रविवार, 26 जून 2011

एक खिलखिलाती हवा (वंदना गुप्ता )



वंदना गुप्ता ... जब भी इन्हें पढ़ा एक गंभीर चेहरा मेरी आँखों के आगे उभरा ... तस्वीर भी ब्लॉग पर बड़ी ही गंभीर ! इनसे मिलने का सौभाग्य हुआ ब्लोगोत्सव के वार्षिक कार्यक्रम में . एक खिलखिलाती हवा नीले परिधान में विद्युत् सी दन्त पंक्तियों की छटा बिखेरती पास आकर बोली - 'रश्मि जी...' मैं भी मुस्कुराई , कहा - 'पहचाना नहीं ' . जगह बनाती बैठती हवा खिलखिलाई - 'मैं वंदना गुप्ता' ..................... हाँ ? हठात मुंह से निकला - लेखन , तस्वीर से एकदम अलग ! सबसे मिलकर वंदना जी बहुत खुश दिखाई दे रही थीं ....
लेखन पर उनकी पकड़ जबरदस्त है , हर क्षेत्र में एक वर्चस्व है और दंभ बिल्कुल नहीं , होता तो वह मेरे साथ यहाँ नहीं होतीं .

यह तो मेरा अनुभव रहा उनके साथ होने का , चलिए उनको सुनें उनसे ही -

मैं खुद आज तक अपना परिचय पाने के लिए जूझ रही हूँ मगर मुझे मैं ही नहीं मिल रही ............ना जाने कहाँ कहाँ घूम आई , हर दरो दीवार से टकराकर सदा वापस आ गयी मगर मुझे मैं नहीं मिली ...........और जब आखिर दरवाज़ा खटखटाया तो उसके बाद अपना पता भूल गयी .
अब तो यही मेरा परिचय है .

लेकिन इस दुनिया में रहते हैं हम सभी और इसकी रीति निभानी है तो शुरू करना ही होगा कहीं ना कहीं से .

मैं एक आम लड़की की तरह साधारण जीवन जीती आई हूँ . जिसमे ज़िन्दगी के उतार चढाव उसी तरह आते रहे जैसे सागर में हिलोरें .
बचपन शायद आया था मुझ पर भी मगर बहुत कम समय के लिए ........एक दबे ढके घर में उसूलों और आदर्शों से बंधा जीवन जिया है . मेरे बाउजी बहुत ही आदर्शवान व्यक्ति थे और उन्ही के आदर्श और उसूल आज मेरे जीवन की धरोहर बने हैं . बहुत सख्त थे मेरे पिता ......कहीं अकेले नहीं जाना, देर तक बाहर नहीं रहना ये ऐसे आदेश थे जिनका हम उल्लंघन नहीं कर सकते थे नहीं तो वो चिंतित हो जाते थे मगर प्यार इतना करते थे कि कोई क्या प्यार करेगा ........हम तीन बेटियां ही उनकी जान थे . हमें क्या पसंद है खाने पीने में बस वो ही बनता था घर में चाहे कुछ हो जाये . प्यार अपनी जगह था और सख्ती अपनी जगह . मगर ज़िन्दगी में उतार चढाव भी उसी तरह बने रहे . मम्मी बीमार रहती थीं जल्दी जल्दी अस्पताल में admit करना पड़ जाता था जिस कारण जो मैं बनना चाहती थी नहीं बन पाई या कहिये जो मेरे पिता मुझे बनाना चाहते थे नहीं बना पाए. उनका लक्ष्य था कि मैं आई ए एस की परीक्षा दूँ या मेरी कोई ऊँचे ओहदे पर सरकारी नौकरी लगे . हमेशा मेरा हौसला बढाया करते थे क्यूँकि पढाई में बचपन से होशियार थी और हमेशा प्रथम स्थान प्राप्त करती रही और यही मैं भी चाहती थी . मगर होनी को ये मंजूर नहीं था मम्मी की बीमारी के कारण वो लक्ष्य हासिल नहीं कर पाई और साधारण रूप से स्नातक तक की शिक्षा ग्रहण कर पाई और उसके बाद कंप्यूटर में एक साल का डिप्लोमा किया .

