मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

परिवर्तन की इक मंद हवा - रश्मि तारिका



यायावर मन रुकता कहाँ है !!! हर दिन नई प्रत्याशा में सृष्टि मंथन करने निकल पड़ता है . आँखें क्षितिज से आगे ढूंढती हैं उन निशानों को , जो मन की गहराईयों से उभरते हैं . झुरमुट से एक किरण ने बाहें पकड़ लीं और मैं आदतन किरणों के पृष्ठ पलटने लगी . सम्पूर्णता के क्रमिक प्रकाश के बीच - एक किरण सी रश्मि तारिका मुझे मिलीं http://www.catchmypost.com/Blogs/rashmi.html पर . 
सहज सोच की सहज अभिव्यक्ति,दृढ़ता के ओज से परिपूर्ण . बगावत,विरोध,परिवर्तन की मांग में भी एक सौम्यता ... सौम्यता ना हो तो विचारणीय नहीं रहते कथन ! 

आप इनको इनके ब्लॉग पर मेरे शब्दों के अनुरूप पा सकते हैं, उससे पहले उनके शब्दों में उन्हें जानिए - 


 अपने बारे में क्या कहूँ? मुझे जब रश्मि दी ने अपने दृष्टिकोण से खुद का परिचय लिखने को कहा तो समझ नहीं पाई! मुझे तो इतना मालूम था कि.... 

दिल  में  कुछ  हसरतों  को समेटे  जिए जा रहे  थे 
पलकों  में  कुछ  खवाब  सजाये  जिए  जा  रहे  थे
अपनी  ख्वाइशों का  भी  कुछ  अता पता  नहीं  था  
हम  खुद  में  सिमटे  ज़िन्दगी  जिए   जा  रहे  थे.
ख़ामोशी  से  बेरंग  हुई  उमंगों  को  दबाये  जा  रहे थे 
चाहतों  के  टूटने  पर अश्कों  को  खुद   पिये  जा  रहे  थे,
न  मालूम  था  ज़िन्दगी  को कैसे  देखना  अब  मयस्सर  होगा
हम  खुद  से  ही  पूछते  खुद  ही  जवाब  दिए  जा  रहे  थे ...
   
