बुधवार, 3 अगस्त 2011

जिजीविषा की झलक - महेश्वरी कनेरी




ब्लॉग http://kaneriabhivainjana.blogspot.com/ पर जिजीविषा की झलक यूँ मिली - ,"पैतीस साल अध्यापन कार्य करने के बाद ,२००९ में जब मैं सेवानिवृत हुई। मुझे लगा ,मेरा जीवन कहीं रुक सा गया है ,मैं जैसे गति हीन होगई हूँ। मेरे पास करने को कुछ नया नहीं था । मुझे लगता था मैं अपनी पहचान खोने लगी हूँ । यही सब सोच- सोच मुझे डिप्रेशन सा होने लगा था।
तभी अचानक एक दिन गुगुल सर्च करते- करते एक हिन्दी ब्लॉग में जा पहुँची । मुझे मालूम था कि कुछ लोग ब्लॉग लिखा करते हैं, पर इस के बारे में कोई अधिक जानकारी नहीं थी । मुझे लगा… बस मुझे रास्ता मिल गया मुझे मेरी मंजिल मिल गई ।
फिर डरते-डरते मैंने दिनांक ४.अप्रेल २०११ को अपना एक ब्लॉग खोल ही दिया।सब् से पहले माँ सरस्वती का एक सुन्दर सा चित्र लगा कर मैंने प्रथम पोस्ट का श्रीगणेश किया ।उसी दिन फिर एक लघु कविता “ ऋतुराजबसन्त” की दूसरी पोस्ट भी पब्लिश कर दी। ब्लॉग का ये अनुभव मेरे लिए जितना रोमांचकारी था उतना ही अनजाना और अनभिज्ञ भी ।"
खुद को वही दिशा दे पाते हैं , जिनमें हार मानने की प्रवृति नहीं होती .... कोशिशें उनकी ही रंग लाती हैं . प्रतिभाओं की कमी नहीं , पर खुद पे भरोसा नहीं .... महेश्वरी जी में प्रतिभाएं भी मैंने पायीं और जीवन को फिर से एक पहचान देने की उत्कंठा भी देखी , प्रकृति से खुद को जोड़ते हुए उन्होंने मन को पंख दिए - ' रे मन, मुझे ले चल उस पार
जहाँ स्वच्छंद प्रकृति राग सुनाए '
अपनी कलम में उन्होंने अपनी पहचान को गहन मायने दिए इन शब्दों में - ' मैं नारी हूं। नारी ह्रदय की वेदना और पीडा़ मुझ में भी है। लेकिन नारी होने पर मुझे गर्व है। मैं नारी मन की वेदना को अपने कलम में ढाल कर उस एहसास को एक नई सोच व नई दिशा देना चह्ती हूं । यही मेरा सपना है। शुरुवात नई है, शौक पुराना है मंजिल दूर है. रास्ता अंजाना है.”

मुझे हमेशा ऐसे लोगों ने प्रभावित किया और मैंने बेझिझक उन्हें अपने ख़ास कैनवस पर चित्रित किया ...... महेश्वरी जी ने मेरे आगे आप तक पहुँचने के लिए कुछ इस तरह अपने को परिचय का परिधान दिया -

रश्मि प्रभा जी को बहुत-बहुत धन्यवाद उनके अनुकंपा से मै आप सब के सामने अपना ह्रदय खोल रही हूँ………………

मै महेश्वरी कनेरी …एक साधारण परिवार में जन्मी चार बहनों और एक भाई में सबसे बडी़ हूँ । घर में बडी़ होने के कारण भाई बहनों के प्रति मेरी हमेशा से जिम्मेदारियाँ रही है। मेरे पिता शिक्षा और अच्छे संस्कार पर बहुत ज़ोर दिया करते थे ।अपनी हैसियत के अनुसार हम सभी को उन्होंने अच्छी शिक्षा और अच्छे संस्कार दिए । मेरे पिता को मुझ से बहुत आशाएँ और उम्मीदें थीं मुझे हमेशा कहा करते थे “ बेटा ! तू मेरी बेटी नहीं बेटा है “

बचपन से ही मैं बहुत ही संकोची तथा अन्तर्मुखी रही। अपनी मन की बात किसी से कहते घबराती ।बस मन में उठे हर भाव को काग़ज में उतारना अच्छा लगता था। लिखने का सिलसिला वही से शुरु हुआ ।बाबुल के आँगन में भाई बहनों के बीच कब और कैसे बचपन बीत गया और मैं विवाह के बंधन में भी बँध गई पता ही नहीं चला ।

बचपन की एक घटना याद आरही है- जब मैं आठवी पास कर नौवी कक्षा में पहुँची तो मैं संगीत विषय लेना चाहती थी, क्यों कि मुझे संगीत से बहुत लगाव था । लेकिन पता नही क्यों अध्यापिका ने मुझे संगीत लेने ही नही दिया । औरों के मुकाबले मैं इतना बुरा भी नही गाती थी । ये बात मेरे मन को आहत कर गई ।मैंने उसी वक्त फैसला ले लिया कि मैं अपनी बेटी को संगीत जरुर सिखाऊँगी । विधि का विधान देखो आज मेरी बेटी रेडियो आर्टिस्ट होने के साथ- साथ हैदराबाद की जानी मानी गज़ल गायिकाओ मे से एक है ।कभी-कभी दुखी और अबोध मन से लिया, मासूम सा फैसला ईश्वर पूरा कर ही देते हैं।


सन१९७४ में अध्यापि्का के रुप में जब मेरी नियुक्ति केन्द्रीय विधालय में हुई मुझे लगा जैसे आज मेरे पंखो को परवाज़ मिल् गया । छोटे-छोटे बच्चों के बीच रह कर उनके मनोंभाव को समझते हुए उनके रुचि के अनुरुप कुछ गीत और काविताएं लिखने लगी “आओ मिलकर गायें गीत अनेक “ सन १९९४ में ये पुस्तक प्रकाशित हुई । सन१९९६ में गीत नाटिका का एक ओडियो कैसेट निकाला जिसमें छह गीतों भरी कहनियां हैं. सन १९९४ मे मुझे प्रोत्साहन पुरस्कार तथा २००० में राष्ट्र्पति पुरस्कार से सम्मानित कियागया । सन २००९ में सेवानिवृति के बाद ईश्वर की कृपा और आप लोगों की अनुकंपा से मैं फिर से लिखने का प्रयास कर रही हूं ।

