बुधवार, 22 जून 2011

आकाश को पाना है , फिर सूरज मुट्ठी में (संगीता स्वरुप )




हाँ हाँ ये है आज की पोस्ट ... जी हाँ तस्वीर तो देख ही चुके आप सब ! ये हैं संगीता स्वरुप .... हर ब्लॉगरों की तरह उन्होंने भी इस क्षेत्र में अपनी भावनाओं का तरकश लिया , शब्दों की प्रत्यंचा पर लक्ष्य भेद किया ... प्रत्यक्ष कहा नहीं पर इनके क़दमों के निशान कहते गए - 'मन के हारे हार है , मन के जीते जीत ' और वे निरंतर चलती गईं . बचपन की यादों के सन्दर्भ में इन्होंने कहा -
' अक्सर अकेली स्याह रातों में
अपने आप से मिला करती हूँ और अंधेरे सायों में अपने आप से बात किया करती हूँ।' ये पंक्तियाँ बताती हैं कि हर रिश्ते , हर कर्तव्य से परे अपने 'मैं' से मिलना उससे कहना सुनना एक ख़ास हिस्सा होता है हमारा , जहाँ सोयी यादें , आगत की आहटें शक्ल लेती हैं .
ब्लॉग , संग्रह के प्रति सोच ने मुझसे 'अनमोल संचयन ' का संपादन करवाया और ३१ कवियों की श्रृंखला में संगीता जी भी थीं .... तो जनवरी २०१० प्रगति मैदान के बुक फेयर में हमारा मिलना हुआ हिन्दयुग्म के मंच पर . एक आत्मीयता , एक उत्साह और भविष्य में क्या करना है से भाव मुझे संगीता जी में मिले और वर्ष बीतते न बीतते मैंने उनकी साहित्यिक उड़ान देखी . चलिए अब उसके बारे में उनके शब्दों में हम उन्हें पढ़ें ---

मेरा जन्म ७ मई १९५३ में उत्तर प्रदेश के रुडकी शहर में हुआ था ..मेरे पिता उत्तर प्रदेश में इरिगेशन डिपार्टमेंट में कार्यरत थे .. समय समय पर स्थानांतरण होते रहते थे .जहाँ भी बाँध परियोजनाएं चलतीं थीं वही स्थानान्तरण हो जाता था ..प्राथमिक शिक्षा पहली से पांचवीं कक्षा तक रिहंद में हुई ..सरकारी स्कूल था . यहाँ तक कि पढाई टाट पट्टियों पर बैठ कर और तख्ती पर लिख कर पूरी की .. इतना समय माता पिता की स्नेह सिक्त छत्रछाया में बीता ... इसके पश्चात पापा का ट्रांसफर ऐसी जगह हो गया जहाँ कोई स्कूल नहीं था और दूर जाने के लिए कोई आवागमन का साधन भी नहीं उपलब्ध था ..यह जगह थी देहरादून से ३० किलोमीटर दूर ढालीपुर जगह जहाँ यमुना नदी पर बाँध बनाया जा रहा था ..पढ़ना ज़रुरी था और इतनी कम उम्र में हॉस्टल भेजना पापा को गवारा नहीं था तो हमें भेज दिया गया दादा जी के पास मेरठ शहर ... जहाँ रह कर हमने छठी से दसवीं तक की शिक्षा सेंट थॉमस गर्ल्स हाई स्कूल में पायी .. वहाँ रहते हुए ही जाना कि माता पिता के साथ रहने में और अन्य किसी रिश्तेदार के साथ रहने में कितना अन्तर होता है ..उस दौरान मेरा मन पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लगता था ..( वैसे कभी भी नहीं लगा ) इसी बीच दादाजी का निधन हो गया ..उनके जाने के बाद तो और भी वहाँ मन नहीं लगता था ..पापा का ट्रांसफर वहीं के आस पास के क्षेत्र ढालीपुर से ढकरानी और फिर डाकपत्थर होता रहा ... हाँ तब तक सरकार ने बच्चों को स्कूल तक पहुँचने के लिए बस उपलब्द्ध करा दी थी ... तो दसवीं के बाद हमने भी ग्यारहवीं और बारहवीं की परीक्षा माता पिता के साथ रह कर दी ..उसके बाद फिर समस्या आ गयी की डिग्री कॉलेज कोई नहीं था आस -पास ...तो फिर भेज दिया गया हमें चाचा जी चाचीजी के पास मेरठ ..पापा को यह गवारा नहीं था कि घर होते हुए हमें हॉस्टल में रख कर पढाया जाये ..तो पापा का आदेश मान रह लिए मन मार कर और ले लिया बी० ए० में प्रवेश रघुनाथ गर्ल्स डिग्री कॉलेज में ..उस समय मेरठ यूनिवर्सिटी में सेमेस्टर सिस्टम था .. इसी कॉलेज में मेरी मामी जी मनोविज्ञान विभाग में लेक्चरर थीं ..शायद उन्होंने ही मेरी मनोदशा को पढ़ा और समझा ..और उनके आग्रह
पर ही पापा ने दूसरे सिमेस्टर में मुझे हॉस्टल भेज दिया ..और यही मेरी ज़िंदगी का एक टर्निंग पौइंट था .. इस समय तक मैं बहुत दब्बू किस्म की लडकी हुआ करती थी ..कभी भी स्कूल के किसी भी कार्यक्रम में कभी भाग नहीं लिया ..बस घर से कॉलेज और कॉलेज से घर ...
लेकिन हॉस्टल में रहने के बाद ही मैं समझ पायी कि व्यक्तित्व के विकास के लिए हॉस्टल महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है ..
वहाँ रहते हुए कॉलेज के सभी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेना , अभिनय में प्रथम पुरस्कार पाना , मेरठ यूनिवर्सिटी की टेबल टेनिस टीम में चयन और एम० ए० फाईनल तक आते आते टीम की कैप्टन बनना ..और १९७३-७४ में यू ० पी० टेबल टेनिस चैम्पियन शिप जीतना मेरी उपलब्धि माना जा सकता है ..यही वह समय था जब लिखने में भी मेरा रुझान हुआ .. उस समय लडकियों की पढ़ाई का मकसद कोई कैरियर बनाना नहीं हुआ करता था ... ज्यादातर माता - पिता की सोच होती थी कि बेटी की शादी अच्छे पढ़े लिखे लडके से हो जायेगी ..कोई डॉक्टर या इंजीनियर लड़का मिल जायेगा ...खैर न न करते हुए बी० एड ० भी कर लिया .. और पढ़ाई की बदौलत १९७६ में एक अदद इंजिनियर से विवाह भी हो गया :):) .और मैं पहुँच गयी खेतड़ी नगर ( राजस्थान ) यहाँ मेरे पति हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड में कार्यरत थे ...

