गुरुवार, 23 जून 2011

होनहार , चुलबुली ...'बाप रे , कितना जानती है ये लड़की ' (शिखा वार्ष्णेय )



शिखा को मैं पढ़ती थी , और हर बार सोचती - 'बाप रे , कितना जानती है ये लड़की ' कभी उसके क्वालिफिकेशन को नहीं पढ़ा और दांतों तले ऊँगली दबाती रही . उसकी योग्यता , उसके क्षेत्र को तब जाना जब मेरी बेटी अपराजिता को मास कम्युनिकेशन में एडमिशन के लिए एक प्रोजेक्ट बनाना था और तब मेरी दोनों बेटियों ने उससे मेल के जरिये प्रश्नों के उत्तर मांगे और बिना किसी नानुकुर के शिखा मान गई . एक फॉर्म उसने अपने पतिदेव से भी भरवाकर भेजा ...... यह ब्लॉग का सामीप्य , शब्दों का रिश्ता था .
उसके शब्द में जाना है कि वह बड़ी बेटी है, पर उसके लिखने के अंदाज में , किसी अवार्ड को साझा करने में एक सादगी और चुलबुलापन है , तभी तो - जब भी वह कुछ विशेष सन्दर्भ में बताती है तो मैं मन ही मन कहती हूँ - 'बाप रे , कितना जानती है ये लड़की ' !

अब एक नज़र उस शिखा की , जिसने अपनी प्रतिभा के साथ जीवन की आपाधापी में समझौता किया , पर वक़्त ही चलकर पास आया और कहा - 'मैं हूँ न' .... उसकी यह उड़ान उसके पापा और अपनों के नाम ;

