गुरुवार, 16 जून 2011

ब्लॉग का शहंशाह (समीर लाल )




समीर लाल जी से मेरी मुलाकात 2007 में हुई.... जबलपुर से कनाडा ? अरे नहीं ... इन्टरनेट पर हुई यह पहचान , जब मैंने अपना ब्लॉग बनाया .
ब्लॉग बनाते मैं इधर से उधर चहलकदमी करने लगी , और देखा उड़न तश्तरी यानि समीर जी का ब्लॉग , टिप्पणियों की संख्या वाकई सर्रर्र सर्रर्र जबलपुर से कनाडा के चक्कर
लगा रही थी और मेरी आँखें स्तब्ध - ' प्रभु , ये कौन हैं !'
एक बार पढ़ा , दो बार पढ़ा और पढ़ने लगी , और लिंक कॉपीपेस्ट करके उनको अपने लोगों तक पहुंचाने लगी .
समीर जी ने अपनी लेखनी में जीवन के हर रंगों को उभारा ... क्या नहीं पाया मैंने वहाँ ! घर , परिवार, नाते रिश्ते, दोस्त , हास्य , सुझाव, सहनशीलता ....सबकुछ ! ब्लॉग की दुनिया
हो या ब्लॉगर कहे जानेवाले मित्र या उनका पड़ोस या उनकी धर्मपत्नी या उनके बेटे बहू .... उनको पढ़ते हुए मैंने सबको जाना और एक बहुत अच्छी बात सीखी उनसे - कि निकटता में
भी एक दूरी रखो , जब वैचारिक मतभेद आग उगले तो ख़ामोशी के छींटे ही उपयोगी हैं .

समीर लाल का जन्म २९ जुलाई, १९६३ को रतलाम म.प्र. में हुआ. विश्व विद्यालय तक की शिक्षा जबलपुर म.प्र से प्राप्त कर ये ४ साल बम्बई में रहे और चार्टड एकाउन्टेन्ट बन कर पुनः जबलपुर में १९९९ तक सी ए की प्रेक्टिस की. सन १९९९ में ये कनाडा आ गये और तब से कनाडा के टोरंटो नामक शहर में निवास करते है. ये कनाडा की सबसे बड़ी बैक के तकनीकी सलाहकार हैं एवं इनके नियमित तकनीकी आलेख प्रकाशित होते रहते हैं. लगातार जमाने के साथ कदम ताल मिला कर चलने वाले समीर लाल कनाडा आने के बाद लगभग ११ शेयर मार्केट के, सी एम ए अमेरीका से, पी एम पी अमेरीका से, माईक्रो सॉफ्ट से एक्सल एक्सपर्ट आदि कोर्स कर चुके हैं और अभी भी कुछ न कुछ नया सीखे जाने की ललक नये कोर्स करवाती रहती है. पेशे के अतिरिक्त साहित्य के पठन और लेखन की ओर रुझान है. सन २००५ से नियमित लिख रहे हैं. कविता, गज़ल, व्यंग्य, कहानी, लघु कथा आदि अनेकों विधाओं में अपनी शाख रखते हैं एवं कवि सम्मेलनों के मंच का एक जाना पहचाना नाम हैं. भारत के अलावा कनाडा में टोरंटो, मांट्रियल, ऑटवा और अमेरीका में बफेलो, वाशिंग्टन, डेलस और आस्टीन शहरों में मंच से कई बार अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं और श्रोताओं द्वारा बहुत सराहे गये.
ये कनाडा से प्रकाशित लोकप्रिय त्रैमासिक पत्रिका 'हिन्दी चेतना' के नियमित व्यंग्यकार हैं एवं दिल्ली से व्यंग्य यात्रा, भोपाल से गर्भनाल, यू ए ई से अनुभूति, अभिव्यक्ति, कनाडा से साहित्य कुँज, जोधपुर से हिन्दी नेस्ट, आस्ट्रेलिया से हिन्दी गौरव एवं कनाडा एवं भारत के विभिन्न समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होते रहे हैं.
इनका ब्लॉग "उड़नतश्तरी" http://udantashtari.blogspot.com/ हिन्दी ब्लॉगजगत का विश्व में सर्वाधिक लोकप्रिय नाम है एवं इनके प्रशंसकों की संख्या का अनुमान मात्र उनके ब्लॉग पर आई टिप्पणियों को देखकर लगाया जा सकता है.
इनका लोकप्रिय काव्य संग्रह 'बिखरे मोती'' वर्ष २००९ में शिवना प्रकाशन, सिहोर के द्वारा प्रकाशित किया गया एवं शिवना प्रकाशन द्वारा ही वर्ष २०११ में एक उपन्यासिका 'देख लूँ तो चलूँ' प्रकाशित की गई. कथा संग्रह 'द साईड मिरर' (हिन्दी कथाओं का संग्रह) प्रकाशन में है .
प्रकाशित पुस्तकें:
बिखरे मोती -सन २००९ (काव्य संग्रह)
देख लूँ तो चलूँ- सन २०११ (उपन्यासिका)
आपकी कविता 'मेरी माँ लुटेरी थी' http://udantashtari.blogspot.com/2009/04/blog-post_08.html और व्यंग्य 'अगले जन्म मोहे बेटवा न कीजो' http://udantashtari.blogspot.com/2008/08/blog-post_08.html लोकप्रियता के चरम पर रहीं और विभिन्न माध्यमों से प्रकाशित हुई.