ज़िंदगी जीते जीते बस यही अनुभव हुआ कि ज़िंदगी समझौतों का नाम है ..हर एक को कुछ समझौते तो करने ही पड़ते हैं अब चाहे वो पुरुष हो या स्त्री ...यह बात और है कि स्त्री को ज्यादा करने पड़ते हैं ..इन्हीं समझौते के तहत ज़िंदगी गुज़रती गयी ..लिखने का शौक मृतप्राय: हो गया था ..क्रमश: १९७८ और १९८० में एक बेटे और एक बेटी की माँ बनने का गौरव भी मिला ..अब दोनों बच्चे अपनी अपनी घर गृहस्थी संभाल रहे हैं ... खेतड़ी नगर रहते हुए ही १९८४ -८५ से केंद्रीय विद्यालय में शिक्षिका के पद पर भी कार्य किया ..लेकिन पति के २००० में कोलकता स्थानान्तरण हो जाने के कारण मैंने अपनी नौकरी त्याग दी ... क्यों कि मेरा ट्रांसफर नहीं हो पा रहा था ..कारण ... बिना रिश्वत के कहीं बात नहीं बनती ...पहुँच होनी चाहिए ..रास्ते पता होने चाहिए ..जिनसे मैं तो बिल्कुल अनभिज्ञ थी ... खैर ... उसका मुझे कोई अफ़सोस नहीं है क्यों कि नौकरी छोडने का निश्चय मेरा ही था .. लेकिन अध्यापिका के रूप में बिताये समय मेरे लिए अविस्मरणीय रहेगा ...कोलकता से २००१ में फिर ट्रांसफर हो गया घाटशिला ( झारखंड ) २००५ तक वहाँ रहने के बाद फिर २ साल कोलकता में बिताये और २००७ में पति डायरेक्टर के पद से सेवानिवृत हुए ... और हम २००७ से आ कर दिल्ली में बस गए ... यहाँ आ कर फिर से लेखन की तरफ ध्यान गया ..देखा जाए तो इंसान को जो चाहिए वो सब मुझे खूब और भरपूर मिला है ..पर कहीं कुछ ऐसा है जो अक्सर मन को झकझोर देता है और यही छटपटाहट मेरी लेखनी में उतर आती है ..
२००७ से अंतरजाल से जुडने के बाद बहुत से अच्छे लोगों से मुलाक़ात हुई ... लोगों ने मेरे लिखे को सराहा ..प्रोत्साहित किया और ब्लॉगिंग की वजह से शून्यता भी मेरे जीवन में घर नहीं कर सकी ...इसके लिए मैं ब्लॉग जगत और ब्लॉगर साथियों का आभार व्यक्त करती हूँ ..
तो यही था बचपन से अब तक का सफर