जन्म २० दिसंबर १९७३ को नई दिल्ली में हुआ खानदान के सबसे बड़े बेटे की सबसे बड़ी बेटी थी अत: सभी का भरपूर प्यार मेरे हिस्से आया .पिताजी उत्तर प्रदेश के एक सरकारी विभाग में अधिकारी थे अत :स्कूलिंग पहले पिथोरागड़ फिर रानीखेत के स्थानीय स्कूलों में हुई ,जो उस समय उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा थे. जानने वाले कहते हैं मुझपर अपने पिताजी के व्यक्तित्व का गहरा असर है .शायद इसलिए बचपन से ही कुछ ऐसा करने की ललक थी कि पापा को मेरे नाम से जाना जाये.स्कूल की सभी गतिविधियों,प्रतियोगिताएं में हिस्सा लिया करती थी. चाहे वह वाद विवाद प्रतियोगिता हो या डांस या फिर खेल और जीता भी करती थी.पढ़ाई में भी अच्छी थी. तो उस छोटे से शहर में अच्छा खासा रोब था. हम तीन बहने थीं और मैं सबसे बड़ी शायद इस बात ने मुझे कुछ ज्यादा महत्वाकांक्षी बना दिया था. घर में दुनिया भर के पत्र- पत्रिकाएं आतीं थीं फिर भी आते ही उन्हें पढने की होड़ सी हुआ करती थी. होली पर हम पिताजी के साथ बैठकर रिश्तेदारों के काव्यात्मक टायटिल बनाया करते थे.शायद वहीँ से साहित्य के अंकुर पनपने लगे थे. परन्तु ज्यादातर बच्चों की तरह मैं भी तब कभी टीचर ,कभी एयर होस्टेस तो कभी आई ए एस अफसर बनने के सपने ही देखा करती थी. और इसी दौरान हंसी खेल में अपनी एक तुकबंदी मैंने एक स्थानीय पत्रिका में भेज दी.और घोर आश्चर्य कि वह छप गई. जबकि तब तक यही सुनते आये थे कि पत्र पत्रिकाओं में अनजान और नए लोगों की रचनाएँ नहीं छपा करती.उस रचना के छपने से मेरी सोच का रुख आई ए एस से निकल कर पत्रकारिता पर होने लगा था.. तभी बारहवीं पास करने के बाद रशिया से छात्रवृति का ऑफ़र आया.सभी रिश्तेदारों के यह कहने के वावजूद कि हमारे समाज में लडकियां जर्नलिस्ट नहीं बना करती, यही किसी कॉलेज में दाखिला करा दो.मेरे माता पिता ने मुझे जर्नलिज्म करने के लिए ६ साल के लिए रशिया भेज दिया . और १९९१ में , १६ साल की अवस्था में,मैं अपने छोटे से शहर से निकल कर आगे की पढ़ाई करने रशिया चली गई . वहां पत्रकारिता में स्नातक और परास्नातक करने के दौरान मेरे लेख ,अमर उजाला ,दैनिक जागरण और आज जैसे भारतीय समाचार पत्रों में छपने लगे.उसी दौरान रेडियो मोस्को की हिंदी सेवा से भी बटोर स्टायलीस्ट/ब्रोडकास्टर जुडी रही. फिर वहां से टीवी पत्रकारिता में सर्वोच्च अंकों के साथ "विद ऑनर" डिग्री लेकर वापस आई और भारत में एक टी वी आई (बिजनेस इंडिया ग्रुप )नामक एक न्यूज चैनल में अस्सिस्टेंट न्यूज प्रोडूसर के तौर पर नौकरी करने लगी.परन्तु जैसा कि भारतीय समाज में सोचा जाता है नौकरी लगते ही विवाह के लिए जोर दिया जाने लगा और ३ महीने बाद ही मेरा विवाह एक कम्पूटर इंजिनियर से हो गया. फिर जैसे कि होता है पति कि नौकरी के अनुसार कभी अमेरिका तो कभी इंग्लेंड के चक्कर हम लगाते रहे और उसमें मेरे कैरियर की आहुति जाती रही.शादी के एक साल बाद ही बेटी का जन्म फिर देश ,विदेश आवागमन ,पिताजी का आकस्मिक देहांत और फिर बेटे का जन्म. जिन्दगी इतनी तेजी से भाग रही थी कि कभी अपने बारे में सोचने का, पीछे मुड़ कर देखने का मौका ही नहीं मिला. किसी भी काम को पूरी शिद्दत से करने के अपने स्वभाव वश मैंने अपनी गृहस्थी में अपने आप को तन, मन से समर्पित कर दिया.बस कुछ पंक्तियाँ अपनी डायरी के हवाले करती रही जिससे मेरा अस्तित्व बरकरार रहा शायद.जैसा कि कवि बच्चन की ये पंक्तियाँ काफी हद तक मुझे अपनी सी लगाती हैं -

जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला

२००५ में लन्दन आने के बाद बच्चे थोड़े बड़े हुए तो अपने लिए थोडा समय मिलने लगा.तभी एक मित्र ने ऑरकुट से परिचय कराया .ऑरकुट की साहित्यिक कम्युनिटी में मैंने अपनी डायरी के पन्ने बांटने शुरू किये और वहां से प्रोत्सहन पाकर ब्लॉग बनाया जहाँ खुले दिल से लोगों की सराहना और प्रोत्साहन मुझे मिला जिसकी मैं हमेशा ऋणी रहूंगी . मेरी रुकी हुई गाड़ी को जैसे अचानक पटरी मिल गई और मैंने अपने बचे हुए समय को, उसे तेल,पानी देने में लगा दिया और फिर वह गाड़ी चल पड़ी.उसके बाद रास्ते अपने आप बनते गए .