         एक सीधी साधी गृहणी , जो अपनी छोटी सी बगिया को अपने फ़र्ज़,कर्तव्यों से सींचती हुई खुश  रहती है और कभी खाने की तारीफ या परिवार वालों से दो शब्द प्यार के  भी सुनती है तो अपने आत्मसम्मान के लिए अपना इजाफा समझती है ! लेकिन अब ....
  ''हाँ ,आजकल आसमान में उड़ने लगी हूँ !जैसे किसी ने मेरे पंखो को उड़ान दे दी हो !बताऊँ क्यों? दरअसल ,अपने ख्यालों को जो ताबीर दी थी ,कुछ करने की चाह जो दिल में बरसों से ज़िम्मेवारियों और फर्जो की किसी गहरी खाई में दबी पड़ी थी अब उन्हें निकलने का वक़्त मिला तो कुछ अपनों और  दोस्तों की प्रेरणा रुपी रस्सी से निकाला तो जल रुपी भावों की मटकी भरी हुई पाई !उस मटकी से छलकते जल की शीतलता का एहसास ही जैसे प्यासे को उस जल की उपयोगिता जतलाता है वैसे ही मेरे भावों को भी शब्दों की उपयोगिता का आभास हुआ !तब से ये भावरूपी मटकी अब भरती जा रही है !अब शायद ये कभी खाली न हो !''  ये एहसास मुझे रश्मि दीदी ने करवाया कि अपनी लेखनी में से चंद शब्दों का लेख द्वारा  इज़हार उनकी पुस्तक के लिए करू !यह सुनकर तो मेरी ख़ुशी का पारावार न था !मानो बहुत कुछ पा लिया हो मैंने !
 कभी सोचती हूँ ,  अपने माता पिता और भाई बहनों में एक भोली छवि वाली लड़की ,गर्ल्स कॉलेज ,(हिसार हरियाणा ) में भी अपने आप में सिमटी रहने वाली ,अपने शर्मीले स्वाभाव के साथ ही  बी.ऐ पूरी होते ही  केवल इन्ही गुणों के साथ ससुराल '' सहारनपुर'' आ गई और खो गई अपने परिवार में !उस वक़्त देवरों ,ननदों में ही अपना दोस्त मिला  और प्यारे पति के साथ ज़िन्दगी बिताना ही मात्र एक पूर्णता का एहसास था और इसे बेटी और एक बेटे के जनम ने चार चाँद लगा दिया !मायके में पत्र पत्रिकाओं , कहानियां उपन्यास पढने का शौक था तो ससुराल में एक अखबार की भी कमी खलती !किसी को शौक नहीं था इन सब का ! मेरे शौक ज़िम्मेवारियों में दब गए और मुझे पता भी न चला !पर जैसे समय ने ही करवट ली और हम सहारनपुर (उ.प) से सूरत(गुजरात) में आ गए !उस वक़्त कम्पुटर का 'स्विफ्ट ज्योति ' का बेसिक कोर्स महिलाओं के लिए शुरू हुआ था जो मेरी भी  करने की चाह थी परन्तु  किन्ही कारन वश मुझे घर में मना कर दिया गया !अपना खाली समय उस वक़्त केवल  बच्चो की स्कूल मैगज़ीन में बच्चो के लिए कुछ  न कुछ लिख कर या उनके चार्ट्स बना कर अपने लिखने की हसरत पूरी कर लेती !धीरे धीरे ये एहसास हुआ कि मन बहुत कुछ लिखने को मचलता है !सोचती थी ,कि आखिर अपने भावों को शब्दों में पिरोने की ललक क्यों ? कॉलेज में हिंदी को (ऐच्छिक और वैकल्पिक) विषय चुनना और उस में उच्चतम नंबर लाना ही लिखने का कारण नहीं हो सकता !यद्यपि ये कारक सहयोगी अवश्य हो सकता है लेखनी में ! फिर ये लिखने की अनुभूति हुई कैसे ?... मन स्वत: ही इन 'भावों की जननी अपनी माँ '' की तरफ जाने लगा जिन्होंने अपनी लिखने की कला को ईश्वर भक्ति को समर्पित अपने स्वरचित और स्व लिखित भजनों द्वारा किया और मेरे मानस पटल पर भी अंकित कर दिया! उनका  ईश्वर प्रेम प्रतिदिन एक नया भजन बन कर दृश्यमान और गुंजायमान होता !कुछ ऐसे ...
                              '' धूल बनके तेरे चरणों से लिपटना अच्छा लगता है
                                 साँसों कि लय से तझे सिमरना  अच्छा लगता है !''
  घर के कार्यो में व्यस्त होने के बावजूद माँ ने अब तक खुद के ही २०० भजन बना लिए और एक बार १०८ भजनों की माला हमारे गुरुओं के चरणों में समर्पितकी  !उनकी इस सात्विक सोच का हमारे जीवन पर भी प्रभाव रहा !
                                 ''मेरी आँखें तलाशती रहती हैं हर इंसान में हर रूप तेरा
                                  सारी दुनिया 'रब' लगती है  यह हाल मेरा
                                  तेरा सिमरन कर लेती हैं मेरी साँसे चलते चलते
                                  मुझे प्रेम हो गया है तुझसे तेरे चर्चे करते करते ...!''
 उनका मानना था कि.मुश्किलों का घबराकर नहीं ,उनका समाधान ढूँढ़ कर निवारण करो और फिर भी कोई रास्ता न सूझे तो बजाये चिंता करने के वो वक़्त प्रभु सिमरन में लगा दो और उस मालिक पर छोड़ दो ''
 सच पूछिये तो इन दो वाक्यों का मुझ पर हमेशा प्रभाव रहा है !फलस्वरूप मैंने परिस्थितियों से हार न मानते हुए अपने व्यस्त पलों से कुछ पल अपने लिए निकाल कर अपनी लेखनी को देने प्रारम्भ किये !पहली बार अपने स्कूल के विद्यार्थियों और अध्यापिकाओं को समर्पित करते हुए एक कविता लिखी जब शादी के काफी वर्षो बाद अपने विद्यार्थी काल की सखी को अपने ही शहर में पाया तो उस ख़ुशी को भी शब्द दे दिए ,https://www.facebook.com/notes/rashmi-tarika/campus-school-ki-yaadein/207428335935860जो बेहद पसंद की  गई !सबने उत्साहित किया तो लिखती चली गई !अपने मन की  ख्वाइशों को http://www.catchmypost.com/kavita/2011-10-02-22-02-23.htmlशब्दों का जामा  पहनाया और उन्हें कविता में ढालकर ,''catchmypost ''पर प्रतियोगिता हेतु भेजा !उसका चयनित होना ही एक बड़ी उपलब्धि थी मेरे लिए ! लेकिन इसका श्रय मैं अपनी दीदी शील निगम जी को देती हूँ ! इस तरह मैं लेखनी के अथाह सागर में धीरे धीरे पांव जमाती हुई उतर पड़ी !ये एहसास हुआ कि.
बहुत गहरा सागर है यह जिसमें ज्ञान के सीप भरे पड़े हैं !मेरी लेखनी का रूख कहानियों ,कविताओं ,लेख,शाएरी और भजन की  तरफ भी है जैसे ....
                      '' कागज़ में जो लिखा नाम तेरा,वो लगे मुझे तस्वीर तेरी
                          वो पूजा मेरी हो जाए वो बन जाए तकदीर मेरी
                          यही प्रेम और भक्ति यही ,कुछ और मुझे नहीं आता
                          जब जहाँ भी तेरा ख्याल करू सर श्रधा से झुक जाता ...!''
                                                             कभी कभी लौंग ड्राइव पर जाते हुए ,बारिश की रिमझिम और चेहरे पर पड़ती बुँदे और हमसफ़र का साथ ,रास्ते में  कहीं गाडी रोक कर चाय की चुस्कियों का या गरम गरम भुट्टे का आनंद मेरे मन में एक तरंग पैदा कर देते हैं और इन्ही रूमानियत
भरे पलों में एक कविता का आगाज़ हो जाता है !
                                                                 कभी कभी ट्रेन  में बैठे बैठे अपने  मन पसंद लेखको की कृत्तियों को पड़ना एक सुखद एहसास देता है !
उतर जाती हूँ तब उनके भावों की गहराई के समुन्द्र में और कल्पनाशील होकर मंथन करने लगते हैं विचार उन पात्रों के साथ !
                                                                  कभी कभी छोटी छोटी बातें भी बड़ी ख़ुशी दे जाती हैं !कभी लिख कर खुद ही खुश हो जाया करती थी  पर आज इन छोटी खुशियों में परिवार का सहयोग और प्यार नज़र आता है जब पति मुझे ''मेरी लेखिका पत्नी ''कहकर पुकारते हैं और बच्चे ,''keep it mom '' कहकर उत्साह बढ़ाते हैं!यही मेरी  सबसे बड़ी उपलब्धि है !
                                                                 अंत में इतना ही कहूँगी कि २ बच्चो और पति के साथ अपने छोटे से परिवार के साथ खुशियों  के पल समेटते हुए कुछ पल निकालकर अपनी कलम से चंद शब्दों को कभी कविताओं ,कभी कहानिओं या लेखों में बाँध देती हूँ !भावनाओं को,अपने आसपास हो रही हर गतिविधि को अगर शब्दों में ढाल कर उचित तरीके से एक अच्छे सन्देश के साथ किसी भी आम इंसान तक पहुंचा सकू तो मुझे ख़ुशी होगी !इसी कोशिश के साथ अब तक अपनी कहानिया ,कवितायेँ और लेख आदि ई पत्रिका ..लेखनी,प्रवासी  दुनिया ,रचनाकार,म्हारा हरयाणा ,,मैथिलिप्रवाहिका पत्रिका जो छतीसगढ़ से  छपती है, में भेज चुकी हूँ और छपती रही हैं !अभी कुछ दिन पूर्व ही मेरे कहानी "आत्मसम्मान'' राष्ट्रीय समाचार पत्र ''rajasthan पत्रिका"में प्रकशित हुई जिसका लिंक है http://epaper.patrika.com/63713/Indore-Patrika/21-10-2012#page/37/2
बाकि सब रचनायें मेरे ब्लॉग http://www.catchmypost.com/rashmi/
पर आप पढ़ सकते हैं!
                                  मित्रो ,आप की प्रतिक्रिया ही मेरी अग्रिम रचना के लिए शुभकामना है !
                                                इसलिए इंतज़ार में ...
                                                                                     आपकी दोस्त ...रश्मि तरीका