प्रकाशित पुस्तक -- उजला आसमां

ब्लॉग्स --- http://geet7553.blogspot.com/


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{निर्भीक निडर का फर्क http://sameekshaamerikalamse.blogspot.com/2011/06/blog-post_20.html}


एक टिप्पणी के सन्दर्भ में , जिसे मैंने पढ़ा


पत्रकार निर्भीक होता है जो निर्भीक लिखता है, निडर रहता है .... भाव सूक्ष्म परिवर्तित हो जाते हैं
जैसे यह वाक्य - 'मतदाताओं से अपील की है कि वे निर्भीकनिडर होकर अपने घरों से मतदान केन्द्रों के लिए निकलें। ...'
'वह बड़ी निडरता से राजा के पास चला गया और राजा ने जब उससे सवाल पूछा कि तुमने मेरे महल के नियमों का उल्लंघन क्यूँ किया तो उसने निर्भीकता से जवाब दिया ...'निर्भीक ... पूरी तरह से भयमुक्त और निडर यानि जिसे डर न लगे . भय व्यापक रूप में समाहित है .एक बाह्य अभिव्यक्ति है एक आत्मिक - बस यही सूक्ष्म फर्क है !
वैसे ...क्या आलोचना करने से ज्यादा सही यह बात नहीं कि उसे कहा जाए कि यह गलत है... अब जब मैंने यह ब्लॉगhttp://sameekshaamerikalamse.blogspot.com/ बनाया तो टाइप करने में शख्स की जगह शक्स लिखा तो संगीता स्वरुप जी ने कहा ,' कृपया इसे देख लें .....' बताना तो विनम्रता ही है न ,
और यूँ गलती किससे नहीं होती , एक रूचि के होकर हम एक दूसरे का साथ दें तो बेहतर है .

51 टिप्‍पणियां:

  1. वाह आज तो दो ब्लॉगर के बारे में इतना कुछ जानने को मिला .............बहुत बहुत शुक्रिया आपका रश्मि जी

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  2. संगीता जी की ममतत्व भरे व्यक्तित्व से शायद कोई इनकार कर सके,उनकी छोटी छोटी कविताएं ...गहरे अर्थ भरी होती है

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  3. वाह..आज की खास अतिथि का हम भी स्‍वागत करते है आप के साथ, संगीता जी का परिचय आपकी कलम से पढ़कर और उनके बारे में बहुत कुछ जानने का अवसर मिला .. आभार के साथ बधाई ।

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  4. संगीता जी,अद्भुत व्यक्तित्व की मालकिन , कवि सुलभ ह्रदय की मालकिन , वात्सल्य और प्रेम की मूर्ति है. मै उनसे व्यक्तिगत रूप से मिल चूका हूँ और उनकी लेखनी मुझे अद्भुत कल्पना लोक में ले जाती है . आभार आपका की आपने संगीता जी के बारे में दो शब्द लिखने का मुझ अकिंचन को मौका दिया .

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  5. संगीता जी को उनकी कलम से जानना सुखद रहा। एक बेहतरीन कवयित्री के साथ साथ बहुत अच्छी प्रकृति की इंसान हैं। उनकी कविताएं सामाजिक समस्याओं को उठाती रहती हैं।
    उन्हें शुभकामनाएं।

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  6. आप भी बिना किसी डर भय के टिप्पणी का मॉडरेशन हटा दें, कोई इससे क्षति, हानि नहीं होने वाली।

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  7. संगीता जी ने जो जीवन जिया है उसकी झलक उनकी कविताओं में मिलती है। बिरले ही होते हैं जो जीते हैं वहीं कहते हैं। शुभकामनाएं।

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  8. आहा ..अभी तक तो संगीता जी को एक कुशल कवियत्री, एक समर्थ चर्चाकार और बेहद खूबसूरत व्यक्तित्व के रूप में जानते थे.आज उनकी और भी बहुत सी प्रतिभाओं का पता चला.टेबिल टेनिस चैम्पियन, एक अभिनेत्री.वह तो एक बहुआयामी व्यक्तित्व की मालकिन निकलीं.
    बहुत आभार रश्मि जी! संगीता जी के व्यक्तित्व के इन अनछुए पहलू से हमें रू बी रू कराने का.

