर उनसे जुड़े विषय पढ़ने जरूरी होते हैं तो भाषा एक अच्छा इंसान बनाने में मदद करती है...और फिर एक अच्छा इंसान ही जीवन में आगे बढ़ सकता है......
अपनी सुरक्षा के लिए जूडो कराटे सीखने के लिए भेजा गया...उस कला का सही वक्त पर इस्तेमाल हो इसके लिए योग करने मानतलाई गई....मम्मी को मेरी लक्ष्यहीन ज़िन्दगी पसन्द नहीं थी, वे चाहती थीं कि अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए कुछ करूँ... इधर डैडी की शय पाकर मैं अपने में मस्त बेफिक्र जीती रही....समाज और परिवार की तरफ से इशारा मिलते ही उस मस्ती पर रोक लगानी पड़ी...कानून और राजनिति की पढ़ाई बीच में ही छूट गई और शादी हो गई.....
ज़िन्दगी का आधा शतक पार करने पर बैठी सोच रही हूँ कि जितना विश्वास और आज़ादी का वातावरण माता-पिता के घर था उससे कहीं ज़्यादा पति के घर में पाया.....शादी के बाद रियाद आकर ज़िन्दगी ने नई करवट ली....दोनों बेटों के साथ हमने भी स्कूल में दाख़िला ले लिया हिन्दी अध्यापिका के रूप में....उस वक्त का वह निर्णय मेरी ज़िन्दगी का बेहतरीन फैंसला था..... ज़िन्दगी मेरी गुरु थी उसी के अनुभवों को बाँटने लगी स्कूल के बच्चों में...
जहाँ तक लेखन की बात है वह तो बचपन से साथ था जो अब तक है...रियाद और दुबई में पढ़ाते हुए डायरी, लेख, कविता और कहानी ने एक नया रूप पाया छोटे छोटे एकांकी और नाटकों के रूप में...बच्चों के साथ लिखना पढ़ना और भी बढ़ गया...स्कूल मेग्ज़ीन में हिन्दी सम्पादन के दौरान बच्चों की हिन्दी में लिखी रचनाएँ मन खुश कर देतीं...स्कूल कॉलेज के कई बच्चे आज भी हिन्दी सीखना पढ़ना चाहते हैं,,,गीत गज़ल और नाटक का मंचन करना चाहते हैं लेकिन......... इस लेकिन का जवाब आपको ढूँढना है...!!

मेरा परिचय चाहा आपने इसका आभार

कोशिश करके देती हूँ इसे कुछ आकार...

न मैं रचनाकार नामी, न कोई साहित्यकार

हूँ बस एक आम साधारण सी चिट्ठाकार ...

जो भी है सब कुछ है अपना घर परिवार

होती हैं इनमें छोटी छोटी खुशियाँ साकार ....

चिट्ठा ‘प्रेम ही सत्य’ करता सबका सत्कार

स्वागत करता, नहीं किसी को देता दुत्कार

सरल सहज सा लिखती, हूँ ऐसी कर्मकार

है मेरा लेखन सादा, है सादा ही व्यवहार

यहाँ सभी हैं एक से बढ़कर एक कलाकार

उन सभी को मेरा प्यार भरा नमस्कार


बुधवार, 13 जुलाई 2011

जहाँ गई नज़रें , भाव उमड़े (निलेश माथुर)



निलेश माथुर , ब्लॉग - http://mathurnilesh.blogspot.com/ , मुझे इस ब्लॉग से मिलना बहुत अच्छा लगा . रोज़मर्रा की जुड़ी चीजें .... निलेश जी ने सबको शब्द दिए ... फूलदान, मेरी कमीज ,मेरी पतलून ,मेरा जूता, मेरा ट्रांजिस्टर, ..... आपने पढ़ा है ? इसे कहते हैं , जहाँ गई नज़रें , भाव उमड़े और शब्दों ने उनको जीवंत कर दिया . चलिए एक पढ़वा ही दूँ , जिसने नहीं पढ़ा हो , वे भी मेरी तरह मिलकर खुश हो जाएँ - http://mathurnilesh.blogspot.com/2010/04/blog-post_21.html .
मैं आज भी उनको नियम से पढ़ती हूँ , पर ब्लॉग पर जाने से पहले ये सारे प्रसंग मुझे याद आ जाते हैं और धीरे से मैं ढूंढती हूँ - कमरे का आईना , रेत के कण, बारिश की बूंदें , बेतरतीब ज़िन्दगी, सोचती ज़िन्दगी .......

परिचय लिखने से पूर्व मैंने हर शख्स का परिचय पढ़ा , निलेश जी ने जब दीदी संबोधन के साथ अपना परिचय मुझे दिया तो इस संबोधन ने तो मुझे अभिभूत किया ही , निलेश जी के सच ने मुझे सुकून दिया .... सच कहने का साहस तो दूर की बात है, मन से भी कोई स्वीकार कर ले तो बड़ी बात है . निलेश जी ने परिचय भेजते हुए लिखा - दीदी, मेरी बचपन से अब तक की यात्रा शायद आपको अच्छी नहीं लगेगी लेकिन संक्षेप में सब सच सच लिख रहा हूँ ! इस सच ने निलेश जी को मेरी नज़रों में और ऊँचा कर दिया
. मैंने अपनी ज़िन्दगी में सच का सम्मान किया है . इस सच के निकट अपनी माँ (श्रीमती सरस्वती प्रसाद ) की लिखित पंक्तियाँ याद आ गईं -

'दर्द मेरे गान बन जा
सुन जिसे धरती की छाती हिल पड़े
वज्र सा निर्मम जगत ये खिल पड़े
लाज रखकर ह्रदय की ऊँची इमारत का
मेरा सम्मान बन जा
दर्द मेरे गान बन जा ....'