आजकल ब्लॉग और कुछ न्यूज़ पोर्टल के अलावा.लन्दन में भारतीय उच्चायोग की सांस्कृतिक शाखा नेहरु सेंटर की हिंदी साहित्य की गतिविधियों में सक्रीय रहना शुरू किया.यह शायद मेरा सौभाग्य है कि हर क्षेत्र में लोगों का प्यार, सम्मान मुझे सहज ही प्राप्त हो जाता है.यहाँ भी सभी गुणी जानो का और वरिष्ठ साहित्यकारों का अपनत्व और साथ मुझे भरपूर मिल रहा है.और अब मैं हिंदी की ,हिंदी साहित्य की और पत्रकारिता की सेवा में संग्लग्न हूँ.
आज जीवन से बहुत हद तक संतुष्ट हूँ .पूरा जहाँ जीतने की तमन्ना नहीं .बस इतनी सी हसरत है कि ऊपर से जब मेरे पिताजी मुझे देखें तो अपने आसपास के सभी लोगों से कह सकें ( जो कि मुझे उम्मीद है कि वहां भी उन्होंने अपने आस पास मजमा लगा रखा होगा) कि देखो ! ये मेरी बेटी है.
प्रकाशित पुस्तकें - एक क़तरा आस्मां ( संयुक्त काव्य संकलन.)
एक संस्मरण प्रकाशनार्थ

--




46 टिप्‍पणियां:

  1. शिखा जी , बेहद अपनी सी लगती है ..उनके साथ ठहाके लगा सकते है , दिल की बात बे-झिझक कर सकते है ,उनका लिखा हुआ पढ़ना अपने में जो मज़ा detआ है वो क्या कहे ..जब मन ना लग रहा हो तो एक बार उनके ब्लॉग का चक्कर लगाया और फ्रेश

    उत्तर देंहटाएं
  2. शिखा जी ने दिखा दिया कि बेटियां भी बेटों से कम नहीं होती ।
    यह भारतीय नारी के ही संस्कार हैं कि वे अपने परिवार के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देती हैं ।

    बेशक ब्लोगिंग ने एक जरिया दिया है अपनी प्रतिभा और क्षमता को सामने लाने का और सार्थक उपयोग करने का ।
    और प्रतिभा तो शिखा जी में कूट कूट कर भरी है ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. shikha ji bas itna hi kahungi ki rashmi ji ka dhnyavad aur..................

    वख्त बहुत देर तक
    उसको ढूंढता रहा
    उसके ही
    सपनों की सीढ़ी चढ़
    छूने की चाह में
    औंधे मुँह गिरा
    कभी रसोई में ,
    कभी गलियारे में
    कभी भागती सड़कों पर
    कभी मासूम हाथों ने
    पीछे धकेल दिया
    कभी खुद उसने मुँह फेर लिया
    पर वख्त ने मानी नहीं हार
    जब उड़ने लगे परिंदे
    उसने देखा वो अकेली बैठी है
    वख्त ने की नहीं देरी
    और थम लिया उसका हाथ
    कहाँ में हूँ न

    उत्तर देंहटाएं
  4. शिखा जी एक कुशल ( प्रशिक्षित) पत्रकार तो है ही उतने ही कुशलता दिखती है उनके आलेख और कविता लेखन में . अपने संस्मरणों में वो रोचकता के साथ तथ्यों को इतनी सजीवता के साथ रखती है की अपने आप को उस समय, स्थान विशेष पर उपस्थित महसूस करता है .लेखन के प्रति ईमानदारी, उत्साह और बिभिन्न विधाओ में उनकी पारंगता हिंदी ब्लॉग को उत्कृष्ट और सुरुचिपूर्ण बना रही है. . बाप रे कितना जानती है शिखा (कॉपी नहीं किया ).

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह , आज एक चुलबुली लडकी से परिचय ...इससे तो मैं साक्षात् मिल चुकी हूँ ..
    शिखा से मेरा परिचय हुआ था औरकुट की ही साहित्यिक कम्युनिटी में ...अक्सर एक दूसरे की कविता पढ़ कर कमेन्ट करते थे कि
    ऐसा ही मैंने भी कभी कुछ लिखा था ... और फिर वो रचना पोस्ट कर देते थे ..विचार काफी मिलते से लगते थे ..पर मुझे उससे बात करने में झिझक होती थी ..यही सोच कर कि एक तो उम्र का अन्तर और फिर लन्दन में रहने वाली लडकी ..:):)
    लेकिन कब यह संकोच मिटा और कब वो अपनी बनी या यूँ कहूँ कि कब उसने मुझे अपना बना लिया पता ही नहीं चला ..
    रश्मि जी आपने सच लिखा है कि -- बाप रे कितना जानती है यह लडकी ..
    सबसे बड़ी बात कि इस बात का गर्व है उसे पर घमंड नहीं ..
    अपने पापा की लाडली हमेशा ऐसी ही चुलबुली रहे और खुशियाँ बिखेरती रहे ...उसका आँचल भी खुशियों से महकता रहे ..बस यही कामना है ..