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  9. संगीता जी ने जिंदगी में बहुत उतार चढाव देखे हैं । यह उनकी छोटी छोटी रचनाओं में भी झलकता है ।
    अच्छा है कि अब दिल्ली में सेटल्ड हैं । उनको बहुत बहुत शुभकामनायें ।

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  10. संगीता जी से विस्तृत परिचय कराने के लिये आपके आभारी हैं। पहले थोडा पता था अब पूरा पता चल गया । उनकी कविताओ मे उनके जीवन का अनुभव बोलता है।

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  11. सर्वप्रथम रश्मि आंटी आपको तहे दिल से आभार जो आपने आज बहुत ही सुंदरता से व्यक्तिगत तौर पर संगीता आंटी के विषय में बताया।मै तो अभी बहुत छोटा हूँ,पर मन अत्यधिक प्रफुल्लित हो जाता है ये सोचकर कि मुझे आपलोगों का सान्निध्य प्राप्त हो रहा है।अभी हाल में मेरा सौभाग्य है,कि संगीता आंटी से मिलना हुआ।ब्लाग में जैसा सोचा था बिल्कुल वैसी ही ममता की मूर्ती है वो।ऐसा लगता है जैसे ममत्व की धारा बह रही है....जब वो सर पर हाथ रख आशीर्वाद देती है,तो ऐसा लगता है,कि अब तो सबकुछ प्राप्त हो ही जाना है।जितना कहूँ उतना कम है संगीता आंटी के बारे में....साथ ही मैने उनकी प्रकाशित काव्य पुस्तक "उजला आसमां" भी पढ़ा...हर कविता में कुछ नया और एक कविता को बार बार पढ़ने को जी करता है......बहुत प्यारी और कोमल ह्रदय है संगीता आंटी....ईश्वर से उनकी स्वस्थता के साथ ही यूँही निरंतर सान्निध्य की कामना करता हूँ...........।

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  12. sangeeta ji... hamare jaise naye logo ki jo zindgi ko talash rahe hai..aur sayad kahi kho gaye hai... unke liye umeed ki ek kiran ki tarah hai.. unki personality aur jindgi ke anubhaav hame bhi jindgi ko samjhne me ek perna pradaan karte hai... unka har anubhaav unki rachnaao me dikhta hai... bhut bhut dhanywaad rashmi mam ji ki apne itni unique personality se parchit karaya... thank u very much...

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  13. आज संगीता जी को कौन नही जानता...आज आपने उनका ये परिचय दे कर हम सब को अनुग्रहित किया.
    हम जब भी कोई पुस्तक पढते है तो एक मानवीय स्वभाव के तहत हम उस लेखक के बारे में अधिक से अधिक
    जानने की इच्छा रखते है, आज आपने हमारी ये इच्छा पुरी कर दी. बहुत अच्छा लगा उनके जीवन के बारे में जान कर.

    धन्यवाद

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  14. संगीता स्वरुप जी से ब्लॉग पर मुलाकात के पश्चात 29 अप्रेल को हिन्दी भवन दिल्ली में उनके साक्षात दर्शन हुए। मनोयोग से ब्लॉग लेखन के प्रति समर्पित हैं, शालीनता एवं गंभीरता इनके व्यक्तित्व की पहचान है।

    आपको ढेर सारी शुभकामनाएं,आपका स्नेह हम पर युं ही बना रहे।

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  15. संगीताजी के साथ उनकी जीवन यात्रा के सफर पर चलना बहुत सुखद अनुभव रहा ! वे विलक्षण व्यक्तित्व की स्वामिनी है और अत्यंत संवेदनशील एवं उदारमना महिला है यह ना केवल उनके लेखन से बल्कि उनकी हर बात से झलकता है ! उनका परिचय जानकार बहुत प्रसन्नता हुई ! उनके सफल एवं यशस्वी भविष्य के लिये अनंत शुभकामनायें हैं ! आपका आभार एवं धन्यवाद कि आपने हमें उनसे मिलने और उन्हें जानने का अवसर दिया !