आइये निलेश जी के सच से मिलिए -

पिता जी गांधीवादी अध्यापक थे और वो मुझे पढा लिखा कर डाक्टर इंजीनिअर कुछ बनाना चाहते थे, लेकिन मैं दोस्तों के साथ मिल कर शराब पीने और गुंडागर्दी करने में ही लगा रहता था, और बहुत पैसे कमाने का भूत भी सवार था, कभी कभी सोचता था कि मुंबई जा कर डी कंपनी में भर्ती हो जाऊ, पिता जी को सब जगह मेरी वजह से शर्मिंदा होना पड़ता था, कभी कभी गुस्से में वो मेरी पिटाई भी कर देते थे, एक बार मैंने एक दुकान में तोड़फोड़ कर दी, मुझे पता नहीं था कि दुकान का मालिक मेरे पिता जी का परिचित है, जब उसने मुझसे ये कहा तो मैं बहुत शर्मिंदा हुआ, इसी तरह दिन बीतते रहे, इस बीच मेरे कुछ दोस्त जेल की हवा खा रहे थे, मैं किस्मत से बचा हुआ था, पिता जी मुझसे परेशान मैं उनसे परेशान, इसी बीच मेरे मामा जी जो गुवाहाटी में रहते हैं वो मुझे बोले कि मेरे साथ गुवाहाटी चलो तब मैंने सोचा यहाँ रहकर मैं कुछ कर नहीं पाउँगा और मैं गुवाहाटी चला आया, जिस समय हम अपने नौकर को 1000 रूपया तनख्वाह देते थे मैंने यहाँ आ कर 800 रुपये महीने में सुरुआत की और 6 साल नौकरी की 6 साल बाद मेरी तनख्वाह थी 4000 रुपये, बांस के बने घर में बहुत दिन रहा सालों कुँए पर नहाया, जिद्दी तो शुरू से था 1997 में एक छोटी सी बात पर गुस्सा हो कर काम छोड़ कर चल दिया, एक पैसा जेब में नहीं था, अपने घर वालों को मैंने कभी अपनी ये स्थिति नहीं बताई, मैं नहीं चाहता था की मेरे लिए वो लोग चिंतित हों, दोस्तों से उधार ले कर किसी तरह 6-8 महीने बिताये और वो जीवन का बहुत ही बुरा वक़्त था, मेरे एक घनिष्ठ जो कि बहुत पैसे वाले थे उन्होंने उस समय मुझे 2000 रुपये उधार देने से मना कर दिया था, ये अलग बात है कि आज वो दस लाख भी देने को तैयार हैं, लेकिन फिर धीरे धीरे छोटा मोटा व्यवसाय करने लगा, जीवन में बहुत संघर्ष किया लेकिन आज इस लायक बन चुका हूँ कि अपना घर परिवार ठीक से चला रहा हूँ, और किसी भी ज़रूरतमंद के लिए सदा हाज़िर रहता हूँ, वो कहते हैं ना कि जिस पेड़ की जड़ें मजबूत होती है वो तूफ़ान में भी डटा रहता है, तो मेरी भी जड़ें शायद मजबूत हैं और संस्कारों ने मुझे कभी गिरने नहीं दिया, वक़्त के साथ साथ सोच बदलती गयी, अब सिर्फ एक अच्छा इंसान बनने की कोशिश में हूँ, लिखने का शौक तो बचपन से ही था, थोड़े बहुत गुण पिता से भी तो आते हैं!


ख्वाब देखने में

और जीने की जद्दोजहद में
कब बीत गयी ज़िन्दगी
पता ही ना चला,

अब वक़्त बहुत कम है
और काम ज्यादा
काम मतलब किताबें
जो पढनी बाकी हैं,

और हंसना और हंसाना भी तो है

जो कि अब तक मैं नहीं कर पाया! .....

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

संतुलित व्यवहार के धनी (कैलाश सी शर्मा)



आज बैठे हैं मौन
कुछ चेहरे
अपनी झुर्रियों में
कितने दर्द की परतें चढाये,
ताकते उस सड़क को
जिससे अब कोई नहीं आता,
क्योंकि
युवा और बच्चे
खो गये हैं दूर
कंक्रीट के जंगल में
और भूल गये हैं रस्ता
बरगद तक वापिस आने का...

इस सोच , इस अनुभव ने कैलाश सी शर्मा जी के ब्लॉग से मेरी पहचान करवाई . संतुलित व्यवहार के धनी लगे मुझे कैलाश जी .... ब्लॉग http://sharmakailashc.blogspot.com/ के साथ इनका एक ब्लॉग बच्चों के लिए भी है - http://bachhonkakona.blogspot.com/ क्योंकि इनका मानना है कि , अगर चाहते हो तुम खुशियाँ, ढूँढो इसको बचपन में . अपनी उम्र के साथ जो बचपन की मासूमियत साथ लिए चलते हैं उनकी सोच, उनकी परख एक अलग विशेषता रखती है .... उनके कम शब्दों में भी जीवन के सार मिलते हैं , कुछ ऐसे ही सार जीवन के कैलाश जी के ब्लॉग से मिलते हैं .
अपनी कलम से कैलाश जी अपने लिए कहते हैं -

मेरा जन्म 20 दिसम्बर, 1949 को मथुरा (उ.प्र.) के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ. मेरा बचपन मेरी नानी, जो उसी शहर में रहतीं थी, के साथ गुजरा. यह मेरे जीवन का स्वर्णिम समय था और नानी से मुझे जो प्यार मिला वह मेरे लिये आज भी अविस्मरणीय है . मैं जब १५ साल का था, वे इस दुनियां को छोड़ कर चली गयीं, लेकिन मुझे आज भी महसूस होता है कि वे सदैव मेरे आसपास हैं और उनके आशीर्वाद का साया हमेशा मेरे सिर पर है. माता पिता के प्यार के साथ बचपन और कॉलेज जीवन बहुत खुशहाल रहा.