जुनून और कुछ् कर गुजरने की चाहत मनुष्य को हमेशा आगे बढ़ाता है। सच्चे मन से किया जाने वाले हर कार्य में ईश्वर का निवास होता है,येसा मेरा विश्वास है । मै सफल हूँ या नहीं लेकिन सन्तुष्ट जरूर हूँ ।

घबराते- घबराते गिरते पड़्ते हम चले डरते-डरते

सोचते थे मंजिल मिलेगी भी या नही

तभी हौंसले ने अंगुली थामी ,विश्वास ने सहारा दिया

और हम चल पड़े, चलते रहे और चलते रहेंगे

क्योंकि आप सब का विश्वास हमारे साथ है

.................................

पंख होने से क्या होता है,हौसलो में उड़ान होती है

जीत उसकी होती है,जिसके सपनों में जान होती है


सच है... इस सच्चाई की जीती जागती तस्वीर है ये -


राष्ट्रपति पुरस्कार





मंगलवार, 2 अगस्त 2011

कभी झरना , कभी बादल - सोनल रस्तोगी



सोनल रस्तोगी कहते कुछ सरसराते शब्द मेरा हाथ पकड़ लेते हैं - 'जब भी खुद को शायरा,लेखिका और बुद्धिजीवी समझती हूँ नींद खुल जाती है' और मैं हंसकर कहती हूँ -' और तब तुम कलम उठा लेती हो, है न !'
कभी झरना , कभी बादल , कभी बारिश की बूंदें , कभी प्यार का अलाव .... क्या नहीं लगती सोनल . चेहरे पर एक शरारत जो कहती है - ' ज़िन्दगी तो यूँ हीं बड़ी गंभीर हुआ करती है , अभी ज़रा मुस्कुरा लेते है ... बड़ी फुर्सत से धूप निकली है ! '
इनका ब्लॉग है - http://sonal-rastogi.blogspot.com/ जहाँ इनकी सादगी, शरारत , और गंभीरता को आसानी से समझा जा सकता है . बिना मिले समझने का इससे बेहतर जरिया और क्या होगा , और मेरी कलम से अपनी कलम की आवाज़ मिलाकर तो इस जानकारी को और सुगम बना दिया है .... कहने को तो है यूँ बहुत सी बातें , पर अभी इतना ही सही ....

चिट सामने है सोनल जी की फिर देर क्यूँ -
अपने परिचय की चिट धीरे से आप तक बढ़ा रही हूँ बिलकुल वैसे ही जसे कोई चुपके से ख़त दरवाजे के नीचे से बढ़ा जाता है , फर्रुखाबाद में जन्मी परिवार की पहली बेटी लाड ढेर सारा ,ढेर सारे रिश्तों से घिरी,बेहद बातूनी ,हद दर्जे की शैतान माँ कहती है जब तक पढ़ना नहीं आया था तबतक ,फिर किताबों में ऐसी डूबी की आज तक नशा कायम है ,लिखने की शुरुवात स्कूल में लोकगीत की तुकबन्दिया भिडाने से शुरू हुई ,फिर गांधी जयंती ,रक्तदान ,नेत्रदान ,प्रदूषण हर सामाजिक विषय पर लिखा नाटक ,एकांकी सब लिखवाया मेरी अध्यापिकाओ ने और माँ सरस्वती के आशीष नें ही आम से ख़ास महसूस करवाया , इसी दौर में बालहंस में अपनी कहानी परिचय के साथ भेजी जो बाल प्रतिभा विशेषांक में छपी,फिर क्या था खाली लिफाफे और टिकेट मिल गए खूब लिखो और भेजो मनीआर्डर की रसीदे आज तक सहेजी है अपर किताबें ना सहेज पाई ,अनमोल है ना .....
हर बार प्रोत्साहन मिला,वाद विवाद प्रतियोगिता ,नृत्य हर विधा का आनंद लिया ,खेलों में फिसड्डी थी हूँ और रहूंगी ,समय के साथ डायरी भरती गई 12th तक हर विषय पर लिखा ..लोगों के प्रेम पत्रों के लिए शायरी भी लिखी,समय बदला परिस्थितिया बदली पढ़ाई के बोझ के तले कविता कहानियाँ सब खो गई बहित बड़ा शून्य आ गया लेखन में,आगे बढना था ढेर सारी पढ़ाई, होने वाले जीवन साथी से जब मिली तो उनका मन भी एक कविता ने चुराया
"आज दिल ने चाहा बहुत अपना भी हमसफ़र होता
जिससे कहते हालात दिल के जिसके काँधे पर अपना सर होता ..... (बाकी फिर कभी )"

भावनाएं उमड़ी और दिल से फिर फूट पड़ी कविता कहानिया, फर्रुखाबाद ..लखनऊ...मेरठ ...गुडगाँव . शहर बड़े होते गए और मैं इनके साथ बदलती गई, नया रिश्ता , नया शहर और ढेर सारा आत्मविश्वास और सहयोग. बस एक देसीपन आज तक वैसा ही है .. . ब्लॉग्गिंग से परिचय मेरे देवर डा. अंकुर ने करवाया http://gubaar-e-dil.blogspot.com/ तब से जो पंख लगे आज तक उड़ रही हूँ, एक दिन रविश जी ने मेरे ब्लॉग को अपने कॉलम में जगह क्या दी तब से मेरी दुनिया बहुत बड़ी हो गई और प्यारी भी , रचनाओ को पाठक मिले और मुझे पढने के लिए ढेर सारी सामग्री, सच में यहाँ मैं सिर्फ मैं हूँ बेहद सुकून मिलता है.
अभी तो घुटुनो के बल हूँ ,धीरे-धीरे चलूंगी पर दौड़ना नहीं है मुझे, ज़िन्दगी स्लो मोशन में ही भाती है सब देखना है मुझे .
क्या पता किसी दिन ब्लॉग से अखबार और अखबार से किताब की शक्ल ले लूँ ...