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  16. रश्मि दी बहुत अच्छा लगा आपने आज संगीता जी का परिचय दिया ...उनके बहुआयामी व्यक्तित्व के बारे में जान कर बहुत हर्ष हुआ ..!!उनका जीवन जीने का नजरिया ..उनका दृष्टिकोण ...और कुछ कविताओं में छुपी हुई चपला ..चंचला सी संगीता जी मन को बहुत प्रभावित करतीं हैं ...!!जब से ब्लोगिंग शुरू की तब से ही उनका सहयोग ...टिपण्णी के माध्यम से उनका मार्गदर्शन मिलता रहा है ...!!शायद वो नहीं जानतीं इस बात को पर अपरोक्ष रूप से ही उन्होंने बहुत उत्साह बढाया है मेरा ...!!उनका आभार ..!!और रश्मि दी आपका भी उनका परिचय देने के लिए ..!!अब समझ में आता है .."उर में है यदि आग लक्ष्य की ..पंथ स्वयं आएगा....पंथ स्वयं आएगा ...!!

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  17. दी ,
    संगीता दी के फ़ोटो को देख कर उनके बारे में जैसा सोचती थी आपके आलेख ने उसकी पुष्टि कर दी ...... सादर !

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  18. संगीता जी से विस्तृत परिचय कराने के लिये आपके आभारी हैं। पहले थोडा पता था अब पूरा पता चल गया । उनकी कविताओ मे उनके जीवन का अनुभव बोलता है।
    वंदना जी ने जो कहा .. उससे पूरी तरह सहमत हूं !!

    उत्तर देंहटाएं
  19. आपके बारे (संगीता जी) में एक बात और बता रहा हूँ... हालांकि है तो मुझसे ही रिलेटेड... संगीता जी और मेरी स्वर्गवासी माँ की डेट ऑफ़ बर्थ एक ही है... और इसीलिए वो मेरे दिल के बहुत ही करीब हैं... मैं तो खुशकिस्मत हूँ... कि आप तीनों मेरी माँ के रूप में मेरे पास हैं...

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  20. रश्मि जी इस ब्लॉग का विषय अच्छा चुना है. इससे ब्लॉगर्स के व्यक्तित्व का समूर्ण परिचय जानने को मिलता है. इस नयी शुरुआत के लिए आप दिल से बधाई की पात्र हैं.

    संगीता जी के लेखन से तो हम सभी परिचित है. आज उनके व्यक्तित्व से भी विस्तृत परिचय हुआ. दिल्ली में रहते कहीं न कहीं मुलाक़ात भी हो जायेगी.

    बहुत शुभकामनायें संगीता जी को और आपको और नए क्षितिज भविष्य में छूने के लिए.

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  21. :)

    takreeban 3 saal pahle orkut pe sangeeta auntie se mulakaat hui thi sabse pahle..unse hi mujhe pahli baar e-cards scraps ke taur me milne shuru hue the..har subah unka "shubh prabhaat" kahta hua ek mangal kaamana se yukt scrap aaya hua milta tha...wahin alag alag communities mein unki rachanaayein padhne ko milti thi..ek mein to jana hi keval unhe padhne k liye hota tha..bahut sundar likhti hain..jaise koi komal sa ehsaas sa hota hai man mein..

    waise to kabhi hamari itni baat nahin hui, lekin phir bhi ek cheez observe ki hai maine unke vyaktitva mein...mujhe aisa lagta hai ki wo jahan bhi hoti hain, wahan logon ko aapas mein jode rakhti hain, unhein baandhe rakhti hain...aur dheere-dheere unki bhumika guardian jaisi ho jati hai...ye na unhe pata lagta hai na baki logon ko...kya aapko aisa nahin lagta??..is post mein sabse upar jo photo hai, uski saumya muskaan hi unke mamatva ko dikhane k liye paryaapt hai..

    :):)

    उत्तर देंहटाएं
  22. :)

    takreeban 3 saal pahle orkut pe sangeeta auntie se mulakaat hui thi sabse pahle..unse hi mujhe pahli baar e-cards scraps ke taur me milne shuru hue the..har subah unka "shubh prabhaat" kahta hua ek mangal kaamana se yukt scrap aaya hua milta tha...wahin alag alag communities mein unki rachanaayein padhne ko milti thi..ek mein to jana hi keval unhe padhne k liye hota tha..bahut sundar likhti hain..jaise koi komal sa ehsaas sa hota hai man mein..

    waise to kabhi hamari itni baat nahin hui, lekin phir bhi ek cheez observe ki hai maine unke vyaktitva mein...mujhe aisa lagta hai ki wo jahan bhi hoti hain, wahan logon ko aapas mein jode rakhti hain, unhein baandhe rakhti hain...aur dheere-dheere unki bhumika guardian jaisi ho jati hai...ye na unhe pata lagta hai na baki logon ko...kya aapko aisa nahin lagta??..is post mein sabse upar jo photo hai, uski saumya muskaan hi unke mamatva ko dikhane k liye paryaapt hai..