अंग्रेजी साहित्य और अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर शिक्षा के उपरांत संघ लोक सेवा आयोग के द्वारा केन्द्रीय सचिवालय सेवा में चयन के बाद, 1970 में संघ लोक सेवा आयोग, नयी दिल्ली में नियुक्ति होने पर विभिन्न राजपत्रित पदों पर कार्य किया. 1985 में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के सतर्कता विभाग में विशेषज्ञ श्रेणी में ज्वाइन किया और पूर्व, उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत मुख्य रूप से मेरा कार्य क्षेत्र रहा. सम्प्रति मैं सेवानिवृत के पश्चात दिल्ली में रह रहा हूँ.

मेरा सम्पूर्ण कार्यकाल मुख्य रूप से सतर्कता (Vigilance), भ्रष्टाचार-निरोध (Anti-corruption) और फ्रॉड अन्वेषण (Fraud Investigation) के क्षेत्र में रहा. कार्य काल में देश के सुदूर जनजातीय और ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रमण के दौरान असीम गरीबी, शोषण, भ्रष्टाचार और मानवीय संबंधों की विसंगतियों से निकट का सामना हुआ. जब बस्तर के घने जंगलों में औरतों को बिना चप्पल पहने जंगल से लकड़ी लाते या राजस्थान के रेगिस्तान में भीषण गरीबी को देखा तो मन बहुत उद्वेलित हो गया. जब समाज के निम्नतर वर्ग को भी भ्रष्टाचार का शिकार बनते देखता तो यह सहनशीलता की सीमा से परे हो जाता था. गरीबी का निम्नतम स्तर और दूसरी तरफ धन का फूहड़ प्रदर्शन बहुत नजदीकी से देखा, जिसने मेरे जीवन और लेखन पर अमिट छाप छोड़ी.

एक आम सरकारी कर्मचारी की तरह प्रारंभिक जीवन में कुछ कठिनाइयां भी आयीं, पर वह समय भी निकल गया. जीवन में सच्चाई और ईमानदारी के राह से भटकाने के लिये बहुत प्रलोभन भी आये, पर उनका सफलता से मुकाबला कर पाया और इसमें मेरी पत्नी का पूरा सहयोग रहा. जीवन में आवश्यकताओं को अपनी क्षमता के अंदर सीमित रखा और जो कुछ ईमानदारी से कमाया उसी में संतुष्ट रहा. आज बेटे और बेटी अपने अपने जीवन में अच्छी तरह सुव्यवस्थित हैं. आत्म संतुष्टी मेरे जीवन का मूल मन्त्र रहा जिसके कारण आज भी व्यक्तिगत जीवन शांतिपूर्ण बीत रहा है, जिसमें मुझे पत्नी का पूरा सहयोग मिला. रिश्तों की कडवाहट को आज के समय का रिवाज़ या अपनी नियति समझ कर भुलाने की कोशिश करता हूँ.

लिखने का शौक कॉलेज जीवन से ही था, लेकिन कार्य व्यस्तता की वज़ह से समय नहीं निकाल पाता था. फिर भी जब समय मिलता लिखता रहता था. मेरा सब से सुखद पल संघ लोक सेवा आयोग में हिंदी दिवस के अवसर आयोजित प्रतियोगिता में मेरी कविता ताज महल और एक कब्र के लिये आदरणीय बालकवि बैरागी के कर कमलों से प्रथम पुरुष्कार पाना था. लेखन मेरे लिये केवल एक स्वान्तः सुखाय अभिव्यक्ति और आत्म-संतुष्टी का माध्यम है.

2010 में ब्लॉग जगत से परिचित हुआ और अपना पहला ब्लॉग ‘Kashish-My Poetry’ जुलाई 2010 में शुरू किया जिसे प्रबुद्ध पाठकों ने अपना स्नेह और प्रोत्साहन दिया. बच्चों से मुझे बहुत लगाव है क्यों कि उनका साथ जीवन को एक सात्विकता और निस्वार्थ प्रेम देता है. बच्चों के लिये लिख कर मन को बहुत सुकून मिलता है और एक अद्भुत शान्ति का अनुभव होता है, इसलिये 2011 में मैंने बच्चों के लिये ब्लॉग ‘बच्चों का कोना’ शुरू किया.