शनिवार, 30 जुलाई 2011

एक गहरा वजूद - असीमा भट्ट



ब्लॉग की दुनिया बहुत बड़ी है ... हर बार घूमते हुए यह गीत होठों पर काँपता है , 'इतना बड़ा है ये दुनिया का मेला , कोई कहीं पे ज़रूर है तेरा ' शब्दों का रिश्ता बनाने के लिए मानस के रश्मि ज्वलित जल से
मैं शब्द शब्द में तैरती भावनाओं का अभिषेक करती हूँ , तन्मयता से मोती चुनती हूँ - हर किसी का अपना एक गहरा वजूद है , अपना अकेलापन और अकेलेपन में निखरी ज़िन्दगी है . उड़ान में कभी मैं दस्तक देती हूँ , कभी सामनेवाला - फिर कहते सुनते पढ़ते जीवन के पार छुपे वे तार दिखने लगते हैं , जिन पर उंगलिया रखो तो वे कभी एथेंस का सत्यार्थी के गीत गाती है, कभी बुद्ध, कभी यशोधरा , कभी कोलंबस, कभी आम्रपाली , कभी नीर भरी दुःख की बदली .... अनंत परिभाषाएं , अनंत अनुकरणीय कदम !
पौ फटते अपनी दिनचर्या के बीच मैं एक अनंत यात्रा करती हूँ , और किसी दहलीज पर रुक जाती हूँ . फिर उस दहलीज से सोंधे एहसास , सोंधे आंसू, सोंधे सोंधे सपनों की खुशबू और हौसले ले आती हूँ ताकि जब कभी साँसें लड़खड़ाने लगें तो किसी पन्ने को आप अपना आदर्श बना लें !
कुछ ऐसा ही एक आधार हैं असीमा भट्ट , जिनकी दहलीज से मैंने उनकी पहचान को उनके शब्दों में ढूंढा - " मैं कौन हूं ? इस सवाल की तलाश में तो बड़े-बड़े भटकते फिरे हैं, फिर चाहे वो बुल्लेशाह हों-“बुल्ला कि जाना मैं कौन..” या गालिब हों- “डुबोया मुझको होने ने, ना होता मैं तो क्या होता..”, सो इसी तलाश-ओ-ताज्जुस में खो गई हूं मैं- “जो मैं हूं तो क्या हूं, जो नहीं हूं तो क्या हूं मैं...” मुझे सचमुच नहीं पता कि मैं क्या हूं ! बड़ी शिद्दत से यह जानने की कोशिश कर रही हूं. कौन जाने, कभी जान भी पाउं या नहीं ! वैसे कभी-कभी लगता है मैं मीर, ग़ालिब और फैज की माशूका हूं तो कभी लगता है कि निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो की सुहागन हूं....हो सकता कि आपको ये लगे कि पागल हूं मैं. अपने होश में नहीं हूं. लेकिन सच कहूं ? मुझे ये पगली शब्द बहुत पसंद है…कुछ कुछ दीवानी सी. वो कहते हैं न- “तुने दीवाना बनाया तो मैं दीवाना बना, अब मुझे होश की दुनिया में तमाशा न बना…”

और स्वतः मेरी हथेलियाँ उनके मन के दरवाज़े पर दस्तकें देने को आतुर हो गईं और बड़ी मीठी सी मुस्कान लिए द्वार खुले , ----- जिनकी मासूमियत से हवाएं अपना रूख बदलती हैं , वे अनजाने उन्हें जिद्दी बना जाती हैं और यही जिद्द खुद के साथ होड़ लेती हवाओं को अपना हमसफ़र बना लेती हैं . नहीं इंतज़ार होता उन्हें किसी से सुनने का ' यू आर द बेस्ट ' , क्योंकि विपरीत परिस्थितियाँ उनका स्वर बन जाती हैं - ' आय एम द बेस्ट !'

अब आगे असीमा जी के साथ बढ़ते हैं . समय की अफरातफरी और खुली ज़िन्दगी के संजोये पलों में असीमा जी समझ नहीं पा रही थीं कि क्या लिखा जाए , फिर मैंने उनके पास अपने प्रश्न रख दिए जिनके जवाब उनका परिचय बन गए


सबसे पहले धन्यवाद मुझ नाचीज को इतनी इज्ज़त देने के लिए .तो सुनिए ........

मेरा बचपन फ़ुल ऑफ़ लाइफ था . नाना जी ज़मींदार थे , दादा जी बहुत ही प्रतिष्ठित डॉक्टर और सिनेमा हॉल के मालिक थे . और पिता जी BHU (बनारस हिन्दू युनिवेर्सिटी ) के स्टुडेंट थे जो बाद में स्टुडेंट मूवमेंट में शामिल हो गए . मैं तीन बहनों और एक भाई में सबसे बड़ी थी . जब मैं छोटी थी पिता जी ने घर छोड़ दिया . कम्युनिस्ट पार्टी के होल टाईमर हो गए . माँ को बहुत दुःख हुआ था . सदमे में वो मुझे मारती थीं क्योंकि मैं पिता की कट्टर पक्षधर (पिता जी को बहुत प्यार और रेस्पेक्ट देती थी ) . इसलिए माँ को बुरा लगता था और अपना गुस्सा मुझपर उतारती थीं . और शायद इसलिए भी कि शायद मैं बचपन में बहुत चंचल थी . बहुत शैतानियाँ करती थी . जो कि मेरा एक लड़की होने के नाते माँ को गवारा नहीं था . बस खूब पिटाई होती थी और मैं फिर भी शैतानियाँ करती थीं . शायद यही वो वजह है कि मैं जिद्दी हो गई .