बुधवार, 23 नवंबर 2011

मैं खुद कविता हूँ अंतहीन- नीलम प्रभा




नीलम प्रभा , नाम से क्या परिचय दूँ ..... इस नाम से मेरा भी संबंध है . जी , नीलम प्रभा मेरी बड़ी बहन हैं , ... पर इस रिश्ते से अलग वह एक अलाव है - जिसमें भावनाओं की तपिश है . कलम में उसकी सरस्वती भी हैं , दुर्गा भी हैं ... नहीं ज़रूरत उसे आकृति लिए पन्नों की , मुड़े तुड़े, बेतरतीबी से फटे हुए पन्नों को भी वह जीवंत बना देती है , जब उसमें से कृष्ण का बाल स्वरुप दिखता है इन शब्दों में -

" हैं कृष्ण किवाड़ों के पीछे
और छड़ी यशोदा के कर में
क्या करूँ हरि ये सोच रहे
फिर पड़ा हूँ माँ के चक्कर में ...."

सच तो ये है कि उसके पास ख्यालों के कई कमरे हैं ... तिल रखने की भी जगह नहीं , पर महीनों गुजर जाते हैं ... कमरे की सांकल खुलती ही नहीं ! उसे कहना पड़ता है - " खोलो तो द्वार , ख्याल सिड़ न जाएँ ..." बेतकल्लुफी से वह कहती है , " ख्याल नहीं सिड़ते... और फिर मैं तो अलाव हूँ , जहाँ सूरज ठहरता है खोयी गर्मी वापस पाने के लिए ..." ( ऐसा कुछ वह कहती तो नहीं , पर उसके तेवर यही कहते हैं !)
उसे आप कुछ भी लिखने को कहिये , वह यूँ लिखकर देती है - जैसे पहले से लिखा पड़ा था .
आप उसे खूबसूरत से खूबसूरत कॉपी दीजिये , पर फटे पन्नों पर ही वह आड़े तिरछे लिखती है ....... ऐसा करके शायद वह इन एहसासों को पुख्ता करती है कि " ज़िन्दगी कभी सीधे समतल रास्ते से मंजिल से नहीं मिलती ..."

यह परिचय जो आपके सामने है , वह भी बस पुरवा का एक झोंका है .... ' लो लिख दिया - खुश ?' मैं तो खुश हूँ ही , क्योंकि मैं उसे जानती हूँ , उसकी हर विधा से वाकिफ हूँ ....

अब उसकी कलम में आप देखिये - वह क्या है !


क्या कहकर परिचय दूँ अपना!
कि मैं पैदा हुई कहाँ और कहाँ पढ़ी ?
खड़ी थी कब ऊँचे शिखरों पर कब उतरी ?
कितनी किताबें हुईं प्रकाशित , मिले हैं कितने पुरस्कार ?
किन लम्हात ने मेरी कलम में शब्दों में पाया आकार ?

इस परिचय की मुझको है दरकार नहीं
ऐसा कुछ मेरे मैं को स्वीकार नहीं।

माँ से केवल नाम नहीं पाया मैंने
कलम भी मेरे हिस्से विरासत में आई
पिता से यह सुनकर मैं बड़ी हुई
’मेरी बेटी ने असाधारण प्रतिभा है पाई'

अपने सभी निज़ामों को खुसरो की तरह मैं प्रिय रही
इसीलिए गर्दिश में भी, जीवन की सुंदर कथा कही

जायदाद ’ग़र कलम की हाथ नहीं आती
तो मैं निश्चित बरसों पहले मर जाती

घर और घर के रिश्तों का हावी होना
तय था जो भी कुछ था सब भावी होना

बेशक! सब अपनों ने देखा भाला था
पर बिना शर्त जिन्होंने मुझे सँभाला था
वह मेरी कलम, कविता थी मेरी - ये क्या न बनीं मेरी खातिर!
आब बनीं, आहार बनीं, आधार बनीं, अधिकार बनीं,
हर मौके का इज़हार बनीं, मेरा पूरा परिवार बनीं
अब क्या कहना कि क्या है कलम और कविता क्या है मेरे लिए!

है कलम मेरी मेरा वजूद, मैं खुद कविता हूँ अंतहीन
ये दीन मेरा, मेरा यक़ीन
मेरे ख्वाबों की सरज़मीन
ये आफ़रीन, मैं आफ़रीन
हो इनसे अलग मैं कुछ भी नहीं, हो इनसे अलग मैं कुछ भी नहीं।

नीलम प्रभा
डी पी एस , patna

गुरुवार, 17 नवंबर 2011

निष्पक्ष साथ - संजीव तिवारी



२००७ में मैंने ब्लोगिंग शुरू की - हिंदी में लिखने का सुझाव दिया संजीव तिवारी जी ने , और इस तरह एक परिचय हुआ उनसे . मेरी
रचना जो हिंदी में ब्लॉग जगत के सामने आई ' अद्भुत शिक्षा ', उसे लोगों के सम्मुख लाने का भी प्रयास संजीव जी ने ही किया .... यूँ कहें ,
इस जगत में मेरी पहचान के सूत्रधार या गुरु संजीव तिवारी जी हुए .
उनकी कलम से जब मैंने उनका परिचय माँगा तो लेखन में सधे संजीव जी ने इस तरह अपना परिचय भेजा जैसे पसीने से तरबतर हो कोई कह रहा
हो - अब ये बहुत हुआ ' ! तो चलिए रूबरू हो लें -

रश्मि जी, प्रणाम!

संपूर्णता के फेर में जीवन परिचय पूर्ण ही नहीं कर पाया, एक संक्षिप्‍त परिचय भेज रहा हूं, आजकल ब्‍लॉग पढ़ना नहीं हो पा रहा है.
विलंब के लिए क्षमा सहित.

संजीव तिवारी

माता - स्‍व.श्रीमति शैल तिवारी

पिता - स्‍व.श्री आर.एस.तिवारी

शिक्षा - एम.काम., एलएल.बी.
संप्रति - वर्तमान में हिमालया ग्रुप, भिलाई में विधिक सलाहकार.

पता - ग्राम- खम्‍हरिया(सिमगा के पास), पोस्‍ट- रांका, तहसील- बेरला, जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ़.

लेखन प्रकाशन - विभिन्‍न पत्र पत्रिकाओं में 1993 से कविता, लेख, कहानी व कला-संस्‍कृति पर आधारित आलेख प्रकाशित.