    :):)

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  23. संगीता जी को इस माध्यम से जानना सुखकर रहा.....बहुत अच्छा लगा.

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  24. संगीताजी अच्छी लेखिका के साथ ही बहुत अच्छी इंसान भी हैं ...स्वयं अनुभवी और उच्च कोटि के साहित्यकार होने के बावजूद उनमे दर्प लेशमात्र भी नहीं है ...नए ब्लॉगर्स को यथोचित सम्मान और अवसर देती हैं , किसी को हतोत्साहित करते या विवाद में पड़ते मैंने उन्हें कभी नहीं देखा ...बहुत कुछ मुझे आप जैसी ही लगती हैं ....
    बहुत शुभकामनायें !

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  25. संगीताजी के विषय में इतना कुछ पढ़कर जानकर बहुत अच्छा लगा..... उनका व्यक्तित्व, विचार और लेखनी सभी बहुत प्रभावित करते हैं....

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  26. परिचय बहुत ही अच्छा लगा, हॉस्टल में रह कर व्यक्तित्व तो खुल जाता है।

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  27. हीरे से ज्यादा कठोर कुछ भी नहीं उसे तराशना भी मुकम्मल हाथों से ही संभव है ज़रा सी ठेस और उसमें खिंची एक लकीर कर देती है अवमूल्यन हीरे का ..आज मैं भी हो गयी हूँ मूल्य विहीन मैं हीरा नहीं पत्थर भी नहीं फिर भी खिंच गयी है भीतर तक कोई लकीर जिसे पारखी नज़रें छोड़ देती हैं बिना ही कोई मोल लगाये ....
    क्षमा याचना सहित......
    हीरे से ज्यादा कठोर - "जिंदगी". अपने ही हाथों तराशी जाती .जितनी भी ठेस लगे , निखर-निखर जाती है. जितनी बदरंग हो ,सँवर-सँवर जाती है . ना कोई मोल है , ना कोई तोल है. हर खिंची लकीर इन्द्र धनुष जोड़ देती है. जिंदगी तूफानों की दिशा मोड़ देती है. जब तलक साथ है बेमोल नज़र आती है, ज्यों ही साथ छूटा अनमोल ये हो जाती है. क्रमश:....

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  28. संगीता जी के बारे में जो कुछ हमने सोच रखा था ,जीवन-परिचय ने उसकी पुष्टि कर दी. इससे बेहतर व्यक्तित्व और क्या हो सकता है ,जैसा भीतर-वैसा बाहर .जीवन की धूप-छाँव , व्यवधान , लम्बे अंतराल भी काव्य-साधना को गति रोक नहीं पाए. बिना पद-प्रभाव के,बिना मुलाकात के कोई आदरणीय हो जाये ,इससे सच्चा सम्मान और भला क्या हो सकता है. मैं और सपना अक्सर संगीताजी के व्यक्तित्व की चर्चा और प्रशंसा करते ही रहते हैं .सभी को प्रोत्साहित करना संगीता जी की सरलता का उदाहरण है.इतनी ऊँचाईयां पाकर भी आप जमीं से जुडी हैं, वर्ना लोग तो ऐसे भी देखे है कि एक इंच ही उठने के बाद जमीन की ओर झाँकना भी अपनी शान के खिलाफ समझते है. मेरी और सपना की ह्रदय से यही कामना है कि संगीता जी को जीवन का हर सुख मिले,सदा स्वस्थ रहें और दीर्घायु हों.