    रश्मि जी इस श्रृंखला के लिए आभार ... आपकी कलम से मिले परिचय से सच ही गरिमा बढ़ जाती है ..

    --

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत कम लोग मेरे लाइफ में ऐसे हैं.... जिनकी मैं तारीफ़ करता हूँ... और शिखा जी उनमें से एक हैं... मुझे शिखा जी के साथ यह बड़ा अच्छा लगता है.. कि वो जजमेंटल नहीं हैं...

    उत्तर देंहटाएं
  7. ऐसी संतुलित प्रतिभा सब में नहीं होती,शीखा जी को मेरी अनंत आत्मिक शुभकामाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  8. इस सिलसिला में एक खासियत यह है लोगों जिन चीज़ों को अपने प्रोफ़ाइल के द्वारा नहीं बताया, यहां खुलकर बता रहे हैं। जिस शख्स को उसकी रचनाओं के आधार पर आज तक जानते समझते रहे हैं उसको उसके द्वारा एक बार फिर से समझने का मौक़ा मिल रहा है।

    ब्लोग जगत के लिए यह एक अनूठी देन है।

    ... और शिखा जी के रचनात्मक योगदान से तो ब्लॉग जगत का हर सीरियस पाठक परिचित तो है ही। जो सबसे बड़ी विशेषता मैं उनमें पाता हूं, वह यह कि वे अंग्रेज़ों के घर में घुस कर हिन्दी का परचम फ़हरा रही हैं, २१वीं शताब्दी में, देश को दिया गया, ब्लोगजगत की यह सबसे बड़ी देन है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. शिखा जी से मेरा परिचय ब्लॉग पर ही हुआ,उनका लेखन मुझे पसंद आता है। वे आपके कथनानुसार चुलबुली होगीं, पर अपने लेखन के प्रति गंभीर हैं। मेरे मायने में ब्लॉग जगत का हीरा हैं।

    यहाँ शिखा जी की जुबानी उनकी कहानी जानकर अच्छा लगा।
    शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  10. shikha ke baare men jakar achchha lagaa. vaise usaki rachanaon se bhi bahut kuchh pataa chal hi rahaa tha. is pratibhaa ko meri hardik shubhkamanaye. aapne yah jo silsila shuroo kiyaa hai, vah sarahaneey hai.

    उत्तर देंहटाएं
  11. अरे मैंने कल ही सोचा था की अब अगला नंबर शिखा दी का हो सकता है..और २४ घंटे बीतते न बीतते ऐसा हो गया..

    :):)

    ये तो अब इतनी अपनी हो चुकी हैं की लगता ही नहीं लन्दन में रहती हैं...ऑरकुट की कई मेहरबानियाँ हैं..उन्हीं में से एक में शिखा दी का भी नाम है.. :):)
    आज चार साल हो गए हैं इन्हें पढ़ते-सुनते...ये जब बात करती हैं तो बहुत संयत और मृदु स्वर में..तब मुझे लगता है की मैं तो कितनी हड़बड़ी में बोल रहा हूँ..बहुत शांत-चित्त हैं..और उतनी ही हँसने-हँसाने वाली भी :)

    "एक क़तरा आसमान" से काफ़ी करीब आये..खूब चैटिंग हुई और इस तरह से एक बेहद संजीदा और हँसमुख व्यक्तित्व को जाना..:):)

    हाँ, ये मुझसे झगड़े भी बहुत करती हैं..तो मैं भी इनकी नाक में दम किये रहता हूँ .. :D ..और इनसे जब जो पूछना चाहो, पूछ सकते हो..कभी किसी मदद के लिए मन नहीं करतीं ..ये बात इन्हें एक बहुत प्यारा सा इंसान बनाती है.. :)

    मैंने दो साल पहले शिखा दी के ऊपर कुछ लिखा था..अभी याद तो नहीं है..और डायरी भी कहीं इधर-उधर हो गयी है..ढूंढता हूँ..मिल गयी तो यहाँ ज़रूर पोस्ट करूँगा..