संपादन : छत्‍तीसगढ़ी भाषा की आनलाईन पत्रिका गुरतुर गोठ डाट काम (http://gurturgoth.com) का विगत 2008 से प्रकाशन व संचालन.

ब्‍लाग लेखन - छत्‍तीसगढ पर केन्द्रित हिन्‍दी ब्‍लाग 'आरंभ' (www.aarambha.blogspot.com) का संचालन. हिन्‍दी इंटरनेटी व ब्‍लॉग तकनीक पर निरंतर लेखन. छत्‍तीसगढ़ के कला-साहित्‍य व संस्‍कृति को नेट प्‍लेटफार्म देकर सर्वसुलभ बनाने हेतु निरंतर प्रयासरत.

सम्‍मान/पुरस्‍कार - राष्‍ट्रभाषा अलंकरण, छत्‍तीसगढ़ राष्‍ट्र भाषा प्रचार समिति. वर्ष के सर्वश्रेष्‍ठ क्षेत्रीय लेखक, परिकल्‍पना सम्‍मान - 2010. रवि रतलामी जी के छत्‍तीसगढ़ी आपरेटिंग सिस्‍टम में सहयोग (इस आपरेटिंग सिस्‍टम को दक्षिण एशिया का प्रसिद्ध मंथन पुरस्‍कार प्राप्‍त हुआ)

वर्तमान पता - ए40, खण्‍डेलवाल कालोनी, दुर्ग, छत्‍तीसगढ़.

प्रोफाईल - गूगल # फेसबुक # ट्विटर

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संजीव तिवारी
देश भाषा-लोक भाषा www.gurturgoth.com
मेरी अभिव्‍यक्ति http://sanjeevatiwari.wordpress.com
जगमग छत्‍तीसगढ़ http://aarambha.blogspot.com
मेरा पेशा http://jrcounsel4u.blogspot.com
....... आप मुझे राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी में प्रतिउत्‍तर देंगे तो मुझे खुशी होगी.
उनकी आखिरी पंक्तियाँ हिंदी के प्रति उनकी निष्ठा को दर्शाती है . इसी हिंदी ने ही तो हम सबको जोड़ा है .

शनिवार, 17 सितंबर 2011

बौद्धिक सूर्य रथ की विनम्र सारथी - डॉ सुधा ओम ढींगरा



उपाधियाँ , सम्मान तो समय के साथ व्यक्ति को हासिल होते हैं , पर विनम्रता , शालीनता व्यक्ति को अजेय बनाती है ...बौद्धिक सूर्य रथ की विनम्र सारथी सुधा धींगरा जी का नाम तो सुना था , पर मीलों की दूरी को मिटाकर कोई बात नहीं हुई थी . मीलों की कौन कहे - यहाँ तो देश- विदेश की दूरी थी , पर अचानक एक दिन बिना टिकट , बिना किसी आकस्मिक खर्चे के , बिना किसी औपचारिकता के हम एक साहित्यिक मोड़ पर मिले ...
एक मेल मिला ,
नए कलेवर, नए रंग- रूप और नई साज- सज्जा के साथ
उत्तरी अमेरिका की लोकप्रिय त्रैमासिक पत्रिका 'हिन्दी चेतना' का
जुलाई -सितम्बर 2011अंक प्रकाशित हो गया है |

देखकर इस सज्जा को मैंने पूछा -
'मैं अपनी रचना भेज सकती हूँ इसके लिए ? '
और विनम्रता ने सुधा जी के लिबास में कहा -
'आदृत्या रश्मि जी,
यह पत्रिका आपकी है |'

और मैंने पत्रिका को अपना मान लिया .... सुधा जी को अपना मान लिया .... और अपनी कलम को सुधा जी के नाम की स्याही से भरा , जिन बातों से मैं अनभिज्ञ थी , उन बातों का आधार , उनकी कलम से उनका परिचय माँगा ... परिचय की माँग ने मोबाइल से हमारी आवाज़ की मुलाकात करवाई - फिर क्षणों में अपरिचय की रही सही दीवार भी गिर गई और अपनी कलम के माध्यम से सुधा जी सिर्फ मुझ तक नहीं आईं , बल्कि हम सब के पास आईं ..... तो मैं झीने परदे का आवरण हटती हूँ और मिलवाती हूँ हिंदी चेतना हिंदी प्रचारिणी सभा, कैनेडा की त्रैमासिक पत्रिका की संपादक: डॉ सुधा ओम ढींगरा जी से -