    उत्तर देंहटाएं
  29. संगीता जी के बारे में जो कुछ हमने सोच रखा था ,जीवन-परिचय ने उसकी पुष्टि कर दी. इससे बेहतर व्यक्तित्व और क्या हो सकता है ,जैसा भीतर-वैसा बाहर .जीवन की धूप-छाँव , व्यवधान , लम्बे अंतराल भी काव्य-साधना को गति रोक नहीं पाए. बिना पद-प्रभाव के,बिना मुलाकात के कोई आदरणीय हो जाये ,इससे सच्चा सम्मान और भला क्या हो सकता है. मैं और सपना अक्सर संगीताजी के व्यक्तित्व की चर्चा और प्रशंसा करते ही रहते हैं .सभी को प्रोत्साहित करना संगीता जी की सरलता का उदाहरण है.इतनी ऊँचाईयां पाकर भी आप जमीं से जुडी हैं, वर्ना लोग तो ऐसे भी देखे है कि एक इंच ही उठने के बाद जमीन की ओर झाँकना भी अपनी शान के खिलाफ समझते है. मेरी और सपना की ह्रदय से यही कामना है कि संगीता जी को जीवन का हर सुख मिले,सदा स्वस्थ रहें और दीर्घायु हों.

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  30. आदरणीया संगीता जी हम सब की प्रेरक हैं उनके इस विस्तृत परिचय से बहुत कुछ जानने को मिला.

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  31. आदरणीया संगीता जी के बारे में विस्तृत जानकारी मिली ............बड़ी प्रसन्नता हुई

    जबसे मैं ब्लॉग जगत में आया हूँ ,कभी रूबरू न होने पर भी उनके अन्दर के ममता भाव का आशीर्वाद पाता रहा हूँ

    ईश्वर उन्हें दीर्घायु करे जिससे वर्षों तक हम उनका आशीष पाते रहें ...

    उत्तर देंहटाएं
  32. aadarniya swarooj ji,
    saadar namaskar!

    aapke beete samay ke baare me padha, achha laga saath hi ek prerna bhi mili...

    aapke parichay ko khud se correlate karke dekha to paaya ki sirf 26 basant paar karte karte bundi, jaipur, delhi, ajmer me rahne ke baad singrauli/sonebhadra kshetra me koyale ki khadaano me coal india ki sevaon ke liye aa gaya, mahaz ek kaaran se ki sarkaari company hai.....

    lekin yaha 21st shataabdi waala charm nahi hai...kabhi kabhi jyada boriyat ho jati hai to mann karta hai naukri chhodkar hi bhaag jaun...

    lekin aapke baare me padhkar lagaa ki ye to zindagi hai, sab kuchh mann chaaha nahi hota....aaj yaha kal wahaan....aise hi umra kat jayegi......

    jaahi widhi raakhe raam, taahi widhi rahiye...

    is behtareen post ke liye aadarniye prabha madam ko bahut bahut shukriya....

    उत्तर देंहटाएं
  33. beshak aapki har abhivyakti lajawaab hoti hai....

    har shabd ka saarthak chitr aankho ke saamne hota hai...

    उत्तर देंहटाएं
  34. संगीता जी को नियमित पढता रहता हूँ उनके ब्लॉग के माध्यम से ... और उनकी सक्सियत का अंजाद लगाता रहता हूँ ... आज उनकी कलम से .. और जीवन दर्शन से बहुत कुछ जानने को मिला ... बहुत अच्छा लगा उनसे मिलना ...

    उत्तर देंहटाएं
  35. मैंने आपकी पूरी जीवनी को फिल्म की तरह देखा . टाटपट्टी वाले स्कूल से लेके होस्टल ..और कॉलेज की मुखर संगीता (माँ ) तक .
    चरण स्पर्श .
    रश्मि माँ का आभार इस बढ़िया प्रस्तुति के लिए .

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  36. संगीता जी के लेखन से तो हम पहले से ही परिचित हैं, आज उनके व्यक्तित्व से परिचय होना बहुत अच्छा लगा..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  37. kafi kuch jaankari mili, lekhan ke alaawa aur bhi khoobiya thi ya hain!

    उत्तर देंहटाएं
  38. संगीताजी के विषय में इतना कुछ पढ़कर जानकर बहुत अच्छा लगा. उनके लेखन से तो हम पहले से ही परिचित हैं, आज उनके व्यक्तित्व से भी परिचय होगया...अच्छा लगा..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  39. avismarniya post...:)
    sangeeta di ke baare me jaan kar achchha laga!!
    waise mujhe khushi hai ki blogg ke duniya ke is vibhuti se ham mil chuke hain:)

    उत्तर देंहटाएं
  40. शुरू से आखिरी तक सब जान लिया, वैसे जानती तो बहुत समय से हूँ लेकिन अब तो लगता की ये खुली किताब सी संगीता कितनी समर्पित है लेखन के लिए. रश्मि जी अप बधाई की पात्र हैं जो अपने इस तरह से प्रस्तुति आरम्भ की.