मेरे ब्लोग्स हैं Kashish-My Poetry और बच्चों का कोना

सोमवार, 11 जुलाई 2011

वो कहते हैं ' पिक्चर अभी बाकी है दोस्त' - रश्मि प्रभा की



क्या रह गया ? वह आवरण जो उस लड़की के चेहरे पर धूप छाँही का खेल खेलता है , या वह जो उसके पहनावे से बता देता है कि वह जो दिखा रही है , वैसी है नहीं या वह जो मेरे शब्दों में सर पटकता है !
तो .... बताओ बंधु , ख़ुशी और दर्द को पूरा शरीर मिलता कहाँ है ! जब तक ख़ुशी की आकृति बनाओ , दर्द आकर उसे अपाहिज बना देता है, जब तक दर्द को रेखांकित करो, ख़ुशी आकर उससे पंगे लेती है . बहुत मुश्किल है इन दोनों को हुबहू उतारना !
चलिए एक प्रयास और सही - छोटी सी वह मिन्नी १३ फरवरी १९५८ को डुमरा (सीतामढ़ी) में जन्मी . तब वहाँ बिजली नहीं थी, यानि बिजली का कनेक्शन नहीं - जन्म के साथ बिजली का आना - शायद तय था मेरे नाम का होना 'रश्मि'.
मुझसे बड़ी तीन बहनें , एक भईया यानि मैं चौथी बेटी थी .... पापा नहीं हुए थे मायूस ना अम्मा , पर लोगों ने धीरे से निराशा व्यक्त की थी - बेटी हुई फिर ! इससे जुडी एक कहानी सुनाती हूँ - एक दिन हम सब बैठे थे , मैं ६ ७ साल की थी , स्कूल में चपरासी थे - चुल्हाई भाई, हाँ हम उनको भाई कहते , शुरू से इसी तरह हम किसी काम करनेवाले को बुलाते थे . हाँ तो चुल्हाई भाई ने बताना शुरू किया - " जब मुन्नू बबुआ हुए तो साहेब के पास जैकारी बाबा आए , साहेब उनको पूरा सीतामढ़ी, डुमरा में मिठाई बांटने का पैसा दिए ..." मैं तन्मयता से सुन रही थी और अपनी बारी की प्रतीक्षा में थी .... बड़े उत्साह से मैंने पूछा - ' और चुल्हाई भाई , हम हुए तो ...' ओह , बहुत ही खराब ढंग से चुल्हाई भाई ने कहा , ' तुम्हारे आने की खबर सुनते सब दुःख से सो गए ' , मैं तो फफक के रो पड़ी ... शाम में जब पापा आए तो मैंने पूछा - ' पापा हम हुए तो सब सो गए थे दुःख से ?' पापा ने बड़े प्यार से कहा - ' ना बेटा , हम जाग रहे थे '.... मैं तो खुश हो गई, पर कुछ बाहरी बड़ों ने चिढाया - ' उनको चिंता से नींद कहाँ आनेवाली थी !' .... ये चिंतावाली बात उस उम्र में समझ में भी नहीं आई . हम ४ बहनें , एक भईया .... कभी कोई फर्क होते हमने नहीं देखा .
मैं तो यूँ भी पापा के शब्दों में रिकॉर्ड प्लेयर थी .... बोलती थी तो बस बोलती जाती थी, गाती थी तो बस.......कोई हमारे घर आता ,पापा अम्मा जब तक नहीं आते , मैं पूछती - 'गाना सुनेंगे ?' जवाब मिले बगैर चालू .... आधे अधूरे जितने गाने याद होते वो सुनाकर हहाहाहा उनका मन लगाते !

धीरे धीरे दीदी भईया लोगों की शादी हो गई .... १९७९ में भईया की शादी हुई . मेरे लिए पापा हमेशा कहते - 'इतनी धूमधाम से शादी होगी कि सब दाँतों तले ऊँगली दबायेंगे ' और मैं ! मुझे तो पलक झपकते पंख लगाकर उड़ने की आदत थी, तो कई उड़ानें भरती . पर पलक झपकते यथार्थ की धरती पर ...................पापा नहीं रहे ....(१९८०) आनन् फानन में बहुत सारे दृश्य बदल गए . जब दृश्य बदलते हैं तो बदलते ही चले जाते हैं , तो बदलते ही गए . .... शादी हुई, बच्चे मेरी ज़िन्दगी बने .......... और ज़िन्दगी को बनाने में मैंने कोई कसर नहीं छोड़ी तो फिर ज़िन्दगी ने भी मुझे कसकर गले लगाया और ... उसीका करिश्मा है कि आज मैं आपके सामने हूँ और मैं जो लिखूं , आप सबकी ऊँगली नहीं छोडती . मैं बनाना चाहती हूँ एक साहित्यिक संसार , जिसे लोग याद करें .... जैसे हम याद करते हैं - महादेवी, पन्त, बच्चन, निराला , टैगोर, प्रसाद, शरतचंद्र , अज्ञेय , दिनकर ............और इनके जैसे कई विलक्षण रचनाकारों को .

अब तो नहीं है न बाकी कुछ ?

रविवार, 10 जुलाई 2011

शांत, खामोश - पर बोलता अस्तित्व ! (अविनाश चन्द्र )



अविनाश .... उससे परिचय ऑरकुट पर हुआ , रचनाओं के माध्यम से - इससे अधिक महत्पूर्ण बात ये है कि मैं इस बच्चे से बहुत प्रभावित रही . 'माँ' के प्रति जो प्यार, श्रद्धा , निष्ठा शब्दों में लिपटे रहते थे , उसे मैं अपनी माँ , अपने बच्चों को पढकर सुनाती . कभी पापा , कभी भाई ...... कई बार शब्द धूमिल हो जाते , आँखों से आशीष बहता .
अविनाश से भी मैं मिली अनमोल संचयन के विमोचन में ... संस्कार तहजीब उसके पूरे वजूद से टपक रहा था . शांत, खामोश - पर बोलता अस्तित्व ! ... मेरी कलम अगर अविनाश को नहीं लिखती तो शख्सियत का यह ग्रन्थ अधूरा होता , क्योंकि इतनी कम उम्र में वह ख़ास ब्लॉगर्स के बीच अपनी पहचान रखता है . उसकी इन पंक्तियों की मासूमियत और अनुभव की प्रखरता पर गौर कीजिये ...

'अम्मी अम्मी
सुपर स्टार कैसा होता है
'जा देख ले अपने अब्बू को '
तब नहीं समझा
सच नहीं माना
अब दस गुनी तनख्वाह में
आधा घर नहीं चलता,
तब जाना.
तुम सच कहती हो अम्मी.'

कितने नम एहसास ... अविनाश के साथ मैं भी मुड़ मुड़के देखती हूँ , मुझे यकीन है आप भी देखेंगे -


बडबडाता हूँ जाने कैसे,
रोकने के लिए आँसू.
जो होते हैं आमादा,
अम्मा के पास रहने को.