२००६ में तरकश सम्मान, सर्वश्रेष्ट उदीयमान ब्लॉगर, इन्डी ब्लॉगर सम्मान, विश्व का सर्वाधिक लोकप्रिय हिन्दी ब्लॉग, वाशिंगटन हिन्दी समिती द्वारा साहित्य गौरव सम्मान सन २००९, शिवना सारस्वत सम्मान, २००९, संस्कारधानी जबलपुर में सव्यसाची प्रमिला देवी बिल्लोरे स्मृति 2010 'हिन्दी के श्रेष्ठ ब्लागर' सम्मान, परिकल्‍पना समूह द्वारा ब्लॉगोत्सव २०१० में उत्तरांचल के मुख्य मंत्री के कर कमलों से और मान. अशोक चक्रधर की अध्यक्षता में विश्व के श्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉगर हेतु 'सारस्वत सम्मान' एवं अनेकों सम्मानों से नवाजा जा चुका है.

समीर लाल का ईमेल पता है: sameer.lal@gmail.com
उनके शब्दों में -
नौ बरस की उम्र तक बचपन बीता राजस्थान में. पिता जी डैम पर इन्जी्नियर थे रावतभाटा और फिर कोटाडैम में. उनके ड्राइवर के ठाट बाट, गाड़ी चलाना और यूनिफार्म देखकर एक लम्बे समय तक बड़ा होकर ड्राइवर बनने के सपने के साथ जीता रहा. फिर ट्रांसफर होकर एक साल भिलाई, छत्तीसगढ़ में पढ़ते हुए मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में आ बसे. जीवन का एक लम्बा महत्वपूर्ण समय जबलपुर से जुड़ा तो जबलपुरिया ही होकर रह गये. जाने कब सीए बनने की ठानी और बी काम करने लगे. सरकारी नौकरी वाले इन्जीनियरों के कुल का बालक जब कामर्स पढ़ने निकला, तो सबके मन में सुनिश्चित हो गया कि हो न हो, एक दिन क्लर्क ही बनेगा यह.

खैर, बन तो गये सीए बम्बई जाकर मगर जबलपुर पुकारता रहा. तब जबलपुर लौट अपनी खुद की फर्म स्थापित कर खूब धूम धड़ाके से प्रेक्टिस की. राजनीति में टांग फंसाई काफी गहरे तक और एक दिन दोनों बेटों और पत्नी को लिए कनाडा चले आये.

एक नये जीवन की शुरुवात. सब बढ़िया जम गया. बेटे वंश की पुरानी परम्परा का पालन करते हुए इन्जीनियर बन अपने अपने मुकाम पर अच्छा करने लगे और हम देश कर धरती से दूर गहराते एकाकीपन से जूझते रहे. ब्लॉगिंग सहारा बन कर उभरी. खूब दोस्त मिले. चाहने वाले जुड़े. इतना लिखना, पढ़ना और मित्रता का दायरा बढ़ गया कि आज एकांत की तलाश में भटकते हैं, और नसीब नहीं होता.

कभी किसी को मुकम्‍मल जहां नहीं मिलता
कभी ज़मीं तो कभी आसमां नहीं मिलता।।

आज तक का बस इतना सा सफर है. कुछ उपलब्धियाँ है, तो कुछ नाकामियां भी. खुशहाल परिवार बढ़ रहा है. जिन्दगी से कोई शिकायत नहीं.