इसी बीच शादी हो गयी और ज़िन्दगी ने एक नयी करवट ले ली . अब ज़िन्दगी एक नए मोड़ पर आ गयी जहाँ से अपने लिए जीना छोड़कर सबके लिए जीना शुरू कर दिया और खुद को भूल गयी.

यूँ तो कवितायेँ , शेरो -शायरी सुनने का शौक बचपन से था . टी वी पर जितने कार्यक्रम आते थे मुशायरे आदि के सब देखा करती थी और खुद भी थोडा बहुत दिल की बातें लिखा करती थी मगर वो एक वक्त था जो आकर गुज़र गया जिसमे कुछ पल अपने साथ जिया करती थी .

मगर जब मेरे बच्चे बड़े हुए और मुझे ज़िन्दगी ने फुरसत दी तो लगा अब अपने लिए कुछ करना चाहिए .

इसी सिलसिले में एक दिन अख़बार में पढ़ा ब्लॉग बनाने का तरीका क्यूँकि चारों तरफ ब्लॉगिंग का शोर था तो सोचा कि एक हाथ इसमें भी अजमाया जाये शायद अपने दिल की बात वहाँ कहने का मौका मिल जाये . बस इस तरह ब्लॉगिंग की शुरुआत हुई २००७ में और १-२ पोस्ट लगा भी दी .मगर तब सिर्फ साल में शायद २-३ पोस्ट ही लगायी होंगी क्यूँकि ज्यादा कुछ पता नहीं था इसी बीच मेरा ये ब्लॉग ज़िन्दगी खो गया और फिर मैंने अपना दूसरा ब्लॉग ज़ख्म बनाया और उसके बाद बाकी सब ब्लोगर के सहयोग से कारवां बनता गया और आज आप सबके सामने हूँ जैसी भी हूँ .

जब से ब्लॉग बनाया तब से मानसिक सुकून काफी मिलने लगा और यहाँ इतने अच्छे लोग मिले कि लगा ही नहीं कि हम किसी अलग दुनिया के हैं या एक दूसरे को नहीं जानते .सब ने काफी सहयोग किया तथा उत्साहवर्धन किया जिसके कारण आज आप सबके बीच थोड़ी सी पहचान बन पाई.

जहाँ तक मेरी रूचि की बात है तो अब मैं अध्यात्म की तरफ इतना मुड चुकी हूँ कि उसके आगे मुझे अब कुछ अच्छा नहीं लगता ......मेरे कान्हा और मैं बस और कुछ चाहिए ही नहीं होता ........कोई इच्छा , कोई चाह नहीं रही और मुझे तो लगता है कि जो मैं लिखती हूँ वो सब उसी की प्रेरणा है या कहिये वो ही मेरी कलम में बैठकर स्वयं लिखता है और मुझे माध्यम बना रखा है ..........उसकी इतनी महती कृपा है .
वरना मुझे अपने में ऐसा कोई गुण नहीं दिखता की मैं कुछ लिख सकूँ ..........ये सब आज उसी की कृपा का ही फल है . मेरे लेखन में आपको ज्यादातर ईश्वरीय तत्व ही दिखेगा क्यूँकि वो ही लिखवाता है जो वो ही मैं लिख देती हूँ .
ओपन बुक्स ऑनलाइन डाट कॉम( OBO) ने मुझे फरबरी २०११ में "महीने का सर्वश्रेष्ठ सदस्य" चुना था।
तथा पिछले महीने मेरी कविता को महीने की सर्वश्रेष्ठ कविता से नवाज़ा गया है ओ बी ओ द्वारा .
पिछले कुछ समय से मेरी कुछ कवितायें , कहानियां और आलेख अलग अलग मैगज़ीनों, अखबारों इत्यादि मे छप रहे हैं जैसे -------मिडिया दरबार, जनोक्ति ,ब्लोग इन मीडिया, गजरौला टाइम्स ,उदंती छत्तीसगढ़ रायपुर , स्वाभिमान टाइम्स, हमारा मेट्रो, सप्तरंगी प्रेम. हिंदी साहित्य शिल्पी, वटवृक्ष , मधेपुरा टाइम्स, OBO पत्रिका आदि मे छपी हैं तथा कुछ कवितायेँ प्रवासी भारतीयों की मैगजीन गर्भनाल और कुछ सुखनवर में छपने गयी हैं!
यहां तक कि कुछ आलेख अभी विभिन्न पुस्तकों मे छपने गये हैं जो ब्लोगिंग से संबंधित हैं। एक पुस्तक का विमोचन तो 30 अप्रैल को हुआ है और दूसरी अगले साल तक आयेगी।इनमे मेरे लिखे आलेख सम्मिलित हैं।एक कविता संचयन के लिये चुनी गयी है इस किताब का इस वर्ष विमोचन होगा जो छह खण्ड मे प्रकाशित होगी।