अपने पिता के बारे में कहूँ तो हमेशा मुझे उनकी बात अच्छी ही लगी . तब भी अच्छा लगता था , कभी बुरा नहीं लगा . कभी उपेक्षित नहीं महसूस किया . हमेशा प्राउड फील होता था . मुझे बचपन का एक वाकया याद आता है . एक बार मुझे स्कूल में कल्चरल प्रोग्राम में फर्स्ट आने के लिए पुरस्कार मिला था . पुरस्कार वहाँ के D.M. दे रहे थे , उन्होंने पुरस्कार देते हुए मुझसे पूछा -"तुम्हारे पापा का नाम क्या है ? मैंने कहा - श्री सुरेश भट्ट , वो बोले - अच्छा , तो तुम 'भट्ट जी ' की बेटी हो , वाह "
मैंने यह बात घर आकर पिता जी को बताया कि - DM ने यह कहा कि आप 'भट्ट जी ' की बेटी हो - वाह !'
पापा बोले - मुझे उस दिन ख़ुशी होगी जब लोग कहेंगे कि मुझसे - ' क्रांति भट्ट (वो मुझे क्रांति ही बुलाते थे ) के पिता हो .वाह !'

मैंने अपनी जिंदगी को नहीं ढाला, बस खुद ब खुद ढलता चला गया . "अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं , रुख हवाओं का जिधर का है , उधर के हम हैं .

मुझे महात्मा बुद्ध की तरह दिखाई देते हैं अपने पापा (बुद्ध की तरह ही वे हमें बचपन में छोड़ कर समाज सेवा के लिए चले गए थे ) , बातें भी उन्हीं की तरह करते . मुझे याद है , जब मैं बच्ची थी मेरे पापा नक्सलाईट थे , वो कहा करते थे - "हम नक्सलाईट लोग हैं , गोली पहले चलाते हैं सोचते बाद में हैं ." आज वही इन्सान कहते हैं - "हिंसा से कुछ भी हासिल नहीं होगा . हिंसा किसी समस्या का हल नहीं ."

मैं फिल्म में कहाँ आना चाहती थी . बहुत ही ओर्थोडोक्स फैमिली में थी , वहाँ ऐसी बातें सोचना भी गुनाह था . मैं पता नहीं कैसे आ गई . आज भी यह एक पहेली सा लगता है कि मैं कैसे यहाँ तक आ गई ! Its all destiny

जिंदगी मेरे लिए एक इम्तहान है . मैं रोज़ एक प्रश्न -पत्र हल करती हूँ . रोज़ इम्तहान देती हूँ और हाँ रोज़ पास होती हूँ

लेखन से भी कैसे जुड़ी , यह भी ठीक से याद नहीं . शायद पापा की किताबें पढ़ने की आदत मेरे अन्दर आई . शायद इसीलिए थोड़ा बहुत लिख लेती थी . फिर जब मैं पटना आई तो सर्वाइवल के लिए मुझे न्यूज़ पेपर में काम करना पड़ा . और ऐसे लिखना पेशा बन गया ...

जिंदगी से मुझे कोई शिकायत - नहीं . कुछ भी नहीं . I love it. My life is beautifull.

बहुत कुछ खोया है .... बहुत कुछ पाया है . अब तो बात जिद्द पे आ गई है - अब तो जिंदगी से सूद समेत वापस लेना है और उसे भी देना पड़ेगा .
आखिर में इतना ही कहूँगी - मुश्किलें पड़ीं मुझ पे इतनी कि ज़िन्दगी आसान हो गई ....

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

अनकहा कहा - मीनाक्षी धन्वन्तरी

(नोट - अस्वस्थता की वजह से मेरी कलम रुक गई थी , अभी भी मध्यांतर का आलम होगा .... पर कलम चलेगी )


कितना कुछ अनकहा कहा होता है , जो कभी पत्तियों से ओस बन सरकता है , कभी चिड़ियों की उड़ान में गगन का विस्तार नापता है , कभी किसी की सिसकी में अपनी ज़िन्दगी के इक लम्हें को पाता है , कभी सन्नाटे में एक मुस्कान रख देता है , फिर अचानक बिल्कुल अचानक अपनी डायरी के पन्नों में उसे समेट बन्द कर देता है उस कमरे में - जहाँ हर ताखे पर यादों की एक सिहरती पोटली होती है ....... ऐसा ही लगा जब अपनी यात्रा के दौरान मैं मीनाक्षी जी के ब्लॉग http://meenakshi-meenu.blogspot.com/ पर रुकी ..... उनकी रचना ' मेरे पास एक लम्हा है ' एक लम्हें की मानिंद मेरी दोस्त बन गई ... हर एक कदम पर महसूस हुआ , यह पहचान आज की नहीं ... कुछ है जो दोनों के मध्य सरस्वती की तरह प्रवाहित है .

कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते हैं , दो आँखें होती हैं - जिनसे आंसू अनजाने छलक उठते हैं , दो पाँव होते हैं - जिनके छालों से रास्तों की पहचान मिलती है , और होती है एक सहज मुस्कान जिसकी व्याख्या नहीं होती ...