नहीं रुकते पर माँ से,
वो गिरा देती है नमक.
चख लेता हूँ उन्ही को,
कुछ कहने को बचता नहीं.

हर कदम कदम पर,
देखता हूँ मुड़ के.
वो भरी भारी आँखें,
वो हिलता हाथ उनका.

उफ़ यह तल्ख़ एहसास,
मुश्किल से चलना मुड़ना.
उस वक़्त वो गली जाने,
कितनी लम्बी लगती है.

गली मुड़ते ही एहसास,
माँ से चिपक जाते हैं.
काश ये गली थोड़ी,
लम्बी हुई होती. .......... यदि मैं अविनाश के इन एहसासों को यहाँ नहीं लिखती तो निःसंदेह उसके साथ न्याय नहीं करती , क्योंकि यह उसके जीवन का आधार है, पहला सच है .


अब अविनाश की कलम से अविनाश -

सच कहूँ ...बीते एक घंटे से सोच रहा हूँ कि क्या लिखूँ?
कारण, किसी इंटरव्यू के अलावा "अपने बारे में" जैसे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया है। और वो कहानियाँ यहाँ नहीं सुना सकता।

सीधे शब्दों में ,
नाम: अविनाश चन्द्र
जन्म: 18 जून, 1986, वाराणसी
शिक्षा: अभियांत्रिकी स्नातक
अनुभव: एक निजी संस्थान में ३ वर्षों से कार्यरत
रुचियाँ: क्रिकेट खेलना, खाना पकाना, बागवानी और जो कुछ मिले सब सीखना
ब्लॉग:
1) मेरी कलम से http://penavinash.blogspot.com/ (यहाँ कवितायें लिखता हूँ, हिंदी में)
2) NEON SIGN http://talebyavi.blogspot.com/ (यहाँ कुछ भी लिखता हूँ, अंग्रेज़ी में)

प्रकाशित:
काव्य संग्रह: अबाबील की छिटकी बूँदें
काव्य संग्रह: अनमोल संचयन (प्रतिभागी कवि)

पूरी ईमानदारी से बात करूँ तो बताने लायक कुछ भी नहीं है मेरे पास, बनारस के एक साधारण से दम्पति कि साधारण सी संतान हूँ और उनका अज्रस प्रेम ही मेरी सबसे बड़ी थाती।
उस अतुल स्नेह और अदम्य ज्ञान में किलकता यही सीखा कि सब सीखना है इसी पार।
साहित्य पढ़ा हो या उसमे रूचि रही हो, ऐसा कहूँगा तो झूठ होगा स्वयं से ही। हाँ, ये कहूँगा कि पढ़ा है, और हमेशा पढ़ा है।
बचपन संभवतः गायत्री मन्त्र से शुरू हुआ होगा या सुन्दरकाण्ड से, ठीक से नहीं कह सकता लेकिन जो सामने आया सब पढ़ा है।
छोटा था तो पिता जी स्कूल खुलने के २-३ दिन पहले किताबें ले आते थे, जिल्द वगैरह बराबर करने के लिए और उन्हें पढने में तो १ दिन ही लगना था, अब आगे?
बड़ी कक्षा वालों की किताबें, यहाँ तक कि गणित की भी, माँग के पढ़ीं हैं।

देखना, सुनना और चुप रहना, बचपन से ऐसे ही व्यसन लगे हुए हैं इस कारण गति तो नहीं ही रहती थी, पर किसी न किसी विधि शिक्षकगण धक्का दे दे के कुछ न कुछ गतिविधि करवा लेते थे।
बचपन से ही हर हफ्ते 'भविष्य में क्या बनना है?' इसका उत्तर बदलता रहता था। आठवीं तक आते-आते चित्रकार, गायक, कवि, पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी यह सब बन के उतर चुका था मैं। इसके बाद क्रिकेट से लम्बा प्रेम रहा, लेकिन कभी न कभी उतरना था ही और फिर मैं एक इंजिनियर बन गया। आजकल ३ वर्षों से गुडगाँव में हूँ।

ज्ञान नहीं है पर आम रूचि की तरह भाषाओँ में भी रूचि है इसलिए जहाँ जाता हूँ वहाँ की भाषा और लिपि सीखने का यत्न करता हूँ, कितना सीख पाता हूँ इस पर बात करना अपनी पोल खोलने जैसा है।

लिखना कब शुरू किया ये याद नहीं, पर हाँ ऐसा दिन होगा जब चित्रकारी नहीं कर पा रहा होऊंगा और कोई एक तरफ से सादा कागज़ हाथ में होगा।हमारी हिंदी की शिक्षिका जो हमें आठवीं में पढ़ाने आयीं थी, उन्होंने संभवतः अधिक कविताई कराई मुझसे। अब जो मैं लिखता हूँ उसे कुछ तो कहना ही पड़ेगा, कविजनों से क्षमा-याचना सहित।
उन्होंने पूरे साल वार्षिक पत्रिका के नाम पर हमें कवितायें लिखने को कहा, और साल ख़त्म होते होते बस मैं था जिसने तीसेक कवितायें दी थीं। नतीजा, कोई पत्रिका नहीं निकली। :)
पर उनके आशीष के शब्द आज भी छाँव करते हैं।

रश्मि जी को तब से जानता हूँ जब मेरा या इनका ब्लॉग नहीं था, बहुत कुछ बदला है लेकिन अब तक एक चीज जो सबसे अच्छी थी, वो अब तक वैसी ही है। जब ये आशीष में कहती हैं, "खुश रहो बेटा!" मन सचमुच खुश हो उठता है। जब से इन्होने मुझसे कहा है परिचय देने को तब से सोच रहा हूँ, मेरा क्या परिचय दूँ?
और ऊपर की लीपा-पोती पढ़ कर कुछ-कुछ तो सब समझ गए होंगे कि बताने भर कुछ है नहीं मेरे पास। फिर भी...