उनसे एक मुलाकात यहाँ - http://www.udanti.com/2011/03/blog-post_1251.html

36 टिप्‍पणियां:

  1. वंदना गुप्ता जी को उनकी मार्मिक व भाव पूर्ण लेखनी के माध्यम से जानती रही हूँ लेकिन आज उनके व्यक्तित्व से भी परिचय होगया..धन्यवाद......

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  2. बहुत अच्छा लगा वंदना जी के बारे में जान कर |उनकी कवितायेँ तो बेमिसाल हैं ही ...!!वंदना जी बहुत बहुत शुभकामनायें आपको लेखन के लिए ...और जीवन के लिए भी ...!!
    Rashmimdi ..abhar aapka.

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  3. एक खिलखिलाती हवा से बेहतर विशेषण वंदना जी के लिए हो ही नहीं सकता था। सचमुच मैंने उनको जितना जाना है,उसमें इसी बात का अहसास हुआ है। उनके ब्‍लागों के अलावा उनसे चैट पर काफी बातचीत हुई है। कुछ समय पहले मैंने उनकी पोस्‍टों के आधार पर एक छोटी सी टिप्‍पणी लिखी थी। मुझे लगता है ऊपर दिए परिचय के साथ मेरी इस टिप्‍पणी को पढ़ना पाठकों को वंदना जी के सम्‍पूर्ण व्‍यक्तित्‍व से रूबरू कराएगा।
    *
    स्त्री विमर्श और वंदना गुप्ता
    ‘पुरुष के लिए औरत क्या जिस्म से आगे कुछ नहीं है वो क्या इतना संवेदनहीन हो सकता है कि हवस के आगे उसे घर परिवार कुछ दिखाई न दे । क्या हो अगर औरत भी अपनी वासनापूर्ति के लिए ऐसे ही कदम उठाने लगे । वो भी अपनी मर्यादा भंग करने लगे। क्या एक औरत को उतनी जरूरत नहीं होती जितनी कि एक पुरुष को ।फिर कैसे एक पुरुष इतनी जल्दी अपनी सीमाएं तोड़ बैठता है।‘
    (‘कर्तव्य पालन की सजा’ कहानी से)

    ये पंक्तियां हैं जानी-मानी ब्लागर वंदना गुप्ता की। यह सवाल उन्होंने अपनी एक कहानी में उठाए हैं। बिलकुल आंखों में आंखें डालकर वे ये सवाल समाज – इस पुरुष प्रधान समाज- से कर रही हैं।

    मुझे पता था
    तुम वापस आओगे
    मगर मेरे रंगों को
    किसी अंधे कुएं में झोंककर
    अपनी विवशताओं
    लाचारियों की
    दुहाई देते
    क्या तब भी
    ऐसा ही कर पाते
    जब ये पुनरागमन
    मेरा होता।
    (‘मुझे पता था’ कविता में)
    आश्चर्य की बात नहीं है कि कविता की ये पंक्तियां भी वंदना जी की ही हैं। यहां वे उसी पुरुष को धिक्कारते हुए एक महत्वपूर्ण सवाल कर रही हैं। उनकी कहानी और कविता के अंश पढ़कर आप शायद सोचेंगे कि वे अपने इस स्त्री विमर्श में केवल पुरुष को दोषी मानती हैं। लेकिन एक सजग रचनाकार कभी एक पक्ष की बात नहीं करता। उसकी दृष्टि समूचे परिदृश्यों पर रहती है। मेरी यह बात उनके एक लेख की इस बानगी से और स्पष्ट हो जाती है -
    क्या हाऊस वाईफ का कोई अस्तित्व नहीं ?
    क्या उसे financial decision लेने का कोई अधिकार नहीं ?
    क्या हाऊस वाईफ सिर्फ बच्चे पैदा करने और घर सँभालने के लिए होती हैं ?
    क्या हाऊस वाईफ का परिवार , समाज और देश के प्रति योगदान नगण्य हैं ?
    यदि नहीं हैं तो
    क्यों ये आजकल के लाइफ insurance , बैंक या mutual fund आदि से फ़ोन पर पूछा जाता हैं कि आप हाऊस वाईफ हैं या वर्किंग ? financial decision तो सर लेते होंगे ?
    इस तरह के प्रश्न करके ये लोग हाऊस वाईफ के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह खड़ा नहीं कर रहे ?
    क्यों आज ये पढ़े लिखे होकर भी ऐसी अनपढ़ों जैसी बात पूछी जाती हैं और सबसे मज़ेदार बात ये कि पूछने वाली भी महिला होती हैं ।
    क्यूँ उसे पूछते वक्त इतनी शर्म नहीं आती कि महिलाएं वर्किंग हों या हाऊस वाईफ उनका योगदान देश के विकास में एक पुरुष से किसी भी तरह कमतर नहीं हैं।
    (क्या हाऊस वाईफ का कोई अस्तित्व नहीं है? लेख में)