चलिए अनकहे कहे से कुछ सुनें -

कितने दिनों से टलता आ रहा सीधा सादा सा परिचय आज कुछ हिम्मत करके एक कदम आगे बढ़ा ....यह सोच कर कि रश्मिजी की क़लम राह चलते चलते अपने हुनर से उसे सँवार ही देगी....
“जब से होश सँभाला प्रेम को ही सत्य माना...इसलिए ब्लॉग का नाम भी रखा ‘प्रेम ही सत्य है’” बचपन से ही प्रकृति और मानव में एक दूसरे की छाया मन को आकर्षित करती...वही जाने अंजाने लेखन में झलक जाता..इसी से जुड़ी एक घटना का ज़िक्र ज़रूरी लगता है...सातवीं कक्षा में हिन्दी टीचर ने प्रात:काल पर एक लेख लिखने को कहा...चहचहाती चिड़ियाँ लगी थीं देश के भूखे बच्चे जो रोते हैं एक निवाले के लिए...या शायद बिन माँ के बच्चे माँ के आँचल के लिए... बस फिर क्या था फौरन मम्मी डैडी की पेशी हुई कि शायद घर में कुछ अनहोनी न हुई हो...उसके बाद से लेखन जारी रहा लेकिन डायरी के पन्नों में कैद रहा...मुक्त हुआ तो 2007 में..डायरी के पन्नों से उतरा ब्लॉग़ पर....
अपने जीवन के बारे में क्या कहूँ...आम जीवन है लेकिन खास भी है....जिससे हर पल कुछ न कुछ नया सीखा... जन्म लेते ही दादी के रोने का सबब बनी लेकिन डैडी ने गोद में लेते ही कहा कि यह तो मेरी मीठी मधु है...बहेगी हमारे घर में महकती हुई मधु की धार और फिर छोटी बहन बेला भी आ गई.....दोनो बहनें जहाँ मम्मी डैडी और ननिहाल की लाडली थीं वहीं ददिहाल में एक आँख न देखी जातीं...फिर भी हमें दादी बहुत प्यारी लगतीं... शायद मम्मी के संस्कार थे जिन्होंने दादी की झिड़की को भी प्यार समझने की नसीहत दी.
ग्यारह साल की हुई तो घर में नन्हा सा चाँद उतरा....सबकी आँखों का तारा खासकर मम्मी डैडी के लिए तो वह तोता था जिसमें उनकी जान बसती फिर भी हम दोनों को कभी न लगता कि तीनों में कोई भेदभाव किया जाता है... सब को बराबर का प्यार और दुलार मिलता....शायद उसी कारण तीनों भाई बहन आज तक एक दूसरे के लिए कुछ भी करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं...
लड़की लड़के कोई भेदभाव ही नहीं था...कोई रोक टोक नही थी... इसलिए शायद आज़ादी मिलने पर भी उसका कभी फायदा नहीं उठाया हाँ मस्ती ज़रूर की...गर्मी की जिन छुट्टियों में ननिहाल या कुल्लू मौसी के पास न जा पाते तब मुझे अकेले ही जहाँ मैं जाना चाहती भेज दिया जाता...आठवीं में पहली बार अम्बाला अकेली गई थी...आज भी याद है जब बस से उतर कर घर जाने के लिए रिक्शे वाले का चेहरा पढ़कर रिक्शे पर बैठी थी...फिर भी सतर्क थी कि अगर वह किसी गलत गली में मुड़ा तो उसके सिर पर ब्रीफकेस दे मारूँगी...दसवीं के बाद अकेले कश्मीर जाने का अनुभव तो और भी दिलचस्प था...
दिल्ली में जन्मी पली-बढ़ी...स्कूल और कॉलेज खत्म हुआ तो.....बस यहीं ज़िन्दगी कुछ अटक गई या बहक गई...चार साल तक आवारा मस्त हवा की तरह बिना किसी लक्ष्य के बहती रही..... अपने मौसेरे भाई के ऑफिस में एक साल रिसेप्शनिस्ट की नौकरी की जहाँ मौसी से बहुत कुछ सीखा...उनकी एक बात को आज तक गाँठ बाँध कर रखा है.....”अपेक्षाओं की अति हमेशा दुख देती हैं... चाहे वे अपने से हों या अपनों से” उसके बाद पत्राचार से हिन्दी में एम.ए. किया.... उस दौरान जाना कि भाषाएँ जीवन में कितना महत्व रखती हैं...भाषाएँ भावनाओं को पुष्ट करती हैं... एक अच्छा डॉक्टर या इंजिनियर बनने के लिए अगर उनसे जुड़े विषय पढ़ने जरूरी होते हैं तो भाषा एक अच्छा इंसान बनाने में मदद करती है...और फिर एक अच्छा इंसान ही जीवन में आगे बढ़ सकता है......
अपनी सुरक्षा के लिए जूडो कराटे सीखने के लिए भेजा गया...उस कला का सही वक्त पर इस्तेमाल हो इसके लिए योग करने मानतलाई गई....मम्मी को मेरी लक्ष्यहीन ज़िन्दगी पसन्द नहीं थी, वे चाहती थीं कि अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए कुछ करूँ... इधर डैडी की शय पाकर मैं अपने में मस्त बेफिक्र जीती रही....समाज और परिवार की तरफ से इशारा मिलते ही उस मस्ती पर रोक लगानी पड़ी...कानून और राजनिति की पढ़ाई बीच में ही छूट गई और शादी हो गई.....
ज़िन्दगी का आधा शतक पार करने पर बैठी सोच रही हूँ कि जितना विश्वास और आज़ादी का वातावरण माता-पिता के घर था उससे कहीं ज़्यादा पति के घर में पाया.....शादी के बाद रियाद आकर ज़िन्दगी ने नई करवट ली....दोनों बेटों के साथ हमने भी स्कूल में दाख़िला ले लिया हिन्दी अध्यापिका के रूप में....उस वक्त का वह निर्णय मेरी ज़िन्दगी का बेहतरीन फैंसला था..... ज़िन्दगी मेरी गुरु थी उसी के अनुभवों को बाँटने लगी स्कूल के बच्चों में...
जहाँ तक लेखन की बात है वह तो बचपन से साथ था जो अब तक है...रियाद और दुबई में पढ़ाते हुए डायरी, लेख, कविता और कहानी ने एक नया रूप पाया छोटे छोटे एकांकी और नाटकों के रूप में...बच्चों के साथ लिखना पढ़ना और भी बढ़ गया...स्कूल मेग्ज़ीन में हिन्दी सम्पादन के दौरान बच्चों की हिन्दी में लिखी रचनाएँ मन खुश कर देतीं...स्कूल कॉलेज के कई बच्चे आज भी हिन्दी सीखना पढ़ना चाहते हैं,,,गीत गज़ल और नाटक का मंचन करना चाहते हैं लेकिन......... इस लेकिन का जवाब आपको ढूँढना है...!!

मेरा परिचय चाहा आपने इसका आभार

कोशिश करके देती हूँ इसे कुछ आकार...

न मैं रचनाकार नामी, न कोई साहित्यकार

हूँ बस एक आम साधारण सी चिट्ठाकार ...

जो भी है सब कुछ है अपना घर परिवार

होती हैं इनमें छोटी छोटी खुशियाँ साकार ....