मुठ्ठियाँ भींचें,
मुस्कान लपेट,
बातें करें अनेक।
इससे अच्छा है,
तुम खिसियाओ,
हम चुप रहें।
खोल दें मुठ्ठियाँ,
उड़ा दें जुगनू,
सन्नाटा रौशन हो,
आहिस्ता-आहिस्ता।

शनिवार, 9 जुलाई 2011

शांत नदी सी - (शोभना चौरे)



वेदना तो हूँ पर संवेदना नहीं, सह तो हूँ पर अनुभूति नहीं, मौजूद तो हूँ पर एहसास नहीं, ज़िन्दगी तो हूँ पर जिंदादिल नहीं, मनुष्य तो हूँ पर मनुष्यता नहीं , विचार तो हूँ पर अभिव्यक्ति नहीं|... ये पंक्तियाँ हैं 'अभिव्यक्ति' की मालिकन शोभना चौरे जी की . मैंने शोभना जी को जब भी पढ़ा , वे मुझे एक शांत नदी सी लगी , जिसकी हर लहरों में जीवन के विविध संगीत होते हैं ! मेरे ब्लॉग के शुरूआती दौर में वे नियमित रूप से लिखती रहीं . मैंने जब 'अनमोल संचयन ' का संपादन किया तो शोभना जी भी उसका एक अंश बनीं , तात्पर्य कि उनकी रचना भी इस संग्रह में है . रचनाओं के मध्य मेरा उनका सम्मान का संबंध बना - वे मेरा सम्मान करती हैं, मैं उनका सम्मान करती हूँ .

अब पकड़ते हैं परिचयात्मक सूत्र शोभना जी के शब्दों में -

मेरा जन्म सन १९५४ में खंडवा (मध्य प्रदेश )में ऐसे परिवार में हुआ जहां पर लडकियो को कभी बोझ नही समझा |बहुत हि लाड प्यार से चार बहने होते हुये भी सम्पन्न सम्मिलित परिवार में लालन पालन हुआ |शिक्षा खंडवा में ही हुई |लाड प्यार से पालन जरूर हुआ कितु पिताजी बहुत सी बातो में सख्त | सरकारी पाठशालाओ में सम्पूर्ण शिक्षा | जिस महाविधालय मे पिताजी व्याख्याता थे सुविधाये मिलने के बावजूद भी कन्या महाविद्यालय में ही बड़ी मिन्नतो के बाद प्रवेश लेकर
बी.ए .तक शिक्षा |पढाई से ज्यादा कालेज की अन्य गतिविधियों में ज्यादा सक्रियता |और कालेज में आजीवन कुवारी रहने वाली प्रिंसिपल मेडम के सखत कानून जिन्होंने आत्मविश्वास प्रदान किया | औरे हर गलत बात का विरोध किया फलस्वरूप बहुत झिडकिया खाई है |
इन सब के बीच बड़ी मुश्किल से मिली एक डायरी में छोटी मोती कविताये या लेख लिखकर रख लेती एक बार पिताजी को हिम्मत कर डायरी बताई तो उन्होंने कहा "अब सब कवी ही हो गये क्या ?"तब से वो डायरी इतिहास बन गई |घर के कार्य करना और चोरी चोरी रेडियो सीलोन सुनना (क्योकि सिर्फ आकाशवाणी इंदौर और समाचार सुनना ही रेडियो का काम था )अच्छा लगता साहित्यिक किताबे जो तब समझ में नहीं आती थी उन्हें पढना |
कालेज खत्म होते ही शादी| शादी गाँव में हुई पर पति मुंबई में निजी कम्पनी में इंजिनियर तो एक महिना गाँव में बिताकर मुंबई की राह पर बहुत सारे सपने लेकर सपनो के शहर में |यहाँ भी काकी सास का सख्त कानून सारे सपने सपने ही रहे रहते अलग थे किन्तु मलाड और गोरेगांव के बीच की दूरी आतंक के लिए काफी थी |
आठ साल के देवर को पढ़ने की जिम्मेवारी थी मेरी परिवार में अघोषित नियम था जो पढ़ चुका है उसे आगे की पीढ़ी की जिमेवारी लेनी ही है |अपने भी दो बेटे हो गये |मुंबई के खर्चे बाहर जाकर काम भी नहीं किया जा सकता था \तब सिलाई का काम शुरू किया घर में ही|साथ ही महिला मंडल की सदस्य बनकर उन दिनों म्रणाल गोरे के साथ मिलकर बस्तियों में पढ़ाने का काम भी किया वही के बच्चो के कपड़े ,महिलाओ के कपड़े न्यूनतम शुल्क लेकर सिये |खूब संस्कृतिक गतिविधियों में भी भाग लिया और काकीजी को भी अपने अनुसार ढाल लिया तब काम आसान हो गया |मुंबई में १५ साल बिताने के बाद नोकरी के चलते विकरम सीमेंट( नीमच म प्र.)में आ गये |
यहाँ पर महिला मंडल के सोजन्य से गाँवो में काम करने का अवसर मिला जो मेरी दिली तमन्ना थी १० साल तक खूब काम किया |नेत्र शिविर ,परिवार नियोजन शिविर ,पोलियो शिविर ,महिलाओ को सिलाई सीखन,प्राथमिक स्कूल खोलना ,और सबसे बड़ा काम कारपेट बनाना बुनकर महिलाओ जिनका काम बंद हो चुका था उन्हें ट्रेनिग देकर काम सिखाना जो आज भी चल रहा है |वो मेरे जीवन का स्वर्णिम युग था |
इस बीच सन १९८९ में कविताओ की डायरी खुली |नै कविताये लिखी कुछ लेख धर्मयुग ,वामा सरिता में छपे भी दैनिक अख़बार में भी फिर इन सामाजिक कार्यो और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते फिर लिखना बंद हो गया २००८ में जब ब्लॉग के जरिये फिर लिखना शुरू किया सबका स्नेह पाकर भावनाएं चल पड़ी की बोर्ड के सहारे |
बहुत खूबसूरत जिन्दगी जी है सामाजिक व्यवस्थाओ से रिश्तो से शिकायत तो रहती ही है किन्तु कबीर की वाणी
बुरा जो देखन मै चला बुरा न मिलिया कोय
जो दिल देखा अपना मुझसे बुरा न कोय |
सारी कुंठाओ को मिटा देती है और एक नई उर्जा भर देती है जीवन में |
ब्लागिग ने भी बहुत कुछ दिया है पर पोते निमांश २ साल की बाल लीलाओ में अभी ब्लाग को कुछ नहीं दे पा रही हूँ |
प्रकाशित पुस्तक काव्य संग्रह -शब्द भाव , ... इसके साथ साथ मैं हूँ - 'अनमोल संचयन' एवं 'अनुगूँज' में ...