    यहां वे स्त्रियों पर भी सवाल उठा रही हैं। सवाल स्वयं की अस्मिता और सम्मान को लेकर भी है। सबसे महत्वयपूर्ण बात यह है कि वे चुपचाप और बिना किसी आंदोलन में शामिल हुए लगातार स्त्री विमर्श के शाशवत सवालों को अपनी रचनाओं में उठा रही हैं। यहां मैंने उनकी केवल तीन रचनाओं का ही जिक्र किया है। लेकिन उनके ब्लाग पर फैली लगभग तमाम रचनाओं में यही स्वर बार-बार मुखर होता है।

    ब्लाग जगत में वे अपने तीन ब्लागों के माध्यम से मुखातिब हैं। मेरे हिसाब से वे उन ब्लागरों में शामिल हैं जो न तो विवाद में पड़ते हैं और न विवाद पैदा करते हैं। फिर भी अपने रचनाकर्म से अपने पाठक को लगातार आंदोलित करते रहते हैं। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि उनकी रचनाओं का प्रमुख स्वर प्रेम है और यही मुझे उनके ब्लाग तक खींचकर ले जाता है। लेकिन इसी प्रेम की तलाश में वे लगातार उन अहसासों और तकलीफों को बयां करती रहती हैं जो उनके स्त्री मन की अभिव्यक्ति है। उनकी यह अभिव्यक्ति व्यक्ति विशेष की न होकर एक प्रतिनिधि स्त्री की अभिव्यक्ति के रूप में सामने आती है ,यह उनकी असली ताकत है।

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  4. वंदना जी के बारे में आपकी और उनकी कलम से जानने का मौका मिला ... वैसे उनसे दो बार मिल चुकी हूँ ... हंसती खिलखिलाती वो सबका मन मोह लेती हैं ..एक बात का समय नज़र आता है उनमें और मुझमें ... ब्लॉग की दुनिया से हमारी कल्पनाओं को पंख मिले हैं ...और लिखने की प्रेरणा भी ..वो हमेशा यूँ ही मुस्कान बिखेरती रहें यही शुभकामना है ..

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  5. वंदनाजी की स्फूर्ति कमाल की है ....विचारों का प्रवाह दौड़ता है इनकी कलम में और झरती हैं फटाफट कवितायेँ ...
    वंदनाजी के परिचय के लिए आभार !

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  6. वन्दनाजी, के बारे मैं जानकार बहुत अच्छा लगा ..कुछ -कुछ जीवन के उतार- चड़ाव हमारे एक जैसे हैं ..माँ की बिमारी फिर मुत्यु से जीवन कैसे अस्त व्यस्त होता है इसे मेरे से अच्छा कौन समझ सकता है ...बहुत कुछ खोने का एहसास कोई भुक्त भोगी ही समझ सकता हैं ..वन्दना जी से कभी मुलाक़ात तो नही हुई पर हसरत जरुर है ...अपना दुःख भूलकर दुसरो के लिए ख़ुशी तलाश
    करना मेरा भी मकसद हैं ...ब्लोगिग मेरे लिए भी एक ईश्वरीय देन बनकर उपजी हैं ..उनकी तरह काबिल तो नही हूँ ...मेरा कद बहुत छोटा है पर उनका सानिन्य पाकर धन्य होना चाहती हूँ ....
    धन्यवाद आपको उनके जीवन की एक नई छटा दिखने के लिए ....रशिम जी !