चिट्ठा ‘प्रेम ही सत्य’ करता सबका सत्कार

स्वागत करता, नहीं किसी को देता दुत्कार

सरल सहज सा लिखती, हूँ ऐसी कर्मकार

है मेरा लेखन सादा, है सादा ही व्यवहार

यहाँ सभी हैं एक से बढ़कर एक कलाकार

उन सभी को मेरा प्यार भरा नमस्कार


बुधवार, 13 जुलाई 2011

जहाँ गई नज़रें , भाव उमड़े (निलेश माथुर)



निलेश माथुर , ब्लॉग - http://mathurnilesh.blogspot.com/ , मुझे इस ब्लॉग से मिलना बहुत अच्छा लगा . रोज़मर्रा की जुड़ी चीजें .... निलेश जी ने सबको शब्द दिए ... फूलदान, मेरी कमीज ,मेरी पतलून ,मेरा जूता, मेरा ट्रांजिस्टर, ..... आपने पढ़ा है ? इसे कहते हैं , जहाँ गई नज़रें , भाव उमड़े और शब्दों ने उनको जीवंत कर दिया . चलिए एक पढ़वा ही दूँ , जिसने नहीं पढ़ा हो , वे भी मेरी तरह मिलकर खुश हो जाएँ - http://mathurnilesh.blogspot.com/2010/04/blog-post_21.html .
मैं आज भी उनको नियम से पढ़ती हूँ , पर ब्लॉग पर जाने से पहले ये सारे प्रसंग मुझे याद आ जाते हैं और धीरे से मैं ढूंढती हूँ - कमरे का आईना , रेत के कण, बारिश की बूंदें , बेतरतीब ज़िन्दगी, सोचती ज़िन्दगी .......

परिचय लिखने से पूर्व मैंने हर शख्स का परिचय पढ़ा , निलेश जी ने जब दीदी संबोधन के साथ अपना परिचय मुझे दिया तो इस संबोधन ने तो मुझे अभिभूत किया ही , निलेश जी के सच ने मुझे सुकून दिया .... सच कहने का साहस तो दूर की बात है, मन से भी कोई स्वीकार कर ले तो बड़ी बात है . निलेश जी ने परिचय भेजते हुए लिखा - दीदी, मेरी बचपन से अब तक की यात्रा शायद आपको अच्छी नहीं लगेगी लेकिन संक्षेप में सब सच सच लिख रहा हूँ ! इस सच ने निलेश जी को मेरी नज़रों में और ऊँचा कर दिया
. मैंने अपनी ज़िन्दगी में सच का सम्मान किया है . इस सच के निकट अपनी माँ (श्रीमती सरस्वती प्रसाद ) की लिखित पंक्तियाँ याद आ गईं -

'दर्द मेरे गान बन जा
सुन जिसे धरती की छाती हिल पड़े
वज्र सा निर्मम जगत ये खिल पड़े
लाज रखकर ह्रदय की ऊँची इमारत का
मेरा सम्मान बन जा
दर्द मेरे गान बन जा ....'

आइये निलेश जी के सच से मिलिए -

पिता जी गांधीवादी अध्यापक थे और वो मुझे पढा लिखा कर डाक्टर इंजीनिअर कुछ बनाना चाहते थे, लेकिन मैं दोस्तों के साथ मिल कर शराब पीने और गुंडागर्दी करने में ही लगा रहता था, और बहुत पैसे कमाने का भूत भी सवार था, कभी कभी सोचता था कि मुंबई जा कर डी कंपनी में भर्ती हो जाऊ, पिता जी को सब जगह मेरी वजह से शर्मिंदा होना पड़ता था, कभी कभी गुस्से में वो मेरी पिटाई भी कर देते थे, एक बार मैंने एक दुकान में तोड़फोड़ कर दी, मुझे पता नहीं था कि दुकान का मालिक मेरे पिता जी का परिचित है, जब उसने मुझसे ये कहा तो मैं बहुत शर्मिंदा हुआ, इसी तरह दिन बीतते रहे, इस बीच मेरे कुछ दोस्त जेल की हवा खा रहे थे, मैं किस्मत से बचा हुआ था, पिता जी मुझसे परेशान मैं उनसे परेशान, इसी बीच मेरे मामा जी जो गुवाहाटी में रहते हैं वो मुझे बोले कि मेरे साथ गुवाहाटी चलो तब मैंने सोचा यहाँ रहकर मैं कुछ कर नहीं पाउँगा और मैं गुवाहाटी चला आया, जिस समय हम अपने नौकर को 1000 रूपया तनख्वाह देते थे मैंने यहाँ आ कर 800 रुपये महीने में सुरुआत की और 6 साल नौकरी की 6 साल बाद मेरी तनख्वाह थी 4000 रुपये, बांस के बने घर में बहुत दिन रहा सालों कुँए पर नहाया, जिद्दी तो शुरू से था 1997 में एक छोटी सी बात पर गुस्सा हो कर काम छोड़ कर चल दिया, एक पैसा जेब में नहीं था, अपने घर वालों को मैंने कभी अपनी ये स्थिति नहीं बताई, मैं नहीं चाहता था की मेरे लिए वो लोग चिंतित हों, दोस्तों से उधार ले कर किसी तरह 6-8 महीने बिताये और वो जीवन का बहुत ही बुरा वक़्त था, मेरे एक घनिष्ठ जो कि बहुत पैसे वाले थे उन्होंने उस समय मुझे 2000 रुपये उधार देने से मना कर दिया था, ये अलग बात है कि आज वो दस लाख भी देने को तैयार हैं, लेकिन फिर धीरे धीरे छोटा मोटा व्यवसाय करने लगा, जीवन में बहुत संघर्ष किया लेकिन आज इस लायक बन चुका हूँ कि अपना घर परिवार ठीक से चला रहा हूँ, और किसी भी ज़रूरतमंद के लिए सदा हाज़िर रहता हूँ, वो कहते हैं ना कि जिस पेड़ की जड़ें मजबूत होती है वो तूफ़ान में भी डटा रहता है, तो मेरी भी जड़ें शायद मजबूत हैं और संस्कारों ने मुझे कभी गिरने नहीं दिया, वक़्त के साथ साथ सोच बदलती गयी, अब सिर्फ एक अच्छा इंसान बनने की कोशिश में हूँ, लिखने का शौक तो बचपन से ही था, थोड़े बहुत गुण पिता से भी तो आते हैं!