    उत्तर देंहटाएं
  12. सच में शिखा जी एक होनहार और नेक दिल इन्सान हैं ....उनसे बहुत प्रेरणा मिलती है ..उनके लेखन का तो मैं कायल हूँ ही लेकिन उनका व्यक्तित्व भी उतना ही उद्दात है और सोच बहुत गंभीर और स्पष्ट ...आपका आभार

    उत्तर देंहटाएं
  13. होनहार बिरवान के होत चीकने पात। यह बात शिखा जी पर शतप्रतिशत लागू होती है।

    उत्तर देंहटाएं
  14. शिखा जी के बारे में जान कर बहुत अच्छा लगा.. उनको मेरी अनंत आत्मिक शुभकामाएं !.....

    उत्तर देंहटाएं
  15. शिखा जी से परिचय तो पहले से है..पर आज यहाँ विस्तृत जानकर बहुत अच्छा लगा......हमारे लिए प्रेरणा के योग्य है वो....।

    उत्तर देंहटाएं
  16. बाप रे , कितना जानती है ये लड़की

    उत्तर देंहटाएं
  17. आपके माध्यम से शिखा जी को जानना सुखद रहा.....जान पहचान तो पहले से ही है....फिर भी...

    उत्तर देंहटाएं
  18. शिखा जी के बारे में जान कर बहुत अच्छा लगा..... शिखाजी व रश्मि जी आप दोनों को मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनायें.....

    उत्तर देंहटाएं
  19. सचमुच बहुत जानती है शिखा :):)
    बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  20. आपकी क़लम से शिखा को जानना अच्छा लगा..ढेरों शुभकामनाएँ

    उत्तर देंहटाएं
  21. नाम सुना,काम देखा,अब जान लिया है काफ़ी कुछ...शुक्रिया शिखा जी के परिचय के लिए.

    उत्तर देंहटाएं
  22. शिखा प्रतिभावान हैं ही ... सफलता के साथ विनम्रता बनाये रखना भी उनकी विशेषता है ...
    अपने पिता के प्रति उसकी भावनाएं भाव विभोर करती हैं ...
    आपके माध्यम से शिखा को और जानना बहुत अच्छा लगा ...

    उत्तर देंहटाएं
  23. इन्हें तो मैं हमेशा तंग करते ही रहता हूँ, लेकिन फिर भी कुछ नयी बातें जानना अच्छा लगा शिखा दी के बारे में..:)

    उत्तर देंहटाएं
  24. शिखा जी के बारे में जानकर बहुत अच्छा लगा!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  25. शिखा जी के बारे में आपने जो भी कहा ...बहुत अच्‍छा लगा, सफलता के साथ उनकी सहजता का जिक्र आपकी कलम से स्‍नेहपूर्वक की गई इस प्रस्‍तुति के लिये आभार, शिखा जी को शुभकामनाएं ।

    उत्तर देंहटाएं
  26. शिखा जी के बारे में इतना जान कर बहुत अच्छा लगा

    उत्तर देंहटाएं
  27. hmm!! to blog ki kohinoor aaj rashmi di ke shabdo ke saath aur chamak uthi....:)

    उत्तर देंहटाएं
  28. शिखा जी के बारे में विस्तार से जानकार बहुत अच्छा लगा..हार्दिक शुभकामनायें !