सुधा जी की कलम से
एक मुस्कराती आवाज़ कानों को तरंगित कर गई | आप सोच रहे होंगे कि फ़ोन पर मुस्कराती आवाज़ का कैसे पता चला | जी...फ़ोन पर आवाज़, आप के चेहरे के हाव -भाव, मूड सब बता देती है | बस संवेदनाओं के मंथन की आवश्कता है, अभ्यास सब सिखा देता है | आवाज़ रश्मि जी की थी और उन्होंने कहा कि अपना परिचय लिखूँ....सोच में पढ़ गई कि अभी तक तो मैं ही अपने बारे में कुछ नहीं जानती तो लिखूँ क्या ...पर रश्मि जी का मीठा, प्यारा अनुरोध है इसलिए स्वयं को ढूँढ़ना तो पड़ेगा | चलिए अतीत की तरफ लौटती हूँ जिसके पलों को यादों की अंगूठियों में हीरे, पन्ने, नीलम, मूंगे और पुखराज सा जड़ कर मैंने अपने हृदय की संदूकची में सुरक्षित रखा हुआ है | जब भी अतीत के गलियारे में झाँकने को मन करता है तो उन अंगूठियों को पहन लेती हूँ और सुखद अनुभूतियों से सराबोर हो जाती हूँ | लिखने के लिए उन अंगूठियों को पहन लिया है और ऐसा महसूस हो रहा है कि जिस धन को मैं वर्षों से अपना, सिर्फ अपना समझती थी, उसे आज आपके साथ ख़ुशी से साझा कर रही हूँ..
जालन्धर के एक साहित्यिक परिवार में जन्म हुआ | मम्मी -पापा और भाई तीनों डाक्टर थे | पोलिओ सर्वाइवल हूँ | अपंग होने से तो बच गई पर दाईं टाँग कमज़ोर रह गई इसलिए मेरा बचपन आम बच्चों की तरह नहीं बीता | तरह -तरह के तेलों की मसाज शरीर पर होती और काफ़ी व्ययाम करवाया जाता | बहुत दर्द होता और पलायन में परिकल्पना की दुनिया सजा लेती और कब कागज़ों पर कलम से शब्दों के चित्र उकेरने लगी याद नहीं | हाँ, काग़ज़, कलम और पुस्तकों से दोस्ती हो गई | यही दोस्त मुझे पीड़ादायक वर्षों से निकाल लाए | १२ वर्ष की माँ -पापा की मेहनत रंग लाई और मैं स्वस्थ्य किशोरी बनी | कत्थक, आकाशवाणी, रंगमंच और बाद में दूरदर्शन की कलाकार बनी | इस सब का श्रेय मैं अपने माँ -पा और अपने से दस साल बड़े भाई को देती हूँ जिन्होंने घर का वातावरण बहुत सकरात्मक रखा और मुझ में किसी तरह की कुण्ठा नहीं आने दी | माँ ने हमेशा एक बात सिखाई कि अपनी प्रतिभा को पहचान कर उसे अपनी ताकत और ढाल बनाओ | पापा ने हमेशा कुछ अलग हट कर करने के लिए प्रोत्साहित किया | कविता, कहानी, उपन्यास, इंटरव्यू, लेख एवं रिपोतार्ज सब लिखती रही और जीवन में जो कमी थी उसका एहसास नहीं हुआ | चाल से कभी कोई ढूँढ नहीं पाया कि मेरी टांगों में कोई अन्तर है | क़दमों को साधने का वर्षों से अभ्यास है और स्वयं कभी किसी को बताया नहीं | मुझे सहानुभूति नहीं चाहिए थी और 'बेचारी' शब्द नहीं सुनना था | पिछले कुछ वर्षों से पत्र -पत्रिकाओं के लिए इंटरव्यू देते समय तरह -तरह के प्रश्नों के उत्तर में बचपन का ज़िक्र स्वाभाविक रूप से आ जाता है अन्यथा उम्र भर किसी को पता न चलता | स्वाभिमानी हूँ, हर काम अपने दम पर करती हूँ | किस साहित्यिक परिवार से हूँ, उसका ज़िक्र भी कभी नहीं किया | कई पुस्तकें लिखने, 'हिन्दी चेतना' पत्रिका का संपादन करने और भारत की स्तरीय पत्र -पत्रिकाओं में छपने के उपरांत आज भी लगता है कि अभी तो कलम को माँज रही हूँ | साहित्य का समुद्र बहुत गहरा है, अभी तक घोघे- सिप्पियाँ ही हाथ लगे हैं, न जाने कितनी डुबकियाँ और लगानी पड़ेंगी हीरे जवाहरात ढूँढने के लिए और इस जन्म में ढूँढ भी पाऊँगी या नहीं, समय बताएगा |
लेखन के साथ -साथ एक सामाजिक एक्टिविस्ट भी हूँ | इसके बीज परिवार से मिले और मेरी मूल भूत प्रवृति ने इसे खाद -पानी दिया | माँ-बाप आज़ादी की लड़ाई में वर्षों जेलों में रहे | पापा वामपंथी विचारधारा के थे और माँ कट्टर कांग्रेसी | राजनीतिक विचारों में भिन्नता होते हुए भी समाज सेवा में वे दोनों एक थे | समाज की विद्रूपताओं और कुरीतियों के लिए जीवन की अंतिम साँस तक लड़ते रहे | विवाहोपरांत अमेरिका मेरी कर्म भूमि बना और भाषा, संस्कृति तथा महिलाओं के लिए अपने वैज्ञानिक पति डॉ. ओम ढींगरा के सहयोग से मैंने बहुत काम किया |
चिठ्ठा -लेखन को कम समय दे पाती हूँ | 'हिन्दी चेतना' के संपादन, नियमित स्तम्भ लेखन, कविता, कहानियाँ और लेख लिखने के उपरांत जो समय मिलता है, उसमें पढ़ती बहुत हूँ |
अब कुछ अंगूठियाँ अपनी संदूकची में वापिस रख रही हूँ | न जाने कब, कहाँ, किस मोड़ पर आपसे मुलाकात हो जाए तो ख़ाली हाथ न हूँ......

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बुधवार, 3 अगस्त 2011

जिजीविषा की झलक - महेश्वरी कनेरी




ब्लॉग http://kaneriabhivainjana.blogspot.com/ पर जिजीविषा की झलक यूँ मिली - ,"पैतीस साल अध्यापन कार्य करने के बाद ,२००९ में जब मैं सेवानिवृत हुई। मुझे लगा ,मेरा जीवन कहीं रुक सा गया है ,मैं जैसे गति हीन होगई हूँ। मेरे पास करने को कुछ नया नहीं था । मुझे लगता था मैं अपनी पहचान खोने लगी हूँ । यही सब सोच- सोच मुझे डिप्रेशन सा होने लगा था।
तभी अचानक एक दिन गुगुल सर्च करते- करते एक हिन्दी ब्लॉग में जा पहुँची । मुझे मालूम था कि कुछ लोग ब्लॉग लिखा करते हैं, पर इस के बारे में कोई अधिक जानकारी नहीं थी । मुझे लगा… बस मुझे रास्ता मिल गया मुझे मेरी मंजिल मिल गई ।
फिर डरते-डरते मैंने दिनांक ४.अप्रेल २०११ को अपना एक ब्लॉग खोल ही दिया।सब् से पहले माँ सरस्वती का एक सुन्दर सा चित्र लगा कर मैंने प्रथम पोस्ट का श्रीगणेश किया ।उसी दिन फिर एक लघु कविता “ ऋतुराजबसन्त” की दूसरी पोस्ट भी पब्लिश कर दी। ब्लॉग का ये अनुभव मेरे लिए जितना रोमांचकारी था उतना ही अनजाना और अनभिज्ञ भी ।"
खुद को वही दिशा दे पाते हैं , जिनमें हार मानने की प्रवृति नहीं होती .... कोशिशें उनकी ही रंग लाती हैं . प्रतिभाओं की कमी नहीं , पर खुद पे भरोसा नहीं .... महेश्वरी जी में प्रतिभाएं भी मैंने पायीं और जीवन को फिर से एक पहचान देने की उत्कंठा भी देखी , प्रकृति से खुद को जोड़ते हुए उन्होंने मन को पंख दिए - ' रे मन, मुझे ले चल उस पार
जहाँ स्वच्छंद प्रकृति राग सुनाए '
अपनी कलम में उन्होंने अपनी पहचान को गहन मायने दिए इन शब्दों में - ' मैं नारी हूं। नारी ह्रदय की वेदना और पीडा़ मुझ में भी है। लेकिन नारी होने पर मुझे गर्व है। मैं नारी मन की वेदना को अपने कलम में ढाल कर उस एहसास को एक नई सोच व नई दिशा देना चह्ती हूं । यही मेरा सपना है। शुरुवात नई है, शौक पुराना है मंजिल दूर है. रास्ता अंजाना है.”