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

प्यार भरी जिद्दी सी लड़की


कैसे मिली .... कुछ याद नहीं , पर मुझे मिली और उसके मिलने में एक सच्चाई थी , है ....ब्लॉग तो उसके कई हैं , http://sadalikhna.blogspot.com/ सभी अपनी पहचान रखते हैं , पर मुझे जो ब्लॉग सबसे अच्छा लगा , वह है - http://ladli-sada.blogspot.com/ . इस ब्लॉग में सीमा सिंघल ने अपनी माँ की एक अद्वितीय गरिमायुक्त छवि को सुरक्षित किया है , उसकी ममता , बच्चे का भोलापन .... एक पवित्रता है यहाँ .
शांत, स्थिर , अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक ... यह सीमा की विशेषता है , इस विशेषता के साथ एक और विशेषता है उसकी - प्यार भरी जिद्दी सी लड़की की !
जहाँ तक मैं उसके करीब आती गई , बिना मिले उसे बहुत हद तक जाना ... जीवन उसका संघर्षमय रहा , पर अपनी सीमाओं के बीच उसने कभी हार नहीं मानी , न टूटी , ..... एक टूटना प्रत्यक्ष होता है, एक अप्रत्यक्ष - प्रत्यक्ष को हम मान के चलते हैं , अप्रत्यक्ष अपनी जगह होता है . तो - सीमा ने खुद को तो जतन से रखा ही , अपने पास के लोगों का भी भरपूर सम्मान और ख्याल किया .
बचपन में मैंने माँ के लिए पढ़ा था - 'दिन भर फिरकिनी सी खटती माँ बच्चों के सपनों के लिए सजग होती है , सिरहाने लोहे का टुकड़ा रखती है ताकि बुरे सपने ना आएँ '.... सीमा अपने से जुड़े लोगों के लिए ऐसी ही है... दिन भर फिरकिनी सी खटती , उनकी खुशियों , उनके सपनों का ख्याल रखती है !

सीमा की तरह उसका परिचय भी सीमित है - पर परिपक्व है

मैं सीमा सिंघल मेरे शब्‍दों में कहूं तो जब भी कभी मन के दरवाज़े पर भावनाओं ने दस्तक दी, उँगलियों ने उसे कलम के सहारे काग़ज़ पर उतार दिया ! आपने उसे कविता कहा...! ग़म, ख़ुशी, प्रेम, नाराज़गी, आग्रह, अवसाद या कुछ और...! सीधे सादे शब्‍दों में कहूं तो भावनाओं को व्‍यक्‍त करने का माध्‍यम कविता बखूबी करती है ! सिर्फ व्यक्त नहीं करती...बल्कि सिखाती भी है ! अनुराग...समर्पण ...जैसी सच्‍ची भावनाएं, ..जिसमें इंसानी जज्बे का अक्स हो ! मुझसे यह सब जुड़ता हैं.... ''खुद से'' आत्‍ममंथन के रूप में ! बस इसीलिए तो मन को भाता है कविता लिखना ! ...बचपन से ही पसन्‍द है लेखन का यह रूप ...!
कभी आकाशवाणी रीवा से प्रसारण द्वारा तो कभी पत्र-‍पत्रिकाओ में प्रकाशित होते हुए मेरी कवितायेँ आप तक पहुचती रहीं..! सन 2009 से ब्‍लॉग जगत में ‘सदा’ के नाम से जुड़ने के बाद सुखद परिणाम है कि मेरा प्रथम काव्‍य संग्रह ‘अर्पिता’ अब आप सबके बीच है ..! मेरी कुछ और कविताओं को आने वाले संकलन अनुगूंज में पढ़ा जा सकेगा.!
जन्‍म स्‍थान- रीवा (मध्‍यप्रदेश) शिक्षा एम.ए. (राजनीतिशास्‍त्र) से वर्तमान में एक नि‍जी संस्‍थान में निजसचिव के पद कार्यरत हूं रूचियों में लेखन के अलावा पुराने सिक्‍के संग्रहित करना, पुराने फिल्‍मी गीत सुनने के साथ अमृता प्रीतम जी को पढ़ना अच्‍छा लगता है..... मेरा ई-मेल- sssinghals@gmail.com एवं ब्‍लॉग - http://sadalikhna.blogspot.com/