    उत्तर देंहटाएं
  29. वाह शिखा ..बहुत अच्छा लगा आपके बारे में पढ़कर ...आपकी रचनाएँ पढ़ते भी हैं ..टिपण्णी भी देते हैं ..अब आपका इतना अच्छा परिचय पाकर बहुत हर्ष हुआ ...आपको जीवन में आगे प्रगति के लिए ढेर सारी शुभकामनायें ...!!रश्मि दी आपका आभार ..शिखा से परिचय करवाने के लिए ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  30. शिखा जी का परिचय पाकर हार्दिक प्रसन्नता हुई ………वैसे तो बात होती ही रहती है मगर यहां वो भी जानने को मिल गया जो हम नही जानते और उस दृष्टि से ये एक खास उपलब्धि है हम सभी ब्लोगर्स के लिये…………आप एक बेहद प्रशंसनीय कार्य कर रही हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  31. शिखा जी से रूबरू होना अच्छा लगा.

    उत्तर देंहटाएं
  32. शिखा जी को दिल से अपने उज्वल भविष्य के लिये शुभकामनाऐँ भगवान करेँ आप उत्तरोतर प्रगति करते रहेँ !

    उत्तर देंहटाएं
  33. shikhaaji aapki bate achchi lagi aur aapka swabhav
    bhi...

    http://neeta-myown.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  34. GG Shaikh - शास्त्रीय राग में जैसे 'मध्यम' लय होती है, दूर से शिखा जी का जीवन भी
    वैसा ही दिखे...सोनल रस्तोगी ने शिखा जी के साथ ठहाके लगाने की बात
    की है, तो कहें कि, ठहाके भी calculative ही लगाने पड़ेंगे.

    'जहाँ में ऐसा कौन है कि जिसको ग़म मिला नहीं...'
    पर दूर से लगे कि शिखा जी कि जिंदगी में उबड़-खाबड़ कम ही है...
    जीवन सरल सा लगे...

    पर उनका नज़रिया धारदार...(कितना जानती है ये लड़की वाला !)
    कितनी ही बार अपनी कलम से चौंकाया है उन्हों ने,
    लिटरेरी झाँय भी मिले उनके आलेखों मैं...

    रश्मि प्रभा जी कि कही इन बातों से सोलह आनी सहमत हैं कि :
    "होनहार, चुलबुली...
    बाप रे, कितना जानती है ये लड़की".

    उत्तर देंहटाएं
  35. एक बेमिसाल व्यक्तित्व हैं शिखा जी ....!

    उत्तर देंहटाएं
  36. Diosa,
    I m not saying anything, sab kuchh na kuchh kah rahe hain, then me silent, baki u know all :)

    उत्तर देंहटाएं
  37. सब अनजाना पर अपना सा कितना सुन्दर लगता है,
    अपनों के संग अपने जैसा ही अपना घर लगता है,
    डिओसा,
    शब्द जो भी हों आगे कुछ भी नहीं कह सकूँगा.

    उत्तर देंहटाएं
  38. 2009 mein mere dwara aayojit kaavya-sandhyaa mein shikha ji apne pati ke saath aayee thee. uske pahle just orkut par wo mitra thee aur ek dusre ki kavitaaon par rev dena bas itna hin parichay thaa. uske baad jab bhi chat par baat hui sirf ha ha hi hi, mujhe bhi hasna bahut pasand hai aur shikha ji ko bhi, kabhi serious hokar na main baat karti na wo. yun unke blog ki main niyamit paathika hun, aur aaj unke baare mein vistrit roop se jaankar bahut achha laga, dhanyawaad. shikha ji ko shubhkaamnaayen.

    उत्तर देंहटाएं
  39. मैं बहुत देर से सोच रहा था कि अभी तक किसी ने बच्चन जी कि इस कविता का जिक्र नहीं किया | और लीजिए एक बेहद प्रभावशाली व्यक्तित्व ने बेहद प्रभावी तरीके से इसका प्रयोग किया |
    शिखा जी को मैं इनके ब्लॉग 'स्पंदन' से जानता हूँ , आज इनके बारे में भी जान पाया |

    सादर

    उत्तर देंहटाएं