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  7. आपकी इस प्रस्‍तुति से वंदना जी के बारे विस्‍तारपूर्वक जानने का अवसर मिला ..यकीनन वो बिल्‍कुल वैसी ही होंगी जैसा आपने कहा ..एक खिलखिलाती हवा, जिनका हर क्षेत्र में एक वर्चस्व है और दंभ बिल्कुल नहीं , होता तो वह मेरे साथ यहाँ नहीं होतीं ..लेखन से किसी को यूं परिचित करा देना कि लगे वह बस सामने ही तो बैठा है एक अच्‍छा लेखक ही कर सकता है ...एक बार फिर वंदना जी की इस मुलाकात के लिये आपको शुक्रिया कहूंगी ...।

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  8. वन्दना जी के कृतित्व से तो पहले से ही परिचित हैं, उनके व्यक्तित्व के बारे में जान कर बहुत अच्छा लगा...आभार इस सुन्दर प्रस्तुति के लिये ...

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  9. वन्दना जी का व्यक्तित्व भी बेहद अपना सा लगा ....... सादर !

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  10. वंदना के स्नेहिल स्वभाव और उनकी सतत उर्जा की कायल हूँ.
    बहुत ही अच्छी कवियत्री और कहानीकार हैं...
    हर विषय पर उनकी कलम बखूबी चलती है...उनका सतत लेखन ऐसे ही चलता रहे...असीम शुभकामनाएं

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  11. वंदना जी से मिली हुई हूँ बहुत सहज व्यक्तित्व है इनका जो सहज ही मन को मोह लेता है ..पर बहुत कुछ नया जाना रश्मि जी आपकी कलम से माध्यम से इनके बारे में शुक्रिया

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  12. वन्दना जी को समग्र रूप से जानना अच्छा लगा

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  13. रश्मि जी
    किन लफ़्ज़ों मे आभार व्यक्त करूँ आपने तो मुझे मुझसे मिलवा दिया…………जिसे मै नही मिल रही थी उसे उससे मिलवाना इससे नेक कार्य और क्या होगा……………आपके साथ अपने सभी दोस्तो की हार्दिक शुक्रगुज़ार हूं …………आप सबके सहयोग और अपनत्व ने ही आप सबके बीच एक छोटी सी पहचान दिलाई है वरना मै क्या और मेरी हस्ती क्या……………ये सब आप सबके स्नेह की बदौलत है और चाहूँगी आप सबका स्नेह इसी तरह मिलता रहे…………हार्दिक आभार

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  14. pichhle dino Vandana jee se blogutsav ke dauran mila....ek dum se do alag-alag chehre kaundh gaye...socha hi nahi tha...ye Lady hi wo blogger ho sakti hai...jiske blog ko sayad sabse adhik log follow karte hain!! jiske prem geet ka jabab nahi hota hai...!!
    vandana jee...my heartiest wishes for you and your family!!!!
    god bless you!!

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  15. बहुत अच्छा लगा अपनी सबसे अच्छी दोस्त के बारे में पढ़कर!

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  16. वंदना जी का लिखा पढ़ कर जितना अच्छा लगता है उतना ही उन्हें जान कर लगा. सच है हम अपने आप को भी कहाँ जान पाते हैं हम में कितने लोग छुपे हैं इसका कोई हिसाब नहीं है. वंदना जी बहुत संवेदन शील कव्येत्री हैं जैसा उनके लेखन में आध्यात्म झलकता है वैसा ही उनके जीवन में भी .इश्वर उन्हें हमेशा खुश रखे.

    नीरज

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  17. वंदना जी की रचनाओं से जानना और सद्यः मिलना .. दोनों में बहुत फर्क नहीं है..रचनाओं से झलकता है उनका व्यक्तित्व..

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  18. वंदना जी को हमेशा पढ़ते रहते हैं । आज उनका पूरा परिचय पढ़कर अच्छा लगा ।
    उनका अध्यात्मिक रुझान देखकर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई ।

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  19. वन्दना जी से परिचय तो पहले से ही था लेकिन इस पोस्ट के जरिये उनके बारे में और अधिक जानकार अच्छा लगा

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  20. वन्दना जी से मुलाकात है...बहुत अच्छा लगा था उनसे मिलकर और आज यहाँ जानकर और अच्छा लगा...अनेक शुभकामनाएँ.