ख्वाब देखने में

और जीने की जद्दोजहद में
कब बीत गयी ज़िन्दगी
पता ही ना चला,

अब वक़्त बहुत कम है
और काम ज्यादा
काम मतलब किताबें
जो पढनी बाकी हैं,

और हंसना और हंसाना भी तो है

जो कि अब तक मैं नहीं कर पाया! .....

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

संतुलित व्यवहार के धनी (कैलाश सी शर्मा)



आज बैठे हैं मौन
कुछ चेहरे
अपनी झुर्रियों में
कितने दर्द की परतें चढाये,
ताकते उस सड़क को
जिससे अब कोई नहीं आता,
क्योंकि
युवा और बच्चे
खो गये हैं दूर
कंक्रीट के जंगल में
और भूल गये हैं रस्ता
बरगद तक वापिस आने का...

इस सोच , इस अनुभव ने कैलाश सी शर्मा जी के ब्लॉग से मेरी पहचान करवाई . संतुलित व्यवहार के धनी लगे मुझे कैलाश जी .... ब्लॉग http://sharmakailashc.blogspot.com/ के साथ इनका एक ब्लॉग बच्चों के लिए भी है - http://bachhonkakona.blogspot.com/ क्योंकि इनका मानना है कि , अगर चाहते हो तुम खुशियाँ, ढूँढो इसको बचपन में . अपनी उम्र के साथ जो बचपन की मासूमियत साथ लिए चलते हैं उनकी सोच, उनकी परख एक अलग विशेषता रखती है .... उनके कम शब्दों में भी जीवन के सार मिलते हैं , कुछ ऐसे ही सार जीवन के कैलाश जी के ब्लॉग से मिलते हैं .
अपनी कलम से कैलाश जी अपने लिए कहते हैं -

मेरा जन्म 20 दिसम्बर, 1949 को मथुरा (उ.प्र.) के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ. मेरा बचपन मेरी नानी, जो उसी शहर में रहतीं थी, के साथ गुजरा. यह मेरे जीवन का स्वर्णिम समय था और नानी से मुझे जो प्यार मिला वह मेरे लिये आज भी अविस्मरणीय है . मैं जब १५ साल का था, वे इस दुनियां को छोड़ कर चली गयीं, लेकिन मुझे आज भी महसूस होता है कि वे सदैव मेरे आसपास हैं और उनके आशीर्वाद का साया हमेशा मेरे सिर पर है. माता पिता के प्यार के साथ बचपन और कॉलेज जीवन बहुत खुशहाल रहा.

अंग्रेजी साहित्य और अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर शिक्षा के उपरांत संघ लोक सेवा आयोग के द्वारा केन्द्रीय सचिवालय सेवा में चयन के बाद, 1970 में संघ लोक सेवा आयोग, नयी दिल्ली में नियुक्ति होने पर विभिन्न राजपत्रित पदों पर कार्य किया. 1985 में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के सतर्कता विभाग में विशेषज्ञ श्रेणी में ज्वाइन किया और पूर्व, उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत मुख्य रूप से मेरा कार्य क्षेत्र रहा. सम्प्रति मैं सेवानिवृत के पश्चात दिल्ली में रह रहा हूँ.

मेरा सम्पूर्ण कार्यकाल मुख्य रूप से सतर्कता (Vigilance), भ्रष्टाचार-निरोध (Anti-corruption) और फ्रॉड अन्वेषण (Fraud Investigation) के क्षेत्र में रहा. कार्य काल में देश के सुदूर जनजातीय और ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रमण के दौरान असीम गरीबी, शोषण, भ्रष्टाचार और मानवीय संबंधों की विसंगतियों से निकट का सामना हुआ. जब बस्तर के घने जंगलों में औरतों को बिना चप्पल पहने जंगल से लकड़ी लाते या राजस्थान के रेगिस्तान में भीषण गरीबी को देखा तो मन बहुत उद्वेलित हो गया. जब समाज के निम्नतर वर्ग को भी भ्रष्टाचार का शिकार बनते देखता तो यह सहनशीलता की सीमा से परे हो जाता था. गरीबी का निम्नतम स्तर और दूसरी तरफ धन का फूहड़ प्रदर्शन बहुत नजदीकी से देखा, जिसने मेरे जीवन और लेखन पर अमिट छाप छोड़ी.

एक आम सरकारी कर्मचारी की तरह प्रारंभिक जीवन में कुछ कठिनाइयां भी आयीं, पर वह समय भी निकल गया. जीवन में सच्चाई और ईमानदारी के राह से भटकाने के लिये बहुत प्रलोभन भी आये, पर उनका सफलता से मुकाबला कर पाया और इसमें मेरी पत्नी का पूरा सहयोग रहा. जीवन में आवश्यकताओं को अपनी क्षमता के अंदर सीमित रखा और जो कुछ ईमानदारी से कमाया उसी में संतुष्ट रहा. आज बेटे और बेटी अपने अपने जीवन में अच्छी तरह सुव्यवस्थित हैं. आत्म संतुष्टी मेरे जीवन का मूल मन्त्र रहा जिसके कारण आज भी व्यक्तिगत जीवन शांतिपूर्ण बीत रहा है, जिसमें मुझे पत्नी का पूरा सहयोग मिला. रिश्तों की कडवाहट को आज के समय का रिवाज़ या अपनी नियति समझ कर भुलाने की कोशिश करता हूँ.

लिखने का शौक कॉलेज जीवन से ही था, लेकिन कार्य व्यस्तता की वज़ह से समय नहीं निकाल पाता था. फिर भी जब समय मिलता लिखता रहता था. मेरा सब से सुखद पल संघ लोक सेवा आयोग में हिंदी दिवस के अवसर आयोजित प्रतियोगिता में मेरी कविता ताज महल और एक कब्र के लिये आदरणीय बालकवि बैरागी के कर कमलों से प्रथम पुरुष्कार पाना था. लेखन मेरे लिये केवल एक स्वान्तः सुखाय अभिव्यक्ति और आत्म-संतुष्टी का माध्यम है.