बुधवार, 15 जून 2011

समीक्षा कहूँ या प्यार या सम्मान ...(सरस्वती प्रसाद )



मेरी कलम और मेरी माँ , समीक्षा कहूँ या प्यार या सम्मान .... बिना उन्हें कलम में पिरोये मेरी साहित्यिक यात्रा अधूरी है . भावनाओं का धागा हमारे पैरों में
बाँधने का अलौकिक उत्तरदायित्व उन्होंने पूरा किया . 'पन्त की बेटी' का मान लेकर मुझे रश्मि बना दिया , नामकरण का तोहफा कवि पन्त के हाथों दिलवाकर .
मेरी अम्मा - 11 वर्ष की उम्र में दुल्हन बन गईं , 6 ठी तक की पढ़ाई हुई थी उस वक़्त तक ...... हम सारे भाई-बहनों के हो जाने के बाद अम्मा
ने पढ़ने की इच्छा जताई . प्रकृति कवि पन्त की मानस पुत्री का सम्मान यूँ हीं नहीं मिला उनको . प्रकृति के हर कणों से उनकी बातें होती थीं और कुछ पल चुराकर वे लिखतीं
- 'कौन झंकृत करके मन के तार मुझसे बोलता है
मैं तुम्हारा हूँ तुम्हारा हूँ तुम्हारा हूँ ............'
ऊँचे आकाश में ऊँची उड़ान भरते पक्षियों से पूछतीं -
'जा रहा किस ओर तू कुछ बोल पंछी
किस पिपासा को लिए ओ बावरा
दर्द जब इन्सान हर पाता नहीं
क्या हरेंगे फिर ये चंचल धवल बादल !'
नाम के अनुरूप वे खुद रहीं , साथ ही - हमें , हमारे बच्चों को सब दिया ! हमने कितना लिया , ना लिया ... ये हमारी चाह या हमारी किस्मत !
उम्र की थकान होने के बावजूद उन्होंने नाविक होने
के कर्तव्य को नज़रअंदाज नहीं किया है , आज भी वे शब्दों की पतवार से भावनाओं की नाव को एक दिशा देती हैं .

सरस्वती प्रसाद
जन्म - आरा
शिक्षा - हिंदी स्नातक
सबसे बड़ी उपलब्धि - 'पन्त की बेटी'
प्रकाशित- 'कादम्बिनी' और कुछ अन्य जानी मानी पत्र - पत्रिकाओं में
काव्य संग्रह - नदी पुकारे सागर , अनमोल संचयन , अनुगूँज , प्रकाशनार्थ कहानियों का संग्रह 'बोलते एहसास '
सारस्वत सम्मान से सम्मानित
http://kalpvriksha-amma.blogspot.com/




कविता-संग्रह : नदी पुकारे सागर - सरस्वती प्रसाद

कवयित्री सरस्वती प्रसाद दीर्घकाल से रचनाकर्म में संलग्न है। वर्ष 2001 में इनका एक काव्य-संकलन 'नदी पुकारे सागर' प्रकाशित हुआ, जो काव्यप्रेमियों के बीच बहुत लोकप्रिय हुआ। इसकी भूमिका लिखते हुए सरस्वती जी लिखती हैं-

शून्य भिति पर गई उकेरी
काल की चारु कृतियाँ थीं,
नहीं थी वे इतिहास शिल्प
सहचरी मेरी स्मृतियाँ थीं.
मति चल न सकी बटमारों की
वे मेरे साथ यूँ बनी रही
हुई धूप प्रचंड स्थितियों की
तो कादम्बिनी सी तनी रहीं
इतना सामर्थ्य कहाँ होगा
जो उनके दिए का दाम भरूँ
कर सकती हूँ तो मात्रा यही
जो-भावभूमि उन्होंने दी
उस पर अंकित ये शब्द-चित्र
मैं नत हो उनके नाम करूँ

सरस्वती प्रसाद के इस संग्रह में सुमित्रानंदन पंत द्वारा लिखित वह कविता भी शामिल है जिसे पंत ने बेटी सरस्वती के प्रयाग आगमन पर लिखा था । इस संकलन में पंत की हस्तलिपि में वह कविता अंकित है-

चन्द्रकिरण किरीटिनी
तुम, कौन आती ?
मौन स्वप्नों के चरण धर!
ह्रदय के एकांत शांत
स्फटिक क्षणों को
स्वर्ग के संगीत से भर!
मचल उठता ज्वार,
शोभा सिन्धु में जग,
नाचता आनंद पागल
शिखर लहरों पर
थिरकते प्रेरणा पग!
सप्त हीरक रश्मि दीपित
मर्म में चैतन्य का
खुलता गवाक्ष रहस्य भर कर!
अमर वीणाए निरंतर
गूंज उठती , गूंज उठती
भाव निह्स्वर ---
तारको का हो खुला स्वप्नाभ अम्बर!
वैश्व लय में बाँध जीवन को
छिपाता मुख पराशर,
मर्त्य से उठ स्वर्ग तक
प्रसाद जीवन का अनश्वर
रूप के भरता दिगंतर!
चन्द्रकिरण किरीटिनी
तुम, कौन आती ?
मौन स्वप्नों के चरण धर!

(संग्रह में सम्मिलित पंत की हस्तलिपि में लिखी कविता की चित्रात्मक झलक)