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

बोलने में शालीनता ,बैठने में शालीनता , चलने में शालीनता (मुकेश कुमार सिन्हा)



जब मैंने इन्टरनेट का प्रयोग करना शुरू किया और ऑरकुट प्रोफाइल बन गया तो मेरे बच्चों के बाद मेरा पहला ऑरकुट दोस्त बना ' मुकेश ' . इन्टरनेट तो मुझे यूँ भी जादूनगरी लगी और नगरी में मुकेश ने बड़े प्यार से मुझे दीदी कहा . इतना मज़ा आया कि पूछिए मत .... उसकी कम्युनिटी थी ' JOKES, SHAYERIES & SONGS![JSS]' और मेरी 'मन का रथ' .... शुरुआत में वह मेरे हर लिखे पर कहता - ' कुछ नहीं समझे , कितनी बड़ी बड़ी बातें करती हो ...' पर एक बार उसने कहा -'दीदी मेरा मन कहता है तुम बहुत आगे जाओगी...' ..... जब भी मुझे कोई पड़ाव मिला मुकेश की यह बात मुझे याद आई . एक बार हमारी लड़ाई भी हुई , न उसने मनाया न मैंने - लेकिन रिश्ते की अहमियत थी , हम फिर बिना किसी मुद्दे को उठाये उतनी ही सरलता से बातें करने लगे !
फिर वह दिन आया जब मुकेश ने कुछ लिखा .... हर पहला कदम अपने आप में डगमगाता है , उसे भी खुद पर भरोसा नहीं था . पर मैंने कहा , लिखते तो जाओ ... और आज मुकेश की सोच ने शब्दों से मित्रता कर ली है और शब्दों ने उसे एक सफल ब्लॉगर बना दिया . अब ब्लॉग की दुनिया में उसकी अपनी एक पहचान है .
चुलबुला तो वह आज भी है , पर उस चुलबुलेपन के अन्दर एक शांत, गंभीर व्यक्ति है , जो हँसते हुए भी ज़िन्दगी को गंभीरता से समझता है .
कई बार हम ज़िन्दगी की ठोकरों से आहत कुछ लोगों से कतराते हैं, खुद पे झुंझलाते हैं - फिर अचानक हम बड़े हो जाते हैं और खुद से बातें करते हुए सुकून पाने लगते हैं कि यदि ज़िन्दगी यूँ तुड़ीमुड़ी न होती, अभाव के बादल घुमड़कर न बरसे होते तो जो खिली धूप आज है, वह ना होती !
मुकेश से मेरी मुलाकात 'अनमोल संचयन' के विमोचन में प्रगति मैदान में हुई , बोलने में शालीनता ,बैठने में शालीनता , चलने में शालीनता ...पूरे व्यक्तित्व में कुछ ख़ास था , जिसे शब्दों में नहीं बता सकती , ..... हाँ मुकेश का परिचय - संभव है , आपसे बहुत कुछ कह जाए -



४ सितम्बर १९७१, आनंद चतुर्दशी के दिन मेरा जन्म एक गरीब कायस्थ परिवार में बिहार के बेगुसराय जिला में हुआ था...! वैसे तो राष्ट्रकवि "दिनकर" का जन्म स्थान भी इसी जिले में है....:)...गरीब परिवार और छः भाई बहन में सबसे बड़ा होना...शायद मेरे जीवन में मेरे लिए एक अवरोधक की तरह था..उस पर ये भी पता नहीं था की पढाई क्यूं कर रहे हैं...! विज्ञान(गणित) में स्नातक(प्रतिष्ठा) प्रथम स्थान से उतीर्ण हुआ...क्योंकि घर वालो का मानना था की विज्ञान की पढाई ही सर्वश्रेष्ट है..!काश कुछ और विषय लिया होता..! बाद में ग्रामीण विकास में स्नातकोतर डिप्लोमा भी किया...! चूँकि नौकरी जरुरी थी...तो एक आम छात्र की तरह सामान्य ज्ञान को hobby की तरह अपना लिया..! इस कारण quiz में बहुत सारे पुरूस्कार मिले, all bihar quiz championship में एक बार runner - up भी रहा..! भाग्य का जायदा साथ न दे पाना और शुरू से आर्थिक रूप से आत्म निर्भर होने के कोशिश के कारण भी जायदा कुछ अर्जित नहीं कर पाया...वो तो भगवन का शुक्र है की उम्र बीतने से पहले ही सरकारी नौकरी मिल गयी! सम्प्रति अभी कृषि राज्य मंत्री के साथ जुड़ा हुआ हूँ! मेरी जिंदगी मेरी पत्नी अंजू और दो बेटे यश और ऋषभ हैं...! रश्मि दी के द्वारा संकलित "अनमोल संचयन" में मेरी एक कविता प्रकाशित हो चुकी है....! बहुत बेहतर तो नहीं लिख पता हूँ..पर रश्मि दी के motivation से आज से तीन साल पहले ब्लॉग बनाया था.."जिंदगी की राहें" के नाम से...

मैं हूँ मुकेश कुमार सिन्हा ..
सरकारी नौकर ही नहीं ..कवि भी हूँ सरकार
विवाहित हूँ..और हूँ दो बच्चों का बाप..
खुशियाँ उनकी
बस इतनी सी है दरकार
सीधा सरल सहज..
साधारण सा हूँ इंसान..
सादगी है मेरी पहचान ....
नैतिक कर्त्तव्य ..
सामाजिक दायित्व..
इन सबका मुझे है भान
भावों की रंगोली सजाना
खुशियों के बीज बोना
.आनंद के वृक्ष उगाना
जीवन का है ये अरमान
बस इतना सा ही है मेरा काम.


मुकेश का ब्लॉग - http://jindagikeerahen.blogspot.com/