2010 में ब्लॉग जगत से परिचित हुआ और अपना पहला ब्लॉग ‘Kashish-My Poetry’ जुलाई 2010 में शुरू किया जिसे प्रबुद्ध पाठकों ने अपना स्नेह और प्रोत्साहन दिया. बच्चों से मुझे बहुत लगाव है क्यों कि उनका साथ जीवन को एक सात्विकता और निस्वार्थ प्रेम देता है. बच्चों के लिये लिख कर मन को बहुत सुकून मिलता है और एक अद्भुत शान्ति का अनुभव होता है, इसलिये 2011 में मैंने बच्चों के लिये ब्लॉग ‘बच्चों का कोना’ शुरू किया.

मेरे ब्लोग्स हैं Kashish-My Poetry और बच्चों का कोना

सोमवार, 11 जुलाई 2011

वो कहते हैं ' पिक्चर अभी बाकी है दोस्त' - रश्मि प्रभा की



क्या रह गया ? वह आवरण जो उस लड़की के चेहरे पर धूप छाँही का खेल खेलता है , या वह जो उसके पहनावे से बता देता है कि वह जो दिखा रही है , वैसी है नहीं या वह जो मेरे शब्दों में सर पटकता है !
तो .... बताओ बंधु , ख़ुशी और दर्द को पूरा शरीर मिलता कहाँ है ! जब तक ख़ुशी की आकृति बनाओ , दर्द आकर उसे अपाहिज बना देता है, जब तक दर्द को रेखांकित करो, ख़ुशी आकर उससे पंगे लेती है . बहुत मुश्किल है इन दोनों को हुबहू उतारना !
चलिए एक प्रयास और सही - छोटी सी वह मिन्नी १३ फरवरी १९५८ को डुमरा (सीतामढ़ी) में जन्मी . तब वहाँ बिजली नहीं थी, यानि बिजली का कनेक्शन नहीं - जन्म के साथ बिजली का आना - शायद तय था मेरे नाम का होना 'रश्मि'.
मुझसे बड़ी तीन बहनें , एक भईया यानि मैं चौथी बेटी थी .... पापा नहीं हुए थे मायूस ना अम्मा , पर लोगों ने धीरे से निराशा व्यक्त की थी - बेटी हुई फिर ! इससे जुडी एक कहानी सुनाती हूँ - एक दिन हम सब बैठे थे , मैं ६ ७ साल की थी , स्कूल में चपरासी थे - चुल्हाई भाई, हाँ हम उनको भाई कहते , शुरू से इसी तरह हम किसी काम करनेवाले को बुलाते थे . हाँ तो चुल्हाई भाई ने बताना शुरू किया - " जब मुन्नू बबुआ हुए तो साहेब के पास जैकारी बाबा आए , साहेब उनको पूरा सीतामढ़ी, डुमरा में मिठाई बांटने का पैसा दिए ..." मैं तन्मयता से सुन रही थी और अपनी बारी की प्रतीक्षा में थी .... बड़े उत्साह से मैंने पूछा - ' और चुल्हाई भाई , हम हुए तो ...' ओह , बहुत ही खराब ढंग से चुल्हाई भाई ने कहा , ' तुम्हारे आने की खबर सुनते सब दुःख से सो गए ' , मैं तो फफक के रो पड़ी ... शाम में जब पापा आए तो मैंने पूछा - ' पापा हम हुए तो सब सो गए थे दुःख से ?' पापा ने बड़े प्यार से कहा - ' ना बेटा , हम जाग रहे थे '.... मैं तो खुश हो गई, पर कुछ बाहरी बड़ों ने चिढाया - ' उनको चिंता से नींद कहाँ आनेवाली थी !' .... ये चिंतावाली बात उस उम्र में समझ में भी नहीं आई . हम ४ बहनें , एक भईया .... कभी कोई फर्क होते हमने नहीं देखा .
मैं तो यूँ भी पापा के शब्दों में रिकॉर्ड प्लेयर थी .... बोलती थी तो बस बोलती जाती थी, गाती थी तो बस.......कोई हमारे घर आता ,पापा अम्मा जब तक नहीं आते , मैं पूछती - 'गाना सुनेंगे ?' जवाब मिले बगैर चालू .... आधे अधूरे जितने गाने याद होते वो सुनाकर हहाहाहा उनका मन लगाते !

धीरे धीरे दीदी भईया लोगों की शादी हो गई .... १९७९ में भईया की शादी हुई . मेरे लिए पापा हमेशा कहते - 'इतनी धूमधाम से शादी होगी कि सब दाँतों तले ऊँगली दबायेंगे ' और मैं ! मुझे तो पलक झपकते पंख लगाकर उड़ने की आदत थी, तो कई उड़ानें भरती . पर पलक झपकते यथार्थ की धरती पर ...................पापा नहीं रहे ....(१९८०) आनन् फानन में बहुत सारे दृश्य बदल गए . जब दृश्य बदलते हैं तो बदलते ही चले जाते हैं , तो बदलते ही गए . .... शादी हुई, बच्चे मेरी ज़िन्दगी बने .......... और ज़िन्दगी को बनाने में मैंने कोई कसर नहीं छोड़ी तो फिर ज़िन्दगी ने भी मुझे कसकर गले लगाया और ... उसीका करिश्मा है कि आज मैं आपके सामने हूँ और मैं जो लिखूं , आप सबकी ऊँगली नहीं छोडती . मैं बनाना चाहती हूँ एक साहित्यिक संसार , जिसे लोग याद करें .... जैसे हम याद करते हैं - महादेवी, पन्त, बच्चन, निराला , टैगोर, प्रसाद, शरतचंद्र , अज्ञेय , दिनकर ............और इनके जैसे कई विलक्षण रचनाकारों को .

अब तो नहीं है न बाकी कुछ ?