    उत्तर देंहटाएं
  41. पल्लवी जी की टिप्पणी मेल से प्राप्त हुई ...

    Pallavi Saxena to me
    show details 1:20 PM (2 hours ago)
    आदरणीय संगीता जी,

    आपका परिचय पढ़ा, काफी खूबसूरती से लिखा है। मैं कमेंट देना चाह रही थी पर दे नहीं सकी क्यूंकी इस ब्लॉग पर बार बार लोगिन करने का मैसेज आ रहा था। इसलिए मेल कर रही हूँ।

    "मैं तो सभी लोगों की बातों से पूर्णरूप से सहमत हूँ, आप की कविताओं में ,रचनाओं में जीवन के अनुभव झलकते हैं ,उसका एहसास महकता है ,और एसा लगता है यह सब आप ने अपने दिमाग से नहीं बल्कि अपने दिल की गहराईयों से लिखा हो .... शुभकामनायें"

    सादर
    पल्लवी

    उत्तर देंहटाएं
  42. रश्मि जी ,

    सबसे पहले आपकी आभारी हूँ जो आपका स्नेह मिला ...

    @@ अपने पाठकों का आभार व्यक्त करती हूँ जिन्होंने इतना मान दिया और साथ ही आगे बढने की प्रेरणा दी ...आप सभी के स्नेह के आगे आभार और शुक्रिया छोटे शब्द हैं ... फिर भी विनम्रता से आप सभी का आभार

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  43. आदरणीय रश्मि जी अभिवादन -
    संगीता स्वरुप जी को भी आप के माध्यम से अभिवादन और ढेर सारी शुभ कामनाएं -
    बहुत अच्छा हुआ आज आप के शब्द के माध्यम से एक कुशल और सुमधुर व्यव्हार रखने वाली कवियित्री के बारे में इतना सब कुछ जानने का सु-अवसर प्राप्त हुआ हम तो इस क्षेत्र में बिलकुल ही नए हैं जब हमारी ब्लागिंग की शुरूआत ही हो रही थी तभी से उनका इतना प्यारा व्यव्हार प्रोत्साहन देना और सुझाव देना जारी रहा -यूँ तो हम कभी , अभी तक मिल नहीं सके हैं(समयाभाव वश) पर उनकी बातो से-उनकी टिपण्णी से -उनकी गहन काव्य प्रतिभा से -रोचक और ज्ञान वर्धक कविताओं से उनका सुमधुर व्यव्हार और चरित्र, जीवन शैली झलक जाती है -जो मन को छू जाती है -आत्मीयता भर जाती है -वे इस दुनिया में उछ शिखर पर पहुंचे -साधुवाद

    एक आत्मीयता , एक उत्साह और भविष्य में क्या करना है से भाव मुझे संगीता जी में मिले और वर्ष बीतते न बीतते मैंने उनकी साहित्यिक उड़ान देखी .

    शुक्ल भ्रमर ५

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  44. sangeetajee ke bare men itna kuch jankar bahut achcha laga.unki kavitayen hamesha mugdh karti hain mujhe.

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  45. संगीता जी की रचनाओं के हम कायल हैं. आज उनके बारे में जानकर बहुत अच्छा लगा

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  46. sangeeta di ke bare kuch kehna kam hi hoga aur unki kam shabdon me badi baat keh dena.....ye kala to unki hi kalam jaan sakti hai.. dhanywad.

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  47. jab se net ke sampark mein aayee hun Sangeeta ji ko padhti aayee hun lekin aaj unke bahuaayaami vyaktitw se parichay hua. Sangeeta ji ko bahut shubhkaamnaayen.

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  48. आपको भी सबसे पहले मैं अपने ब्लॉग के जरिये ही जान पाया था , बताने की जरुरत नहीं कि आपके बारे में जानकार बहुत अच्छा लगा |
    लेकिन उससे भी अच्छा लगा ये जानकर कि आपको अध्यापन में रूचि है , मैंने भी इन गर्मी की छुट्टियों में अपने छोटे से शहर में अपने छोटे भाई के कुछ साथियों को इत्तेफाक से और यूँ ही पढ़ाया था , पहले तो मुझे कुछ खास रूचि नहीं थी लेकिन फिर धीरे धीरे मजा आने लगा और सचमुच बहुत अच्छा लगा लेकिन उससे भी अच्छा तब लगा जब इस दशहरा पर मेरे घर जाने की खबर पाकर वो मुझसे मिलने आये |

    सादर

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