मुझे हमेशा ऐसे लोगों ने प्रभावित किया और मैंने बेझिझक उन्हें अपने ख़ास कैनवस पर चित्रित किया ...... महेश्वरी जी ने मेरे आगे आप तक पहुँचने के लिए कुछ इस तरह अपने को परिचय का परिधान दिया -

रश्मि प्रभा जी को बहुत-बहुत धन्यवाद उनके अनुकंपा से मै आप सब के सामने अपना ह्रदय खोल रही हूँ………………

मै महेश्वरी कनेरी …एक साधारण परिवार में जन्मी चार बहनों और एक भाई में सबसे बडी़ हूँ । घर में बडी़ होने के कारण भाई बहनों के प्रति मेरी हमेशा से जिम्मेदारियाँ रही है। मेरे पिता शिक्षा और अच्छे संस्कार पर बहुत ज़ोर दिया करते थे ।अपनी हैसियत के अनुसार हम सभी को उन्होंने अच्छी शिक्षा और अच्छे संस्कार दिए । मेरे पिता को मुझ से बहुत आशाएँ और उम्मीदें थीं मुझे हमेशा कहा करते थे “ बेटा ! तू मेरी बेटी नहीं बेटा है “

बचपन से ही मैं बहुत ही संकोची तथा अन्तर्मुखी रही। अपनी मन की बात किसी से कहते घबराती ।बस मन में उठे हर भाव को काग़ज में उतारना अच्छा लगता था। लिखने का सिलसिला वही से शुरु हुआ ।बाबुल के आँगन में भाई बहनों के बीच कब और कैसे बचपन बीत गया और मैं विवाह के बंधन में भी बँध गई पता ही नहीं चला ।

बचपन की एक घटना याद आरही है- जब मैं आठवी पास कर नौवी कक्षा में पहुँची तो मैं संगीत विषय लेना चाहती थी, क्यों कि मुझे संगीत से बहुत लगाव था । लेकिन पता नही क्यों अध्यापिका ने मुझे संगीत लेने ही नही दिया । औरों के मुकाबले मैं इतना बुरा भी नही गाती थी । ये बात मेरे मन को आहत कर गई ।मैंने उसी वक्त फैसला ले लिया कि मैं अपनी बेटी को संगीत जरुर सिखाऊँगी । विधि का विधान देखो आज मेरी बेटी रेडियो आर्टिस्ट होने के साथ- साथ हैदराबाद की जानी मानी गज़ल गायिकाओ मे से एक है ।कभी-कभी दुखी और अबोध मन से लिया, मासूम सा फैसला ईश्वर पूरा कर ही देते हैं।


सन१९७४ में अध्यापि्का के रुप में जब मेरी नियुक्ति केन्द्रीय विधालय में हुई मुझे लगा जैसे आज मेरे पंखो को परवाज़ मिल् गया । छोटे-छोटे बच्चों के बीच रह कर उनके मनोंभाव को समझते हुए उनके रुचि के अनुरुप कुछ गीत और काविताएं लिखने लगी “आओ मिलकर गायें गीत अनेक “ सन १९९४ में ये पुस्तक प्रकाशित हुई । सन१९९६ में गीत नाटिका का एक ओडियो कैसेट निकाला जिसमें छह गीतों भरी कहनियां हैं. सन १९९४ मे मुझे प्रोत्साहन पुरस्कार तथा २००० में राष्ट्र्पति पुरस्कार से सम्मानित कियागया । सन २००९ में सेवानिवृति के बाद ईश्वर की कृपा और आप लोगों की अनुकंपा से मैं फिर से लिखने का प्रयास कर रही हूं ।

जुनून और कुछ् कर गुजरने की चाहत मनुष्य को हमेशा आगे बढ़ाता है। सच्चे मन से किया जाने वाले हर कार्य में ईश्वर का निवास होता है,येसा मेरा विश्वास है । मै सफल हूँ या नहीं लेकिन सन्तुष्ट जरूर हूँ ।

घबराते- घबराते गिरते पड़्ते हम चले डरते-डरते

सोचते थे मंजिल मिलेगी भी या नही

तभी हौंसले ने अंगुली थामी ,विश्वास ने सहारा दिया

और हम चल पड़े, चलते रहे और चलते रहेंगे

क्योंकि आप सब का विश्वास हमारे साथ है

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पंख होने से क्या होता है,हौसलो में उड़ान होती है

जीत उसकी होती है,जिसके सपनों में जान होती है


सच है... इस सच्चाई की जीती जागती तस्वीर है ये -


राष्ट्रपति पुरस्कार





मंगलवार, 2 अगस्त 2011

कभी झरना , कभी बादल - सोनल रस्तोगी



सोनल रस्तोगी कहते कुछ सरसराते शब्द मेरा हाथ पकड़ लेते हैं - 'जब भी खुद को शायरा,लेखिका और बुद्धिजीवी समझती हूँ नींद खुल जाती है' और मैं हंसकर कहती हूँ -' और तब तुम कलम उठा लेती हो, है न !'
कभी झरना , कभी बादल , कभी बारिश की बूंदें , कभी प्यार का अलाव .... क्या नहीं लगती सोनल . चेहरे पर एक शरारत जो कहती है - ' ज़िन्दगी तो यूँ हीं बड़ी गंभीर हुआ करती है , अभी ज़रा मुस्कुरा लेते है ... बड़ी फुर्सत से धूप निकली है ! '
इनका ब्लॉग है - http://sonal-rastogi.blogspot.com/ जहाँ इनकी सादगी, शरारत , और गंभीरता को आसानी से समझा जा सकता है . बिना मिले समझने का इससे बेहतर जरिया और क्या होगा , और मेरी कलम से अपनी कलम की आवाज़ मिलाकर तो इस जानकारी को और सुगम बना दिया है .... कहने को तो है यूँ बहुत सी बातें , पर अभी इतना ही सही ....