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  21. आपकी कलम से माध्यम से वंदना जी के व्यक्तित्व से जुड़ी कुछ और जानकारियाँ मिलीं
    आभार आपका

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  22. vandana ji ke is khilakhilate roop se parichay karwane ke liye bahut dhanywad......

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  23. वंदना जी के बारे में इस ब्लॉग के माध्यम से कई नए पहलु पता चला। ... और वो राज़ कि आजकल इनकी कविताएं इतनी आध्यात्मिक क्यूं होती हैं।!
    शुभकामनाएं।

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  24. वन्दना जी एक बहुत ही जाना पहचाना नाम हैं ब्लॉग जगत में ! उनका बहु आयामी व्यक्तित्व उनकी रचनाओं में झलकता है ! बेहद प्रतिभाशाली, परिपक्व एवं साथ ही साथ उनकी प्रांजल लेखनी के हम सभी अनन्य प्रशंसक हैं ! आज उनका परिचय जानकर हार्दिक प्रसन्नता हुई है ! उनकी सफल एवं यशस्वी लेखन यात्रा के लिये हमारी अनेकानेक शुभकामनायें !

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  25. इन्‍हीं खूबियों की वजह से तो हम वंदना जी की वंदना करते हैं।

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  26. आग में तप कर सोना कंचन बनता है. वंदना जी ने भी संघर्ष करके लेखनी का प्रभाव पाया है.बहुत अच्छी कवियत्री के साथ एक हंसमुख इंसान भी हैं वे.

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  27. अच्छा लगा वंदना जी के व्यक्तित्व के बारे में जानकर धन्यवाद

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  28. vandana ji ko badhayi aur meri shubhkaamanaye unke saath hamesha hi hai

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  29. aaj vandna ji ko kareeb se padhne ka mouka mila
    bahut accha laga.....aabhar

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  30. "इसी बीच शादी हो गयी और ज़िन्दगी ने एक नयी करवट ले ली . अब ज़िन्दगी एक नए मोड़ पर आ गयी जहाँ से अपने लिए जीना छोड़कर सबके लिए जीना शुरू कर दिया और खुद को भूल गयी."
    दीदी,वंदना जी के बारे में जितना कहा जाए कम है.मैं जब उनसे हिंदी भवन में मिला तो मुझे लगा ही नहीं कि मैं उनसे पहली बार मिल रहा हूँ.उनकी उन्मुक्त हंसी वातावरण में एक अजीब सी ताजगी का अहसास करा रही थी.मैं जब-जब उनके बारे में सोचता हूँ,उनका खिलखिलाता चेहरा आँखों के सामने तैरने लगता है.सबके लिए इतना अपनापन,इतना स्नेह बहुत कम लोगों में देखा है मैंने.वो एक अच्छी रचनाकार तो हैं ही,उससे पहले वो एक नेक दिल इन्सान हैं.उनके व्यक्तित्व से मैं बहुत प्रभावित हूँ.

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  31. आपका कृष्ण से लगाव है , लक्षण मिलते हैं अपने :)
    मुझे पता नहीं क्यूँ घर वालों ने नास्तिक बोलना शुरू कर दिया है लेकिन मैं वास्तव में ईश्वर को प्रेम का एक रूप मानता हूँ |
    मेरे दोस्त मुझसे कहते हैं कि यार कभी हम तो श्रृंगार रस के पुजारी हैं कभी कुछ प्यार-व्यार के बारे में भी लिखा करो | मैंने भी कोशिश की लेकिन जाने क्यूँ प्यार की अंतिम सीमा कृष्ण-गोपियों का प्यार ही लगता है और जाने कितनी ही रचनाये पढ़ी होंगी आज तक लेकिन फिर भी सूर के 'भ्रमर-गीत' जैसा आनंद दोबारा नहीं आया | इसीलिए श्रृंगार पर लिखी मेरी ज्यादातर रचनाये कान्हा के ऊपर ही हैं , कभी ब्लॉग पर डालूँगा तो आपकी राय जरूर चाहूँगा |

    सादर

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