चिट सामने है सोनल जी की फिर देर क्यूँ -
अपने परिचय की चिट धीरे से आप तक बढ़ा रही हूँ बिलकुल वैसे ही जसे कोई चुपके से ख़त दरवाजे के नीचे से बढ़ा जाता है , फर्रुखाबाद में जन्मी परिवार की पहली बेटी लाड ढेर सारा ,ढेर सारे रिश्तों से घिरी,बेहद बातूनी ,हद दर्जे की शैतान माँ कहती है जब तक पढ़ना नहीं आया था तबतक ,फिर किताबों में ऐसी डूबी की आज तक नशा कायम है ,लिखने की शुरुवात स्कूल में लोकगीत की तुकबन्दिया भिडाने से शुरू हुई ,फिर गांधी जयंती ,रक्तदान ,नेत्रदान ,प्रदूषण हर सामाजिक विषय पर लिखा नाटक ,एकांकी सब लिखवाया मेरी अध्यापिकाओ ने और माँ सरस्वती के आशीष नें ही आम से ख़ास महसूस करवाया , इसी दौर में बालहंस में अपनी कहानी परिचय के साथ भेजी जो बाल प्रतिभा विशेषांक में छपी,फिर क्या था खाली लिफाफे और टिकेट मिल गए खूब लिखो और भेजो मनीआर्डर की रसीदे आज तक सहेजी है अपर किताबें ना सहेज पाई ,अनमोल है ना .....
हर बार प्रोत्साहन मिला,वाद विवाद प्रतियोगिता ,नृत्य हर विधा का आनंद लिया ,खेलों में फिसड्डी थी हूँ और रहूंगी ,समय के साथ डायरी भरती गई 12th तक हर विषय पर लिखा ..लोगों के प्रेम पत्रों के लिए शायरी भी लिखी,समय बदला परिस्थितिया बदली पढ़ाई के बोझ के तले कविता कहानियाँ सब खो गई बहित बड़ा शून्य आ गया लेखन में,आगे बढना था ढेर सारी पढ़ाई, होने वाले जीवन साथी से जब मिली तो उनका मन भी एक कविता ने चुराया
"आज दिल ने चाहा बहुत अपना भी हमसफ़र होता
जिससे कहते हालात दिल के जिसके काँधे पर अपना सर होता ..... (बाकी फिर कभी )"

भावनाएं उमड़ी और दिल से फिर फूट पड़ी कविता कहानिया, फर्रुखाबाद ..लखनऊ...मेरठ ...गुडगाँव . शहर बड़े होते गए और मैं इनके साथ बदलती गई, नया रिश्ता , नया शहर और ढेर सारा आत्मविश्वास और सहयोग. बस एक देसीपन आज तक वैसा ही है .. . ब्लॉग्गिंग से परिचय मेरे देवर डा. अंकुर ने करवाया http://gubaar-e-dil.blogspot.com/ तब से जो पंख लगे आज तक उड़ रही हूँ, एक दिन रविश जी ने मेरे ब्लॉग को अपने कॉलम में जगह क्या दी तब से मेरी दुनिया बहुत बड़ी हो गई और प्यारी भी , रचनाओ को पाठक मिले और मुझे पढने के लिए ढेर सारी सामग्री, सच में यहाँ मैं सिर्फ मैं हूँ बेहद सुकून मिलता है.
अभी तो घुटुनो के बल हूँ ,धीरे-धीरे चलूंगी पर दौड़ना नहीं है मुझे, ज़िन्दगी स्लो मोशन में ही भाती है सब देखना है मुझे .
क्या पता किसी दिन ब्लॉग से अखबार और अखबार से किताब की शक्ल ले लूँ ...

शनिवार, 30 जुलाई 2011

एक गहरा वजूद - असीमा भट्ट



ब्लॉग की दुनिया बहुत बड़ी है ... हर बार घूमते हुए यह गीत होठों पर काँपता है , 'इतना बड़ा है ये दुनिया का मेला , कोई कहीं पे ज़रूर है तेरा ' शब्दों का रिश्ता बनाने के लिए मानस के रश्मि ज्वलित जल से
मैं शब्द शब्द में तैरती भावनाओं का अभिषेक करती हूँ , तन्मयता से मोती चुनती हूँ - हर किसी का अपना एक गहरा वजूद है , अपना अकेलापन और अकेलेपन में निखरी ज़िन्दगी है . उड़ान में कभी मैं दस्तक देती हूँ , कभी सामनेवाला - फिर कहते सुनते पढ़ते जीवन के पार छुपे वे तार दिखने लगते हैं , जिन पर उंगलिया रखो तो वे कभी एथेंस का सत्यार्थी के गीत गाती है, कभी बुद्ध, कभी यशोधरा , कभी कोलंबस, कभी आम्रपाली , कभी नीर भरी दुःख की बदली .... अनंत परिभाषाएं , अनंत अनुकरणीय कदम !
पौ फटते अपनी दिनचर्या के बीच मैं एक अनंत यात्रा करती हूँ , और किसी दहलीज पर रुक जाती हूँ . फिर उस दहलीज से सोंधे एहसास , सोंधे आंसू, सोंधे सोंधे सपनों की खुशबू और हौसले ले आती हूँ ताकि जब कभी साँसें लड़खड़ाने लगें तो किसी पन्ने को आप अपना आदर्श बना लें !
कुछ ऐसा ही एक आधार हैं असीमा भट्ट , जिनकी दहलीज से मैंने उनकी पहचान को उनके शब्दों में ढूंढा - " मैं कौन हूं ? इस सवाल की तलाश में तो बड़े-बड़े भटकते फिरे हैं, फिर चाहे वो बुल्लेशाह हों-“बुल्ला कि जाना मैं कौन..” या गालिब हों- “डुबोया मुझको होने ने, ना होता मैं तो क्या होता..”, सो इसी तलाश-ओ-ताज्जुस में खो गई हूं मैं- “जो मैं हूं तो क्या हूं, जो नहीं हूं तो क्या हूं मैं...” मुझे सचमुच नहीं पता कि मैं क्या हूं ! बड़ी शिद्दत से यह जानने की कोशिश कर रही हूं. कौन जाने, कभी जान भी पाउं या नहीं ! वैसे कभी-कभी लगता है मैं मीर, ग़ालिब और फैज की माशूका हूं तो कभी लगता है कि निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो की सुहागन हूं....हो सकता कि आपको ये लगे कि पागल हूं मैं. अपने होश में नहीं हूं. लेकिन सच कहूं ? मुझे ये पगली शब्द बहुत पसंद है…कुछ कुछ दीवानी सी. वो कहते हैं न- “तुने दीवाना बनाया तो मैं दीवाना बना, अब मुझे होश की दुनिया में तमाशा न बना…”

और स्वतः मेरी हथेलियाँ उनके मन के दरवाज़े पर दस्तकें देने को आतुर हो गईं और बड़ी मीठी सी मुस्कान लिए द्वार खुले , ----- जिनकी मासूमियत से हवाएं अपना रूख बदलती हैं , वे अनजाने उन्हें जिद्दी बना जाती हैं और यही जिद्द खुद के साथ होड़ लेती हवाओं को अपना हमसफ़र बना लेती हैं . नहीं इंतज़ार होता उन्हें किसी से सुनने का ' यू आर द बेस्ट ' , क्योंकि विपरीत परिस्थितियाँ उनका स्वर बन जाती हैं - ' आय एम द बेस्ट !'

अब आगे असीमा जी के साथ बढ़ते हैं . समय की अफरातफरी और खुली ज़िन्दगी के संजोये पलों में असीमा जी समझ नहीं पा रही थीं कि क्या लिखा जाए , फिर मैंने उनके पास अपने प्रश्न रख दिए जिनके जवाब उनका परिचय बन गए


सबसे पहले धन्यवाद मुझ नाचीज को इतनी इज्ज़त देने के लिए .तो सुनिए ........

मेरा बचपन फ़ुल ऑफ़ लाइफ था . नाना जी ज़मींदार थे , दादा जी बहुत ही प्रतिष्ठित डॉक्टर और सिनेमा हॉल के मालिक थे . और पिता जी BHU (बनारस हिन्दू युनिवेर्सिटी ) के स्टुडेंट थे जो बाद में स्टुडेंट मूवमेंट में शामिल हो गए . मैं तीन बहनों और एक भाई में सबसे बड़ी थी . जब मैं छोटी थी पिता जी ने घर छोड़ दिया . कम्युनिस्ट पार्टी के होल टाईमर हो गए . माँ को बहुत दुःख हुआ था . सदमे में वो मुझे मारती थीं क्योंकि मैं पिता की कट्टर पक्षधर (पिता जी को बहुत प्यार और रेस्पेक्ट देती थी ) . इसलिए माँ को बुरा लगता था और अपना गुस्सा मुझपर उतारती थीं . और शायद इसलिए भी कि शायद मैं बचपन में बहुत चंचल थी . बहुत शैतानियाँ करती थी . जो कि मेरा एक लड़की होने के नाते माँ को गवारा नहीं था . बस खूब पिटाई होती थी और मैं फिर भी शैतानियाँ करती थीं . शायद यही वो वजह है कि मैं जिद्दी हो गई .

अपने पिता के बारे में कहूँ तो हमेशा मुझे उनकी बात अच्छी ही लगी . तब भी अच्छा लगता था , कभी बुरा नहीं लगा . कभी उपेक्षित नहीं महसूस किया . हमेशा प्राउड फील होता था . मुझे बचपन का एक वाकया याद आता है . एक बार मुझे स्कूल में कल्चरल प्रोग्राम में फर्स्ट आने के लिए पुरस्कार मिला था . पुरस्कार वहाँ के D.M. दे रहे थे , उन्होंने पुरस्कार देते हुए मुझसे पूछा -"तुम्हारे पापा का नाम क्या है ? मैंने कहा - श्री सुरेश भट्ट , वो बोले - अच्छा , तो तुम 'भट्ट जी ' की बेटी हो , वाह "
मैंने यह बात घर आकर पिता जी को बताया कि - DM ने यह कहा कि आप 'भट्ट जी ' की बेटी हो - वाह !'
पापा बोले - मुझे उस दिन ख़ुशी होगी जब लोग कहेंगे कि मुझसे - ' क्रांति भट्ट (वो मुझे क्रांति ही बुलाते थे ) के पिता हो .वाह !'

मैंने अपनी जिंदगी को नहीं ढाला, बस खुद ब खुद ढलता चला गया . "अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं , रुख हवाओं का जिधर का है , उधर के हम हैं .

मुझे महात्मा बुद्ध की तरह दिखाई देते हैं अपने पापा (बुद्ध की तरह ही वे हमें बचपन में छोड़ कर समाज सेवा के लिए चले गए थे ) , बातें भी उन्हीं की तरह करते . मुझे याद है , जब मैं बच्ची थी मेरे पापा नक्सलाईट थे , वो कहा करते थे - "हम नक्सलाईट लोग हैं , गोली पहले चलाते हैं सोचते बाद में हैं ." आज वही इन्सान कहते हैं - "हिंसा से कुछ भी हासिल नहीं होगा . हिंसा किसी समस्या का हल नहीं ."

मैं फिल्म में कहाँ आना चाहती थी . बहुत ही ओर्थोडोक्स फैमिली में थी , वहाँ ऐसी बातें सोचना भी गुनाह था . मैं पता नहीं कैसे आ गई . आज भी यह एक पहेली सा लगता है कि मैं कैसे यहाँ तक आ गई ! Its all destiny

जिंदगी मेरे लिए एक इम्तहान है . मैं रोज़ एक प्रश्न -पत्र हल करती हूँ . रोज़ इम्तहान देती हूँ और हाँ रोज़ पास होती हूँ

लेखन से भी कैसे जुड़ी , यह भी ठीक से याद नहीं . शायद पापा की किताबें पढ़ने की आदत मेरे अन्दर आई . शायद इसीलिए थोड़ा बहुत लिख लेती थी . फिर जब मैं पटना आई तो सर्वाइवल के लिए मुझे न्यूज़ पेपर में काम करना पड़ा . और ऐसे लिखना पेशा बन गया ...

जिंदगी से मुझे कोई शिकायत - नहीं . कुछ भी नहीं . I love it. My life is beautifull.

बहुत कुछ खोया है .... बहुत कुछ पाया है . अब तो बात जिद्द पे आ गई है - अब तो जिंदगी से सूद समेत वापस लेना है और उसे भी देना पड़ेगा .
आखिर में इतना ही कहूँगी - मुश्किलें पड़ीं मुझ पे इतनी कि ज़िन्दगी आसान हो गई ....